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Editorial: फेड की आजादी पर ट्रंप का दबाव, वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए बढ़ता खतरा

बड़े केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों का बिना पूर्व नियोजित कार्यक्रम के सामने आना या बयान देना सामान्य बात नहीं है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- January 12, 2026 | 10:23 PM IST

बड़े केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों का बिना पूर्व नियोजित कार्यक्रम के सामने आना या बयान देना सामान्य बात नहीं है। यदि वे ऐसा करते हैं (भले ही कम समय के नोटिस पर) तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि हालात सामान्य नहीं हैं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल का मंगलवार का बयान दुनिया भर के वित्तीय बाजारों और नीति-निर्माताओं के लिए चिंताजनक है। पॉवेल ने कहा कि उनके द्वारा जून में सीनेट बैंकिंग समिति के समक्ष दिए गए बयान पर जांच की जा रही है, जो आंशिक रूप से फेडरल रिजर्व कार्यालय भवनों के नवीनीकरण से संबंधित था।

इसे अमेरिकी केंद्रीय बैंक पर एक और सीधा हमला माना जा रहा है। पॉवेल ने अपने बयान में कहा कि आपराधिक आरोपों का खतरा इसलिए मंडराया है क्योंकि फेडरल रिजर्व राष्ट्रपति की प्राथमिकताओं का पालन करने के बजाय, जनता की सेवा की दृष्टि से सर्वोत्तम आकलन के आधार पर अपनी ब्याज दरें तय करता है। ये उनके जैसे व्यक्ति के लिए अत्यंत कठोर शब्द हैं, लेकिन अंतर्निहित मुद्दे की सच्चाई को उजागर करते हैं।

हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि वह फेडरल रिजर्व पर नियंत्रण करना चाहते हैं। ट्रंप फेड और पॉवेल के खिलाफ कई बार बयानबाजी कर चुके हैं कि वह ब्याज दरों में अधिक कटौती की उनकी इच्छा का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने पॉवेल को हटाने की संभावना पर भी विचार किया था, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण इस दिशा में आगे नहीं बढ़ सके।

इसके अलावा, उन्होंने एक अन्य फेड गवर्नर को हटाने की कोशिश की, लेकिन वह भी अपने पद पर बनी हुई हैं और मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है। ट्रंप ने अपनी आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष को फेड के गवर्नर्स बोर्ड में नामित भी किया है, जो असामान्य था और केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है। स्पष्ट रूप से इसका उद्देश्य फेड के निर्णयों को प्रभावित करना था।

जब तक पॉवेल पद पर हैं, ट्रंप अधिक नुकसान नहीं पहुंचा सकेंगे। बहरहाल, उनका कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है और इस सप्ताह जो हुआ वह नए चेयरपर्सन के लिए स्पष्ट संकेत है। इस बारे में कोई घोषणा नहीं की गई है लेकिन जाहिर है कोई ऐसा व्यक्ति चुना जाएगा जो ट्रंप की बात माने। केंद्रीय बैंक की प्रक्रियाएं शायद नए चेयरपर्सन को तत्काल वह न करने दें जो ट्रंप चाहते हैं लेकिन समय के साथ हालात बदलने लगेंगे। नीतिगत दरों में बदलाव से आगे बैंकों के नियमन में भी बदलाव आ सकता है। फेड की स्वायत्तता पर संभावित हमला न केवल अमेरिका बल्कि विश्व व्यवस्था के लिए भी खतरा हो सकता है। दुनिया के सबसे नकदीकृत और गहरे वित्तीय बाजार अमेरिका में हैं। अंतरराष्ट्रीय लेनदेन और रिजर्व के मामले में भी अमेरिकी डॉलर को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की स्थिति न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार दर्शाती है, बल्कि उसकी संस्थाओं विशेष रूप से केंद्रीय बैंक की मजबूती को भी सामने रखती है। यदि फेड की स्थिति से समझौता होता है, तो यह वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारी अस्थिरता ला सकता है। वास्तव में, ट्रंप की अधिकांश नीतिगत पसंदों की तरह, उनकी अपेक्षाएं इस मामले में भी उलझी हुई और विरोधाभासी हैं। वे उन सभी को धमकाते हैं जो डॉलर के विकल्प की तलाश करते हैं, लेकिन स्वयं वही कर रहे हैं जिससे अन्य देशों को उससे दूर जाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था के भीतर, फेड की स्वतंत्रता पर हमले मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को अस्थिर कर सकते हैं। इसके दीर्घकालिक परिणाम होंगे। मौद्रिक नीति के मामले में सरकारों की भूमिका में हितों का टकराव निहित होता है। भारत जैसे देश के लिए, फेड को कमजोर करना और उसके परिणामस्वरूप वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बाहरी वित्तीय प्रबंधन को और जटिल बना देगी। यह केंद्रीय बैंकिंग के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण वर्ष प्रतीत होता है। सबकी निगाहें फेड पर टिकी हैं।

First Published : January 12, 2026 | 10:02 PM IST