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स्वाभिमान बनाम नि:शुल्क वितरण की राजनीति में उलझा तमिलनाडु

Last Updated- December 12, 2022 | 6:50 AM IST

तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने कुछ दिन पहले जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में राज्य के निवासियों को मुफ्त मकान और वॉशिंग मशीन देने के अलावा कॉलेज में पढऩे वाले युवाओं को एक साल तक 2 जीबी डेटा सेवा एवं केबल कनेक्शन मुफ्त देने का वादा किया है। और भी बहुत कुछ मुफ्त में देने की बात कही गई है।
विपक्षी दल द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य में महिला की अगुआई वाले हरेक परिवार को हर महीने 1,000 रुपये देने का वादा किया है। उसने कई विचार भी पेश किए हैं। मसलन, उसने मतदाताओं से तमिलनाडु के आत्म-सम्मान एवं स्वायत्तता के लिए लडऩे का वादा किया है। उसने कहा है कि सत्ता में आने पर वह उद्योगों में 75 फीसदी रोजगार तमिलों के लिए आरक्षित कर देगी, महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाकर 40 फीसदी करेगी और विभिन्न जाति समूहों के 215 लोगों को मंदिरों में पुजारी बनाएगी। द्रमुक ने शिक्षा को समवर्ती सूची से निकालकर राज्य सूची में डालने के लिए संविधान संशोधन की मुहिम चलाने की बात भी कही है। उसने केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति (एनईपी) को सामाजिक न्याय एवं तमिलों के खिलाफ बताते हुए इसे निरस्त करने का भी वादा किया है। इसके अलावा पार्टी ने तमिलनाडु की जरूरतों एवं आकांक्षा को पूरा करने वाली एक शिक्षा नीति का खाका खींचने के लिए शिक्षाविदों की एक समिति बनाने की भी बात कही है।
दूसरे शब्दों में कहें तो द्रमुक के सत्ता में आने पर ‘एक राष्ट्र एक सबकुछ’ का रवैया तमिलनाडु में नहीं लागू हो पाएगा। इस पार्टी को अब यह अहसास हो गया है कि जिंदगी में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता है।
द्रमुक ने अतीत से अपने पुराने ताल्लुक काफी हद तक तोड़ लिए हैं। एक राजनीतिक दल को कई बार ऐसा करना पड़ता है ताकि वह प्रासंगिक बना रहे। एम करुणानिधि के पार्टी प्रमुख रहते समय द्रमुक ने खुद को वक्त की जरूरतों के हिसाब से ढालते हुए बार-बार बदला था। अब पार्टी की कमान किसी और के हाथ में है। एम स्टालिन अपने पिता के मार्गदर्शन के बगैर पहला चुनाव लड़ रहे हैं। द्रमुक पिछले 10 वर्षों से सत्ता से दूर है। ऐसे में द्रमुक का यह घोषणापत्र पार्टी पर स्टालिन की छाप को दर्शाता है।
तमिलनाडु कल्याणवाद की राजनीति के लिए जाना जाता है। कई लोग तो इसे मुफ्त में चीजें देने का वादा कर चुनाव जीतने की राजनीति कहते रहे हैं। लेकिन यह उतना सरल भी नहीं है। द्रमुक 1967 में पहली बार तमिलनाडु की सत्ता में आई थी। लेकिन 1969 में अन्नादुरई के निधन के बाद करुणानिधि ने पार्टी एवं सरकार दोनों की कमान संभाली। द्रमुक का जन्म एक जनांदोलन से हुआ था। यह एक अनुशासित संगठन था और जिलों के प्रमुखों को काफी हद तक स्वायत्तता देता था। अगर आप सत्ता में बने रहना चाहते हैं तो आपको लोगों की बातें ध्यानपूर्वक सुननी होती हैं और उनकी अपेक्षाओं का भार उठाना होता है। द्रमुक ने यह काम दो तरह से किया। पहला, अपने जिला-स्तरीय नेताओं से मिले सुझावों पर अमल करते हुए इसने राज्य के शासकीय ढांचे में बदलाव किए और अफसरशाही के निचले स्तर एवं सामाजिक रूप से वंचित समूहों के लोगों को साथ जोड़ा। दूसरा, सरकार की नीतियों के जरिये आकांक्षा, अपेक्षा एवं चाहत के निचोड़ को एक सुसंगत एवं पहचाने जाने लायक रूप में ढाला जा सके।
