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महिलाओं पर केंद्रित नकदी योजनाओं में बढ़ोतरी से बढ़ रही वित्तीय और राजनीतिक चुनौतियां

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बिहार की आखिरी समय वाली योजना दिखाती है कि अब कई राज्य बिना शर्त नकद देने की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि कई राज्यों की आमदनी कम है और उनका कर्ज लगातार बढ़ रहा है

Last Updated- November 30, 2025 | 9:08 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

पिछले महीने संपन्न बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की शानदार जीत की एक बड़ी वजह महिला ग्रामीण रोजगार योजना को बताया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत पात्र महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए 10,000  रुपये दिए गए और 2,00,000 रुपये की अतिरिक्त राशि आवंटित होने की संभावना है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले कई वर्षों से महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाने के लिए प्रशंसा के पात्र हैं, इसलिए यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा कि अंतिम समय में घोषित महज एक योजना ने राजग के पक्ष में चुनावी हवा बना दी। एक विश्लेषण के अनुसार जिन पांच विधानसभा क्षेत्रों में महिलाएं सबसे अधिक संख्या में मतदान करने आईं उनमें तीन ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के खाते में गई। यह पार्टी राजग या महागठबंधन दोनों में किसी का हिस्सा नहीं थी।

चुनाव परिणाम प्रभावित करने वाले कई कारक होते हैं इसलिए यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि किसका कितना असर हुआ है, खासकर बिहार जैसे बड़े राज्यों में तो यह और मुश्किल है।

एक बात तो साफ है कि महिलाओं को नकद हस्तांतरण का चलन व्यापक स्तर पर दिखने लगा है और बिहार में चुनाव से ठीक पहले लागू यह योजना इसी का हिस्सा माना जा सकती है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं को बड़े पैमाने पर बिना शर्त नकद हस्तांतरण प्रदान करने वाले राज्यों की संख्या 2022-23 में 2 से बढ़कर 2025-26 में 12 हो गई है। उसका अनुमान है कि राज्यों ने चालू वित्त वर्ष में ऐसी योजनाओं के लिए लगभग 1.68  लाख करोड़ रुपये या सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.5 प्रतिशत आवंटित किया है।

कुछ राज्यों ने इस वर्ष आवंटन में काफी बढ़ोतरी की है। विशेष रूप से 12 राज्यों में 6 को चालू वर्ष में राजस्व घाटा हो सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो राज्य अपने नियमित व्यय को पूरा करने के लिए पर्याप्त राजस्व जुटाने में असमर्थ हैं वे भी बिना शर्त नकदी वितरित कर रहे हैं। वास्तव में, एक राज्य राजस्व-अधिशेष से राजस्व-घाटे में चला गया है। देखकर तो यही लगता है कि वह समय दूर नहीं जब अन्य राज्यों में भी इसी तरह की योजनाएं शुरू की जाएंगी। इससे कुछ आर्थिक और राजनीतिक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं।

आइए, पहले आर्थिक पहलू पर विचार करें। समग्र स्तर पर  राज्य सरकारों का ऋण जीडीपी के 27 प्रतिशत से अधिक है जो उच्च स्तर है। राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन समीक्षा समिति (2017) ने राज्यों के लिए ऋण सीमा जीडीपी का अधिकतम 20 प्रतिशत तक रखने का सुझाव दिया था। इसके अलावा, कुछ राज्य अपना राजस्व व्यय पूरा करने के लिए उधार ले रहे हैं। समग्र राजकोषीय स्थिति को देखते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि राज्यों को ऐसी योजनाओं से बचना चाहिए।

हालांकि, यह अब व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिख रहा है। नकद हस्तांतरण योजनाएं राजनीतिक वर्ग और मतदाताओं दोनों के बीच लोकप्रिय हैं। इस योजना की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इस पूरे विषय पर एक अलग किस्म की चर्चा की आवश्यकता है। क्या भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने का सबसे अच्छा तरीका नकद हस्तांतरण है?

