नीदरलैंड में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में वोडाफोन की जीत से बीती तिथि से कराधान के लंबे और कष्टदायी प्रकरण को बंद किया जाना चाहिए। वर्ष 2007 में देश के आयकर विभाग के अधिकारियों ने वोडाफोन को हचिसन इंडिया की उन परिसंपत्तियों की खरीद के लिए 7,990 करोड़ रुपये के पूंजीगत लाभ कर का नोटिस दिया था, जो एक कर मुक्त क्षेत्र केमैन आईलैंड के जरिये उसके पास आई थीं। यह दिग्गज दूरसंचार कंपनी इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में लेकर गई, जिसने कंपनी के पक्ष में फैसला दिया। हालांकि अगले केंद्रीय बजट में वोडाफोन की तरफ से अपने सौदे में इस्तेमाल किए गए बचने के रास्ते को बंद कर दिया गया और इस नियम को बीती तारीख से लागू किया गया। सरकार के इस कदम से निवेशकों को तगड़ा झटका लगा। वर्ष 2016 तक कर की मांग और ब्याज बढ़कर 22,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया।
उस समय तक वोडाफोन अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में पहले ही याचिका दायर कर चुकी थी। उसने कहा कि भारत में निवेश भारत-नीदरलैंड द्विपक्षीय निवेश संधि और भारत-ब्रिटेन द्विपक्षीय निवेश संधि के तहत आता है। यह वह मामला है, जो इस बड़ी दूरसंचार कंपनी ने जीता है। मध्यस्थों ने कहा कि सरकार के व्यवहार ने बीआईटी के ‘निष्पक्ष एवं न्यायोचित’ व्यवहार का उल्लंघन किया है। इस फैसले से न तो सरकार को बड़ी धनराशि चुकानी पड़ेगी और न ही बहुराष्ट्रीय वोडाफोन पीएलसी को आमदनी होगी। सरकार को केवल मामूली विधिक लागत करीब 40 करोड़ रुपये कंपनी को चुकानी होगी। इस बहुराष्ट्रीय कंपनी की भारतीय इकाई ने आइडिया के साथ मिलकर खुद को वी नाम दिया है। मध्यस्थता की खबरों से कंपनी के शेयर चढ़े हैं, लेकिन तथ्य यह है कि भारत इस कंपनी और इस क्षेत्र को इतने लंबे समय से एक पंचिंग बैग के रूप में इस्तेमाल कर रहा है कि ऐसे मध्यस्थता फैसलों के बावजूद यह कर्ज, स्पेक्ट्रम फीस और कर पूर्व घाटों से दबा हुआ है।
भले ही मूल सौदे में कुछ भी अच्छाइयां या बुराइयां हों। मगर इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उन कंपनियों से बरताव का यह खराब तरीका है, जो भारत में धन लेकर आईं, यहां बुनियादी ढांचे में निवेश किया और उपभोक्ताओं को एक आवश्यक सेवा मुहैया कराने की कोशिश की। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि आज निवेशक भारत के बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए उस तरह से कतार लगाकर नहीं खड़े हैं, जिस तरह वे 2006 में खड़े थे।
इससे भी चिंताजनक बात यह है कि वित्त मंत्रालय और सरकार के भीतर से यह आवाज आ रही है कि वे मांग को जारी रखना चाहते हैं। उनका दावा है कि संसदीय विशेषाधिकारों, भारतीय न्यायिक सर्वोच्चता आदि के विभिन्न उल्लंघन हुए हैं। इस बात को याद किया जाना चाहिए कि पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2014 के अपने पहले बजट में संसद में भरोसा दिया था कि सरकार इन मामलों की कानूनी प्रक्रियाओं को अपने तार्किक नतीजों पर पहुंचने की मंजूरी देगी।
अब मध्यस्थता फैसले को पलटने या खारिज करने की कोशिश करने से 2012 की शुरुआती गलती और बढ़ेगी और वह भी ऐसे समय, जब भारत को विदेशी निवेश की आवक की दरकार है। यह याद किया जाना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भारत में भरोसा खत्म होने के नतीजे वित्तीय आवक और बाह्य खाते की स्थिरता के लिए घातक रहे थे। संकट के समय ऐसी चिंताओं पर वित्त मंत्रालय को सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। उसे इस कष्टदायी प्रकरण को लंबा खींचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय उसे इससे सबक लेने चाहिए और ऐसी स्थितियों से बचने की कोशिश करनी चाहिए, जिनसे भविष्य में ऐसे मध्यस्थता फैसले आएं। उसे वर्तमान मध्यस्थता फैसलों पर अपने रुख की फिर से पड़ताल करनी चाहिए।