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जुलाई 2024 के वादों से निखरेगा बजट !

वर्ष 2025 के बजट में अगर वे वादे पूरे कर लिए जाएं, जो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जुलाई 2024 में किए थे तो कहा जा सकता है कि बजट में बहुत कुछ हासिल किया गया। बता रहे है

Last Updated- December 26, 2024 | 10:23 PM IST
Union Budget 2026

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को आगामी आम बजट पेश करने में अब छह हफ्ते से भी कम समय रह गया है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, इसकी अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं। कई औद्योगिक संगठन और उद्योग के अगुआ उम्मीद कर रहे हैं कि वह खजाने को मजबूत करने का काम आगे बढ़ाएंगी और आर्थिक वृद्धि को सहारा देने वाले उपाय भी करेंगी। लेकिन इन सभी अपेक्षाओं पर बारीकी से नजर डालने से पहले सीतारमण के आगामी बजट को इतिहास के नजरिये से देखना बेहतर होगा।

यह उनका लगातार सातवां पूर्ण बजट होगा, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। देश में किसी अन्य वित्त मंत्री ने लगातार सात आम बजट पेश नहीं किए हैं। अगला बजट पेश करते ही वह चिंतामन देशमुख को पीछे छोड़ देंगी, जिन्होंने 1950 के दशक में लगातार छह बजट पेश किए थे। अलबत्ता कुल पूर्ण बजट पेश करने के मामले में वह अब भी मोरारजी देसाई और पी चिदंबरम से पीछे रहेंगी। मोरारजी ने बतौर वित्त मंत्री दो अलग-अलग कार्यकालों में कुल आठ बजट पेश किए थे और चिदंबरम में तीन अलग-अलग कार्यकालों में आठ बजट पेश किए थे। स्त्री-पुरुष के नजरिये से देखें तो सीतारमण सबसे लंबे समय तक वित्त मंत्री रहने वाली महिला बन चुकी हैं और वित्त मंत्री रही इंदिरा गांधी को बहुत पीछे छोड़ चुकी हैं।

अब सीतारमण के सातवें बजट से क्या उम्मीद की जानी चाहिए? यह कई तरह से अस्वाभाविक बजट होगा क्योंकि इसका आकलन इस बात पर भी होगा कि उन्होंने पिछले बजट के नीतिगत वादों को निभाने के लिए क्या-क्या किया? 2024-25 के बजट में वह न केवल राजकोषीय समेकन और लेखा पारदर्शिता के अपने वादे पर खरी उतरीं बल्कि उन्होंने चार बड़े नीतिगत वादे भी किए। उन नीतिगत वादों और उनकी प्रगति की पड़ताल करने से भी आगामी बजट की दिशा समझ आ सकती है।

पहला वादा यह था कि सरकार राजकोषीय समेकन यानी खजाने को मजबूती देने के मोर्चे पर अपने प्रदर्शन को मापने का तरीका कुछ बदलेगी। उन्होंने कहा था कि 2025-26 में केंद्र सरकार राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.5 फीसदी के नीचे रखने का प्रयास करेगी। उन्होंने यह बात जुलाई 2024 के बजट में कही थी, जो राजकोषीय घाटे में कमी की 2021-22 के बजट में घोषित योजना के अनुरूप ही थी। ऐसे में उम्मीद कर सकते हैं कि 2025-26 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 4.3 या 4.2 फीसदी के बराबर रह सकता है। कोविड काल यानी 2020-21 के 9.2 फीसदी राजकोषीय घाटे से यह तकरीबन पांच फीसदी कम होगा।

बड़ा सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्री राजकोषीय समेकन की उस समय-सारणी की ओर लौटेंगी, जो 2003 के राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम में दी गई है। इसकी संभावना नहीं दिखती। इस कानून में मध्यावधि व्यय योजना का ब्योरा देने की बात कही गई है मगर वित्त मंत्री आर्थिक अनिश्चितताओं और जोखिमों का हवाला देकर 2021 से ही ऐसा करने से बचती रही हैं। स्थिति शायद ही बदलेगी। छमाही व्यय की समीक्षा का वक्तव्य जारी करते हुए गत सप्ताह वित्त मंत्रालय ने कहा कि जुलाई 2024 का बजट आने के बाद से प्रतिकूल वैश्विक हालात और उसने जुड़े जोखिम कम नहीं हुए हैं। उसमें कहा गया कि वैश्विक हालात ज्यादा खराब हो गए हैं क्योंकि विभिन्न देशों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई है। इसे देखते हुए सरकार राजकोषीय नीति को लचीला रखना चाहेगी ताकि प्रतिकूल वैश्विक घटनाओं से सही से निपटा जा सकेगा।

इन हालात में वित्त मंत्री क्या कर सकती हैं? छमाही रिपोर्ट में संकेत किया गया है कि वह सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता बढ़ाएंगी। इसका अर्थ होगा पूंजीगत व्यय पर ज्यादा जोर देना और सब्सिडी जैसे राजस्व व्यय पर करीबी नजर रखना ताकि सुनिश्चित हो कि वह गरीबों तक ही पहुंच रहा है और सार्वजनिक वित्त के लिए बोझ नहीं बन रहा है। सब्सिडी की प्रभावी समीक्षा का एक तरीका नि:शुल्क खाद्यान्न योजना की समीक्षा होगा। इसका लाभ 81 करोड़ लोगों को दिया जा रहा है, जो देश में गरीबों की आधिकारिक संख्या का छह गुना आंकड़ा है। जरूरतमंदों को ही इसके दायरे में रखने से दूसरी योजनाओं के लिए सरकारी संसाधन मिल जाएंगे।