क्या ऐसी योजना में दाखिला लेने के बाद उनके जीवन में सार्थक बदलाव आता है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर यह निर्धारित कर सकते हैं कि नकद हस्तांतरण योजनाओं का उपयोग व्यापक सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है या नहीं।

राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो की एक हालिया रिपोर्ट ‘मातृ नकद हस्तांतरण फॉर जेंडर इक्विटी ऐंड चाइल्ड डेवलपमेंट: एक्सपेरिमेंटल एविडेंस फ्रॉम इंडिया’ में बड़े पैमाने पर बेतरतीब (रैंडम) मूल्यांकन के माध्यम से नई माताओं को नकद हस्तांतरण के प्रभाव का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि ऐसे घरों में माताओं एवं बच्चों के लिए कैलरी की खपत में 9.6-15.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। आहार की विविधता के मामले में भी लाभ देखा गया। इसके अलावा, भोजन की खपत में स्त्री-पुरुष असमानता कम हुई।

भारत में ऐसे कई अध्ययनों की आवश्यकता है। सहज रूप से गरीब परिवारों के लिए अतिरिक्त नकद प्रवाह से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होने की सबसे अधिक संभावना है। एक बार पर्याप्त प्रमाण होने के बाद कुछ सब्सिडी नकद हस्तांतरण में भी बदली जा सकती है जिससे पात्र घरों में महिलाओं को बड़ी समेकित राशि हस्तांतरित की जा सकेगी।

हालांकि, राज्य राजकोषीय अनुशासन से समझौता नहीं करें तो बेहतर होगा। राज्यों की विकासात्मक आवश्यकताओं और राजकोषीय स्थिति को देखते हुए बजट में एक हिस्सा निर्धारित किया जाना चाहिए जिसे सब्सिडी और नकद हस्तांतरण पर खर्च किया जा सकता है। सख्त राजकोषीय नियम लागू करने के लिए तरीके तैयार करने होंगे। राज्यों को नकद हस्तांतरण के रकम का इंतजाम अतिरिक्त उधार के माध्यम से नहीं करना चाहिए चाहे इसके पीछे ठोस वजह ही क्यों न हो। ऐसा इसलिए कि यह विकल्प दीर्घ अवधि तक जारी नहीं रह सकता।

मौजूदा स्थिति के अनुसार 19 राज्यों पर अपने जीडीपी का 30 प्रतिशत से अधिक ऋण है जबकि पंजाब और हिमाचल प्रदेश की बकाया देनदारी 40 प्रतिशत से अधिक है। इन राज्यों के लिए एक विशेष रियायत की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे राज्य भी हैं जहां ब्याज भुगतान के मद में बढ़ोतरी राजस्व संग्रह में वृद्धि से अधिक है।

अब राजनीतिक पहलू पर विचार करते हैं। प्रायः यह देखा गया है कि राज्य सरकारें चुनावों से ठीक पहले ऐसी योजनाओं की घोषणा करती हैं और मतदान से पहले हस्तांतरण शुरू करने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। स्पष्ट रूप से यह मतदाताओं को प्रभावित करना है। इस योजना से कोई फर्क पड़ता है या नहीं यह एक अलग मामला है। भले ही इससे केवल मामूली अंतर ही क्यों न आए यह कड़ी टक्कर वाले चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर प्रदान करने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

इस पर विचार करना मुश्किल होगा क्योंकि सरकार किसी भी योजना को घोषित करने और लागू करने के लिए स्वतंत्र है जब तक कि आचार संहिता लागू न हो जाए। इस तरह, महिलाओं या अन्य लक्षित समूहों के लिए नकद हस्तांतरण योजनाओं के आर्थिक पहलुओं को संबोधित करना राजनीतिक पहलू से निपटने की तुलना में ज्यादा आसान होगा।

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First Published - November 30, 2025 | 9:08 PM IST

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