facebookmetapixel
वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में बड़े डेवलपरों को दमदार बुकिंग से मिलेगा दमडी बीयर्स का बड़ा दांव: भारत में नैचुरल हीरों के लिए मार्केटिंग खर्च दोगुना, फॉरएवरमार्क पर फोकसBMW ने 2025 में बेच डाली 18,001 कारें, पहली बार लग्जरी खरीदारों और ईवी से मिली रफ्तारबजट से उम्मीदें: हेल्थकेयर, मेडिकल डिवाइस और फार्मा कंपनियों ने टैक्स राहत और R&D निवेश बढ़ाने की मांग कीIndiaAI Mission: 12 से 15 हजार जीपीयू खरीदने की तैयारी, सरकार जल्द आमंत्रित करेगी एक और दौर की बोलीभारत पर 500% शुल्क का जो​खिम! रूस से तेल खरीदने वालों पर ‘दंड’ लगाने वाले विधेयक को ट्रंप का समर्थनSIF सेगमेंट में बढ़ी हलचल: कई म्युचुअल फंड हाउस पहली पेशकश की तैयारी में, हाइब्रिड लॉन्ग-शॉर्ट पर सबसे ज्यादा जोरBNP Paribas का बुलिश अनुमान: दिसंबर तक 29,500 पर पहुंचेगा निफ्टी, 14% रिटर्न की संभावनाकमोडिटी इंडेक्स रीबैलेंसिंग और मजबूत डॉलर से सोना फिसला, चांदी में भी तेज गिरावट500% टैरिफ की आशंका से रुपया डगमगाया, RBI के हस्तक्षेप के बावजूद 90 प्रति डॉलर के पार फिसला

