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ट्रंप को धन्यवाद कि उनकी वजह से वापस आए सुधार

ब्रिटेन के साथ एफटीए हो चुका है, यूरोपीय संघ से बातचीत जारी है और चीन को छोड़कर आरसेप के लगभग सभी सदस्य जुड़ चुके हैं, साथ ही चीन पर लगे प्रतिबंध भी धीरे-धीरे हटाए जा रहे हैं

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शेखर गुप्ता   
Last Updated- January 11, 2026 | 10:33 PM IST

मेरे मन का एक हिस्सा यह कहना चाहता है: ‘धन्यवाद डॉनल्ड ट्रंप कि आपने भारत के साथ व्यापार समझौते को ठंडे बस्ते में डाले रखा।’ इसकी वजह यह है कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो हमें वे आर्थिक सुधार नहीं देखने को मिलते जो 1991 के बाद से नहीं हो सके थे। उदाहरण के लिए नई श्रम संहिता। 

जैसा अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक कह रहे हैं, अगर जुलाई में ही भारत-अमेरिका व्यापार समझौता हो जाता तो भारत आत्मसंतुष्ट होकर विजय घोषित करके बैठ जाता कि सबकुछ नियंत्रण में है। यही वह समय था जब अमेरिका-ब्रिटेन और अमेरिका-वियतनाम समझौते हुए। यह सरकार अब तक किसी भी जोखिम भरे सुधार के लिए इच्छाशक्ति नहीं दिखा रही थी और जिन कुछ सुधारों की कोशिश भी की, बिना लड़े ही पीछे हट गई। सोचिए नया भूमि अधिग्रहण विधेयक, कृषि कानून आदि सभी वापस ले लिए गए और जोखिम से बचने के लिए श्रम संहिताओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।

आर्थिक शासन के मोर्चे पर कुछ सुधार हुए। इसमें सरकारी बैंकों के बहीखाते में सुधार, समेकन और दिवालिया व्यवस्था आदि शामिल हैं। परंतु इस अवधि में सरकारी संरक्षण में भी इजाफा हुआ। शुल्क बढ़े और गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों यानी क्यूसीओ की एक नई व्यवस्था सामने आई। देश के औद्योगिक क्षेत्रों ने एक-एक कर लॉबीइंग की और इन्हें हासिल किया।

इन्हें तेजतर्रार भारतीय अफसरशाहों ने तैयार किया होगा। ट्रंप शायद इन्हें ही भारत की ‘निंदनीय’ गैर-टैरिफ बाधाएं कह रहे थे। उनका समय बीत चुका है। अब इन्हें तेजी से वापस लिया जा रहा है। यह वैसा ही है जैसे बच्चे तब तेजी दिखाते हैं जब उनका कक्षाध्यापक ब्रेक से अचानक वापस आए और उनको मोबाइल पर नेटफ्लिक्स देखते पकड़ ले। पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा सरीखे ताकतवर, अनुभवी और भरोसेमंद अधिकारी, जो फिलहाल आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए नीति आयोग में तैनात हैं, इस वापसी परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं।

फिर भी, ट्रंप को धन्यवाद कि वह कम कठोर नहीं हुए। धन्यवाद कि वह इतने आत्ममुग्ध रहे कि केवल किसी के फोन नहीं करने पर उन्होंने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण रणनीतिक संबंध को बिगाड़ दिया। और धन्यवाद कि वह लगातार अपनी बात खुलकर कहते रहे, तथा धन्यवाद कि उनकी टीम भी उनके पक्ष में इसी तरह बोलती रही। लटनिक ताजा उदाहरण हैं। सीधी बात पुरानी शैली की कूटनीति से बेहतर है।