इससे भी अहम बात है कि वह जुलाई 2024 में किया गया वादा पूरा करने के लिए योजना पेश कर सकती हैं। वादा यह था कि 2026-27 से हर साल राजकोषीय घाटा इस तरह संभाला जाएगा कि जीडीपी के प्रतिशत के रूप में केंद्र सरकार का ऋण लगातार घटता रहे। 2024-25 में केंद्र सरकार का ऋण जीडीपी के 56.8 फीसदी के बराबर रह सकता है, जबकि लक्ष्य इसे 40 फीसदी पर समेटने का है।

ऐसा लगता है कि इसके पीछे राजकोषीय घाटे का अनुमान बंद करने का विचार नहीं है बल्कि आने वाले हर साल के लिए ऋण के मापदंड इंगित करना और राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को उसके हिसाब से ढालना है। राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए ऋण का ऐसा इस्तेमाल राजकोषीय समेकन लक्ष्य की विश्वसनीयता भी बढ़ाएगा और उसे अधिक व्यावहारिक भी बनाएगा। 2025-25 के बजट पर निगाह यह देखने के लिए भी रहेगी कि सरकार ने बयान या एफआरबीएम अधिनियम के जरूरी प्रावधानों में संशोधन के जरिये नई रणनीति लागू करने के लिए विस्तृत योजना तैयार कर ली है या नहीं। जो भी हो, एफआरबीएम के प्रावधानों को लागू करने में विलंब के लिए वैश्विक अनिश्चितताओं और आर्थिक जोखिम का बहाना अब विश्वसनीय नहीं रह गया है।

सीतारमण ने जुलाई 2024 के बजट में दूसरा वादा सीमा शुल्क ढांचे की विस्तृत समीक्षा कर उसे उचित एवं सरल बनाने का किया था ताकि कारोबार करना आसान हो सके, शुल्क दुरुस्त हो सकें और विवाद कम हो जाएं। यह काम छह महीने में पूरा होना था। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि आगामी बजट में सीमा शुल्क ढांचे की समीक्षा का परिणाम दिखाई देगा। उम्मीद है कि इस काम को समझदारी से और सभी अंशधारकों के विचार शामिल करने के बाद अंजाम दिया गया होगा। भारत के विनिर्माण क्षेत्र का निर्यात बाजार में होड़ करना और देश के भीतर भी व्यावहारिक बने रहना इसी पर निर्भर करेगा कि बजट के इस वादे को कितनी अच्छी तरह पूरा किया जाता है।

तीसरा वादा काफी महत्त्वाकांक्षी था। जुलाई 2024 में सीतारमण ने कहा था कि वह आर्थिक नीति का एक खाका लाएंगी ताकि आर्थिक विकास के लिए रुख स्पष्ट हो सके। साथ ही इसमें अगली पीढ़ी के सुधारों का दायरा भी दिया जाएगा, जिससे रोजगार के मौके बढ़ें और वृद्धि लगातार ऊंची बनी रहे। सुधारों के प्रस्तावित खाके से भूमि, श्रम और पूंजी जैसे उत्पादन कारकों में सुधार होने की तथा बाजार और औद्योगिक क्षेत्रों के अधिक प्रभावी बनने की उम्मीद थी। इससे भी अहम बात, प्रस्तावित खाके को केंद्र और राज्य सरकारों की मिली-जुली कवायद से अंतिम रूप दिया जाना था। अब तक इस दिशा में अधिक प्रगति नहीं सुनी है। क्या 2025-26 का बजट इस सराहनीय पहल पर और प्रकाश डालेगा ताकि कच्चे माल के बाजार यानी फैक्टर मार्केट से जुड़ी नीतियों में अहम बदलाव केवल कागज पर न रह जाएं?

आखिर में सीतारमण ने अपने पिछले बजट में चौथा वादा आयकर अधिनियम की व्यापक समीक्षा का किया था। इसका मकसद कानून को दुरुस्त और सरल बनाना था ताकि कर विवाद कम हो जाएं और कर हर हालत में आए। अगर यह वादा लागू किया गया तो कर के मामले में अनुकूल होने का सरकार का रिकॉर्ड मजबूत होगा तथा कारोबारी सुगमता भी बढ़ जाएगी। इससे बहुचर्चित प्रत्यक्ष कर संहिता की वापसी तो नहीं होगी, जिसे वादा करने के बाद फेंक दिया गया। लेकिन इससे भारत के आयकर कानून अधिक सरल, अधिक स्पष्ट और कम पेचीदा बनाए जा सकते हैं। 2025 के बजट में अगर जुलाई 2024 के वादे पूरे करने की ठानी गई तो इस दिशा में बड़ी प्रगति हो सकती है।

First Published - December 26, 2024 | 10:13 PM IST

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