इसका मतलब था कि झुग्गी बस्तियों को नियमित करने के बाद द्रमुक सरकार ने गरीबों के लिए आवासीय कार्यक्रम शुरू करने का ऐलान किया। सरकार ने मछुआरों, पुलिस कर्मचारियों एवं आदि द्रविड़ों के लिए मकान बनाए। तमिलनाडु में पहले से ही सरकार लोगों को एक रुपये किलो के भाव पर चावल दे रही थी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाने के लिए व्यवस्थागत प्रयास किए गए। वर्ष 1976 आते-आते समूचे राज्य में पीडीएस व्यवस्था लागू हो चुकी थी जिसमें लाभार्थियों को चावल, चीनी, केरोसिन तेल और गेहूं देने के साथ ही पोंगल के अवसर पर साडिय़ां एवं धोती भी दी जाती थी। ऐसा करना राजनीतिक रूप से ठीक नहीं था क्योंकि यह अनुदान के रूप में होता था। लेकिन किसी को भी शिकायत नहीं थी। शुद्ध परिणाम यह है कि इन वर्षों में विकास सूचकांकों में खासी वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 1970 और 1976 के दौरान प्रति व्यक्ति आय करीब 30 फीसदी बढ़ गई, साक्षरता दर 1971 के 39.5 फीसदी से बढ़कर 1981 की जनगणना में 54.4 फीसदी पर पहुंच गई। इसी तरह शिशु मृत्यु दर भी 1977 में 103 पर आ गई थी जबकि 1971 में यह 125 हुआ करती थी।
इस सबका यही मतलब है कि विचारों की राजनीति की गुंजाइश है। द्रमुक के विभाजन के बाद एम जी रामचंद्रन ने जब अन्नाद्रमुक बनाई तो लोकलुभावन राजनीति की जड़ें इतनी गहराई तक जा चुकी थीं कि उन्हें पानी देने के सिवाय कोई चारा नहीं था। ऐसा नहीं करने पर उन्हें सियासी उठापटक का सामना करना पड़ता। स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन देने की योजना एमजीआर के ही दिमाग की उपज थी। लेकिन यह शुरुआती दौर की बात है। हर नया चुनाव प्रतिस्पद्र्धी लोकलुभावनवाद को सामने लाता रहा, कभी-कभी तो वह एकदम बेतुका ही लगता था जैसे कि जयललिता की तरफ से मुफ्त बकरियां देने की योजना। भले ही यह योजना सुनने में अटपटी लगे लेकिन इसने लोगों को सशक्त बनाने के साथ ही उन्हें अन्नाद्रमुक के पाले में भी लाने का काम किया। लेकिन लोगों के दिमाग को उलझाए रखने की भी जरूरत होती है।
तमिल स्वाभिमान का विचार फिर से जोर पकडऩे लगा। ‘ईलम’ के गठन के लिए संघर्ष छिडऩे के साथ ही इसकी शुरुआत हुई। लेकिन अब वह दौर खत्म हो चुका है लिहाजा उसे ‘दिल्ली के साम्राज्यवाद’ का नारा उछालना पड़ा। यही वजह है कि द्रमुक घोषणापत्र में वह वादा भी है कि तमिलनाडु एक दिन एक स्वतंत्र गणतंत्र होगा। अगर चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों पर यकीन करें तो द्रमुक के सत्ता में लौटने की संभावना नजर आ रही है। ऐसा होने पर केंद्र सरकार को नजर रखनी होगी।

First Published - March 20, 2021 | 12:30 AM IST

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