अगर ट्रंप न होते, तो यह व्यापार-विरोधी भाजपा सरकार, जो अपनी वैचारिक पुस्तिकाओं को कुछ ज्यादा ही पढ़ती है, यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी को भी नजरअंदाज करके, वह व्यापार समझौतों को दोबारा शुरू नहीं कर पाती। उसने लगभग एक दशक उन चीजो को नष्ट करने में बिताया जो उसे विरासत में मिली थीं, साथ ही द्विपक्षीय निवेश संधियों (बीआईटी)  को भी।

यूके और एफ्टा (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) के साथ व्यापार समझौते पहले से ही हो चुके हैं, यूरोपीय संघ के साथ समझौता प्रक्रिया में है, चीन को छोड़कर आरसेप (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी) के लगभग हर सदस्य ने हस्ताक्षर कर दिए हैं और चीन पर लगी पाबंदियां भी हटाई जा रही हैं। भारत ने व्यापार पर अपना रुख बदल लिया है। इसके लिए ट्रंप को धन्यवाद।

अगर ट्रंप की तरह आक्रामकता न हो तो हमारी आत्ममुग्ध सरकार दोबारा आश्वस्ति से भर जाएगी। सात फीसदी वृद्धि, नाम मात्र की महंगाई के साथ कट्टर हिंदूकरण वाला राष्ट्रवाद और कुशल कल्याणकारी वितरण मिलकर एक जबरदस्त चुनावी संयोजन बनाते हैं। पांच साल तक 272 के लक्ष्य का पीछा कर यह सरकार अपने दूसरे साल में ‘एक विकेट पर 180’ के स्कोर पर बैटिंग कर रही थी, तभी ट्रंप ने पेंसिलवानिया एवेन्यू से बॉलिंग शुरू करके हमें याद दिलाया कि बच-बच के खेलना कोई विकल्प नहीं है।

अगर अपना वजूद बचाना है तो स्कोर बढ़ाओ, चाहे जो भी जोखिम हो। यह अनुमान हमेशा से था कि ट्रंप व्यापार को नीतिगत उपाय के रूप में इस्तेमाल करेंगे। लेकिन भारत यह अनुमान नहीं लगा सका था कि वह शुल्क दरों को एक खतरनाक हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगे।

साफ कहें तो किसी को ऐसा नहीं लगा था। बात बस यह है कि भारत सबसे अधिक आश्वस्त था और यह मानकर चल रहा था कि रणनीतिक रिश्तों की बदौलत वह बच निकलेगा। परंतु ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान अमेरिका की शरण में चला गया। ट्रंप और मोदी के बीच रही सही गर्माहट भी नोबेल पुरस्कार की तलाश में खत्म हो गई।

भारत निश्चित रूप से नोबेल के लिए उनकी अनुशंसा नहीं कर सकता था, लेकिन हम इन ‘मूर्ख पाकिस्तानियों’ को अंतिम सबक सिखाते इससे पहले उन्हें होश में लाने और युद्ध विराम की राह बनाने के लिए ट्रंप को धन्यवाद कहने पर विचार तो कर ही सकते थे। गहरे सुरक्षा हितों की खातिर इससे इनकार करना एक सामरिक भूल हो सकती थी। 

मेरे मन का दूसरा हिस्सा इस बात को मानता है कि मौजूदा संकट कम वेतन वाले लाखों रोजगारों को खत्म कर रहा है और बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मछली पालन, परिधान, होजरी, रत्न और ज्वैलरी निर्माण जैसे क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा रहा है। अब तक ये क्षेत्र कुछ तो सरकार की मदद से और कुछ अपनी अब तक की रफ्तार के बूते बचे रहे हैं। लेकिन तीन महीने और बीतने के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर छंटनी हो सकती है। इसलिए भारत इसे लंबे समय तक नहीं झेल सकता। हमें इसका हल तलाश करना होगा।

