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समीक्षा आवश्यक

Last Updated- December 15, 2022 | 4:07 AM IST

सरकार की बहुचर्चित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) मेंं इसके अंशधारकों का भरोसा कम होता नजर आ रहा है। हालांकि हाल में इसके स्वरूप में कुछ बदलाव किया गया है जो मांग बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, पंजाब, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड के रूप में छह राज्यों ने पहले ही इससे बाहर होने का निर्णय ले लिया है और राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे कुछ अन्य राज्यों में इस विषय पर चर्चा चल रही है। तेलंगाना और झारखंड ने फरवरी में बदलाव के बाद इस योजना से दूरी बना ली। आमतौर पर राज्यों की शिकायत है कि बीमा कंपनियों द्वारा वसूला जा रहा प्रीमियम बहुत अधिक है। कृषि क्षेत्र के बजट का बड़ा हिस्सा इस योजना में जा रहा है। ऐसे में राज्य किसानों की उत्पादन संबंधी क्षतियों का ध्यान रखने के लिए अपनी व्यवस्था को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके अलावा बीमा कंपनियां, खासतौर पर निजी बीमा कंपनियां भी इस योजना के संचालन को लेकर बहुत उत्सुक नहीं हैं। कंपनियों को कृषि बीमा कारोबार वाणिज्यिक रूप से आकर्षक नहीं लग रहा है। उन्हें व्यावहारिक रूप से भी इसमें दिक्कत आ रही है। कंपनियों को दोबारा बीमा करने वाला तलाशने में भी समस्या आ रही है। इसके परिणामस्वरूप उनमें से कई ने इस योजना को त्याग दिया है। पैनल में शामिल 18 बीमा कंपनियों में से केवल 10 ही मौजूदा खरीफ सत्र में इस योजना के तहत बीमा करने के लिए उपलब्ध रही हैं।
दूसरी ओर किसानों को लग रहा है कि उन्हें पर्याप्त फसल बीमा नहीं मिल पा रहा है। हालांकि वे नाम मात्र का प्रीमियम भुगतान करते हैं। रबी फसल में उन्हें कुल तयशुदा राशि का 1.5 फीसदी, खरीफ में 2 फीसदी और वाणिज्यिक तथा बागवानी फसलों के लिए 5 फीसदी राशि प्रीमियम के रूप में चुकानी होती है। शेष प्रीमियम का भुगतान बीमांकिक आधार पर राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा किया जाता है। हालांकि अब केंद्र ने अपनी हिस्सेदारी कम करी दी है। किसान इस योजना में इसलिए भी रुचि नहीं ले रहे क्योंकि नुकसान की क्षतिपूर्ति बहुत कम है, भुगतान में देरी होती है और बिना ठोस वजह के दावे नकार दिए जाते हैं। इस बात की पुष्टि कुछ सर्वेक्षण करने वालों ने भी की है। भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि किसान पुरानी फसल बीमा योजनाओं में अधिक बेहतर स्थिति में थे। औसतन देखा जाए तो बमुश्किल 30 से 35 फीसदी किसान ही फसल का बीमा करते हैं। उनमेंं से अधिकांश वे हैं जिन्होंने बैंक से कर्ज ले रखा है और जिनके लिए बीमा जरूरी है।
योजना के डिजाइन में हाल में कुछ बदलाव किए गए हैं जो प्रथम दृष्टया इसे लुभावना बनाने वाले दिखते हैं लेकिन दरअसल वे अनुत्पादक साबित हो सकते हैं। मसलन किसानों को योजना में अनिवार्य के बजाय स्वैच्छिक भागीदार बनाना। इससे योजना को अपनाने वालों की तादाद घटेगी। वर्षा आधारित फसलों के लिए प्रीमियम सब्सिडी में केंद्र की हिस्सेदारी 30 फीसदी तथा सिंचित फसलों के लिए 25 फीसदी कर दी गई जबकि पहले यह सभी फसलोंं के लिए 50 फीसदी थी। इससे राज्यों का वित्तीय बोझ बढ़ेगा। केंद्र सरकार ने पहले किसान कल्याण की इस अहम योजना का 90 फीसदी सब्सिडी बोझ वहन करने की इच्छा जताई थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन तमाम बातों को देखते हुए सरकार को पीएमएफबीवाई की समीक्षा करनी चाहिए और इस दौरान सभी अंशधारकों को भी शामिल करना चाहिए। दूसरा विकल्प यह है कि किसानोंं के नुकसान की भरपाई का काम राज्यों पर छोड़ दिया जाए। केंद्र प्राकृतिक आपदा की तर्ज पर वित्तीय सहायता मुहैया करा सकता है।

First Published - July 29, 2020 | 11:25 PM IST

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