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NATO का गठन क्यों हुआ था और ट्रंप का ग्रीनलैंड पर जोर देना कैसे इस गठबंधन की परीक्षा ले रहा है?

दुनिया की दूसरी बड़ी जंग वर्ल्ड वॉर 2 खत्म होने के बाद, जब सोवियत संघ का खतरा बढ़ रहा था, तो पश्चिमी देशों ने मिलकर NATO बनाया था

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ऋषभ शर्मा   
Last Updated- January 11, 2026 | 8:28 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे की जोरदार मांग की है, जिससे यूरोप में खासा बवाल मचा हुआ है। उन्होंने इस द्वीप को खरीदने या फिर सैन्य कार्रवाई से हासिल करने की बात की है। इससे NATO की बुनियादी समझौते पर सवाल उठ रहे हैं, जहां सहयोगी एक-दूसरे पर हमला नहीं करते। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसेन ने साफ कह दिया कि अगर ऐसा हुआ तो NATO का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। ट्रंप की इस हरकत से पुराने गठबंधन में नई दरारें पड़ रही हैं, और यूरोपीय देश चिंता जता रहे हैं।

ट्रंप की इस मांग ने NATO की पुरानी यादों को ताजा कर दिया है। आइए देखते हैं कि यह गठबंधन कैसे बना और कैसे बदलता रहा, जबकि आज इसमें अंदरूनी झगड़े उभर रहे हैं।

NATO की नींव कैसे पड़ी?

दुनिया की दूसरी बड़ी जंग वर्ल्ड वॉर 2 खत्म होने के बाद, जब सोवियत संघ का खतरा बढ़ रहा था, तो पश्चिमी देशों ने मिलकर NATO बनाया था। अप्रैल 1949 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की अगुवाई में 12 देशों ने नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर दस्तखत किए। इसका ट्रीटी दिल है आर्टिकल 5, जो कहता है कि अगर किसी एक सदस्य पर हमला हो तो सब मिलकर उसका मुकाबला करेंगे। इसे ‘एक के लिए सब, सब के लिए एक’ का नाम दिया जाता है। यह सोवियत संघ के फैलाव को रोकने का बड़ा हथियार बना और कोल्ड वॉर के दौरान पश्चिमी सुरक्षा की रीढ़ रहा।

शुरुआती सालों में NATO ने अपना दायरा बढ़ाया। 1952 में ग्रीस और तुर्की इसमें शामिल हुए, फिर 1955 में वेस्ट जर्मनी। उसी साल सोवियत संघ और उसके साथियों ने वारसा पैक्ट बनाकर यूरोप को दो खेमों में बांट दिया। दोनों तरफ से सैन्य ताकत बढ़ती गई, लेकिन NATO का सामूहिक बचाव का वादा सोवियत हमले को रोकता रहा।

कोल्ड वॉर खत्म होने के बाद NATO का बदलाव

1991 में सोवियत संघ टूट गया, तो कई लोगों को लगा कि NATO की जरूरत खत्म हो गई। लेकिन गठबंधन ने खुद को नए रंग में ढाला। 1990 के दशक में पहली बार सदस्य देशों से बाहर ऑपरेशन चलाए, जैसे पूर्व यूगोस्लाविया में हिंसक झगड़ों को रोकने के लिए बाल्कन में हस्तक्षेप।

फिर पूर्व की ओर फैलाव शुरू हुआ। 1999 में पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य जैसे पूर्व वारसा पैक्ट वाले देश शामिल हुए। 2000 के दशक में बाल्टिक राज्य और कई पूर्वी यूरोपीय देश जुड़े, यहां तक कि कुछ पूर्व सोवियत गणराज्य भी। इससे NATO का दायरा काफी बढ़ गया।

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11 सितंबर 2001 के अमेरिका पर हमलों के बाद पहली बार आर्टिकल 5 का इस्तेमाल हुआ। सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान में NATO की अगुवाई में फौज भेजी। इससे गठबंधन का फोकस सिर्फ यूरोप से बाहर निकला। आने वाले सालों में NATO ने आतंकवाद से लड़ाई, साइबर सुरक्षा और संकट प्रबंधन जैसे नए क्षेत्रों में कदम रखा, जो उत्तर अटलांटिक इलाके से काफी दूर थे।

ट्रंप क्यों ग्रीनलैंड पर अड़े हैं?

ट्रंप ने ग्रीनलैंड को राष्ट्रीय सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बताया है। उनका कहना है कि आर्कटिक में रूस और चीन का असर रोकने के लिए अमेरिका को इस द्वीप पर कंट्रोल चाहिए। NBC न्यूज से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका, यूरोप और पूरी आजाद दुनिया की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस ने पुष्टि की कि इसके लिए कई विकल्पों पर विचार हो रहा है, जिसमें ग्रीनलैंड के करीब 57,000 लोगों को प्रति व्यक्ति 10,000 से 1,00,000 डॉलर तक की एकमुश्त रकम देना भी शामिल है।

पिछले हफ्ते व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति के पास अमेरिकी सेना का इस्तेमाल हमेशा एक विकल्प है। ट्रंप की यह जिद पुरानी है, लेकिन अब यह ज्यादा जोरदार हो गई है, और इससे सहयोगी देशों में बेचैनी बढ़ रही है।

NATO देशों का सख्त रुख

डेनमार्क ने इस विचार को सिरे से खारिज कर दिया। प्रधानमंत्री फ्रेडरिकसेन ने कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की जरूरत बताना बेमानी है। उन्होंने वॉशिंगटन से अपील की कि ऐतिहासिक दोस्त के खिलाफ धमकियां बंद करें। उनका कहना है कि अगर सैन्य हमला हुआ तो NATO की नींव ही हिल जाएगी।

6 जनवरी को सात NATO सदस्यों – फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, जर्मनी, पोलैंड और डेनमार्क – ने संयुक्त बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि ग्रीनलैंड उसके लोगों का है, और इसका भविष्य सिर्फ डेनमार्क और ग्रीनलैंड तय कर सकते हैं। बयान में जोर दिया गया कि आर्कटिक की सुरक्षा के लिए NATO सहयोगियों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, जैसे संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की पवित्रता।

यह बयान NATO के लिए एक दुर्लभ कदम है, जहां सदस्य एक-दूसरे की नीतियों पर इतनी खुलकर बोल रहे हैं। ट्रंप की ग्रीनलैंड वाली बात ने गठबंधन को उस विश्वास और एकजुटता पर सोचने को मजबूर कर दिया, जो 70 साल से इसकी ताकत रही है। अब देखना है कि यह झगड़ा कैसे सुलझता है, क्योंकि NATO का मूल दुश्मन बाहर से था, लेकिन अब चुनौती अंदर से आ रही है।

First Published : January 11, 2026 | 8:07 PM IST