इसका यह मतलब नहीं कि भारत सार्वजनिक रूप से ट्रंप की हरकतों पर झुक जाए। ट्रंप शी चिनफिंग और व्लादीमिर पुतिन के अलावा हर किसी से ऐसी ही अपेक्षा करते हैं। परंतु, भारत कई क्षेत्रों में अधिक लचीला रुख अपना सकता है। उदाहरण के लिए अपनी किसान लॉबी। मैं जानता हूं कि भारत में विरोध इस डर से हो रहा है कि इससे भारतीय कृषि को नुकसान होगा या जीएम उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी (मेरा मानना है कि यह सोच गलत है) ।

इससे निपटने के दूसरे रास्ते भी हैं। देखिए कैसे ढाका में अमेरिकी दूतावास केवल 58,000 टन अमेरिकी कॉर्न के आने का जश्न मना रहा है। वह मुर्गे-मुर्गियों को खिलाने के लिए है। भारत मक्के का शुद्ध आयातक है जिसका ज्यादातर हिस्सा पोल्ट्री के लिए मंगाया जाता है। अगर केवल एथेनॉल निकालना है और चिकन फीड के रूप में इस्तेमाल करना है तो ज्यादा मक्का आयात करने में दिक्कत क्या है? पोल्ट्री को जीएम फीड खिलाने में क्या दिक्कत है? पालतू पशुओं को तो हम पहले ही जीएम उत्पाद खिला रहे हैं। इससे निकले तेल 23 साल से हमारी खाद्य श्रृंखला का हिस्सा हैं।

दुनिया ट्रंप से निपटने के तरीके खोज रही है। कम से कम अब तक हम उनके तौर-तरीके और शैली को जान चुके हैं। उन्हें कुछ हानिरहित जीतें देनी होंगी, बिना सार्वजनिक रूप से चापलूसी किए। कुछ लोगों का मानना है कि उनसे उसी तरह टक्कर ली जाए जैसे इंदिरा गांधी ने रिचर्ड निक्सन से ली थी। लेकिन वह समय अलग था। शीत युद्ध चरम पर था और इंदिरा गांधी के पास मजबूत सोवियत संघ का साथ था। यह एक अलग दुनिया और नया भारत है। आप निक्सन के प्रलापों को अनदेखा कर सकते थे, लेकिन ट्रंप को नहीं कर सकते, क्योंकि भारत आर्थिक और रणनीतिक रूप से अमेरिका और वैश्विक प्रणालियों से बहुत अधिक जुड़ा हुआ है। इस बीच सुधारों पर जोर देना जारी रहना चाहिए क्योंकि यह ऐसा संकट है जो किसी एक पीढ़ी में एक बार आता है।

पुनश्च: भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं की दंतकथाओं से दो किस्से। पहला, 1987 में व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में रोनाल्ड रीगन से मुलाकात के दौरान जब राजीव गांधी कटोरे से एक बादाम उठाकर खाने लगे, तो रीगन ने पूछा, ‘प्रधानमंत्री, अमेरिकी बादाम भारत में बेचने के लिए क्या करना होगा?’ यह बताता है कि रिपब्लिकन पार्टी अपने किसानों को लेकर किस कदर चिंतित है।

दूसरा किस्सा मरहूम आबिद हुसैन का है। देश के वाणिज्य सचिव और अमेरिका में हमारे राजदूत रहे हुसैन के मुताबिक एक बार उन्होंने अपने मंत्री वीपी सिंह से कहा, ‘सर, आइए अपने देश को एक नारा दें-निर्यात करो या नष्ट हो जाओ।’ इस पर सिंह ने कहा था, ‘ऐसा कुछ मत कीजिए, आबिद साहब, वरना यह देश सामूहिक रूप से नष्ट होने का ही फैसला कर सकता है।’ यह बात मैंने उनके जीवित रहते एक जगह लिखी थी और दोनों इस बात पर हंसे थे।

हमने बीते चार दशक में कई डरों को खत्म किया है। अगला नंबर मुक्त व्यापार से डर का होना चाहिए।

First Published : January 11, 2026 | 10:33 PM IST