राज्यसभा चुनाव के पीछे की पेचीदा राजनीति

Last Updated- December 11, 2022 | 6:27 PM IST

सियासी क्षेत्र के कुछ दिग्गज चुप्पी साधने के लिए मजबूर हो गए  लेकिन नए लोगों की आवाज गूंजेगी। संसद के मॉनसून सत्र में राज्यसभा में नए चेहरे नजर आएंगे और कई पुराने चेहरों की अनुपस्थिति होगी। राज्यसभा के नए उम्मीदवारों या जिन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए नामित किया गया है  या फिर जिनके नाम राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में शामिल ही नहीं किए गए उनसे जुड़ी राजनीति काफी जटिल साबित हो रही है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एक अलिखित नियम है जिसके मुताबिक तीन कार्यकाल पूरा कर चुके सांसदों को फिर से राज्यसभा नहीं भेजा जाएगा। सदन में तीन कार्यकाल पूरे कर चुके महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर का नाम राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची से गायब था। ऐसे हालात में उन्हें लग सकता है कि उनके साथ अन्याय हुआ क्योंकि इस नियम के अपवाद भी रहे हैं। पूर्व केंद्रीय विदेश, रक्षा और वित्त मंत्री जसवंत सिंह को चार कार्यकालों के लिए नामित किया गया था।
अरुण जेटली के साथ भी ऐसा ही था लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा ने उन्हें राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतारने का अभूतपूर्व फैसला कर लिया। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू अपना चौथा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं जो जुलाई में समाप्त हो रहा है। पूर्व संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद भी अपने चौथे कार्यकाल के आखिरी चरण में हैं जो 2024 में खत्म हो जाएगा।
भाजपा ने विनय सहस्त्रबुद्धे और शिव प्रताप शुक्ला का नाम इस बार राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची से हटा दिया गया है। उन्होंने राज्यसभा का एक-एक कार्यकाल पूरा किया। लेकिन सहस्त्रबुद्धे भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) का नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसे में शुक्ला का नाम हटाने का कारण राजनीतिक ही लग रहा है। गोरखपुर से संबंध रखने वाले शुक्ला के संबंध योगी आदित्यनाथ के साथ कई वर्षों से अच्छे नहीं हैं और यह बात तब से जगजाहिर है जब वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी नहीं बने थे।
उत्तर प्रदेश में 2002 के विधानसभा चुनाव में यह टकराव खुलकर सामने आया जब आदित्यनाथ ने राधामोहन दास अग्रवाल का नाम उम्मीदवार के रूप में प्रस्तावित किया। हालांकि उस वक्त भाजपा ने शुक्ला को मैदान में उतारने पर जोर दिया क्योंकि पार्टी का यह तर्क था कि उन्होंने चार बार विधानसभा सीट जीती है और वह तीन बार उत्तर प्रदेश से भाजपा सरकार के कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं।
आदित्यनाथ को उस वक्त गोरखपुर में अपनी ताकत और नियंत्रण का प्रदर्शन करना पड़ा और शुक्ला के खिलाफ अग्रवाल को अपनी पूर्ववर्ती पार्टी, हिंदू महासभा से उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारना पड़ा। अग्रवाल चुने गए और शुक्ला तीसरे स्थान पर खिसक गए। हालांकि बाद में उन्हें शांत करने के लिए मोदी सरकार ने उन्हें 2016 में राज्यसभा सदस्य बनाया और उन्हें राज्य मंत्री का काम भी दिया। अब उन्हें दोनों पदों से हटाने में योगी आदित्यनाथ के दबदबे का संकेत मिलता है।
अब बात करें अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की तो उन्हें राज्यसभा की सीट न देने का अर्थ संभवतः यह है कि शायद उन्हें आजम खान के खिलाफ रामपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव में उतारा जा सकता है। रामपुर नकवी का पूर्व का लोकसभा क्षेत्र है और उनकी जीत आदित्यनाथ के लिए एक परीक्षा की घड़ी के साथ-साथ खुद नकवी के लिए भी एक चुनौती होगी।
राजस्थान में भाजपा ने छह बार के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री तथा पार्टी उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे के मुखर आलोचक घनश्याम तिवाड़ी को उम्मीदवार बनाया है। जब राजे मुख्यमंत्री थीं उस वक्त तिवाड़ी राजे के इतने खिलाफ हो गए थे कि उन्होंने 2018 के विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी छोड़ दी और अपना खुद का संगठन बनाया। थोड़े समय के लिए उन्होंने कांग्रेस के साथ भी हाथ मिला लिया लेकिन भाजपा नेताओं के मान-मनौव्वल के बाद वह राजी होकर फिर से अपनी पार्टी में वापस आ गए।
तिवाड़ी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े हैं और राजनीति में 45 से अधिक वर्षों का उनका अनुभव है। उन्हें राज्यसभा का उम्मीदवार बनाने का यह भी मतलब हो सकता है कि राज्य की राजनीति में उनकी अनुपस्थिति के चलते वास्तव में राजस्थान में भाजपा में राजे गुट मजबूत हो रहा था।
कुछ ऐसी ही राजनीति कांग्रेस में भी दिखती है, जहां आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद का नाम राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं है बल्कि उनकी जगह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में सक्रिय रहे राजीव शुक्ला को उम्मीदवार बनाया गया है। (उन्होंने निर्विरोध जीत हासिल की है)। विवेक तन्खा ने भी निर्विरोध जीत हासिल की है और उनका ऐसा दावा है कि वह सदन में एकमात्र कश्मीरी पंडित सांसद हैं। उन्हें मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का समर्थन हासिल है।
हालांकि, आरसीपी सिंह की राज्यसभा से विदाई कई मामले में अलग है जो पूर्व आईएएस अधिकारी होने के साथ ही कभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दाहिना हाथ माने जाते थे। सिंह भी कुर्मी हैं और केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री (इस्पात) बनाए जाने से पहले उन्होंने कुछ समय तक जनता दल (यूनाइटेड) का कार्यभार भी संभाला था।
इस वक्त उनके पास संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनने के लिए छह महीने का समय है क्योंकि ऐसा न होने की स्थिति में  उन्हें मंत्री पद खोना पड़ेगा। भाजपा को उनका समर्थन करने में और उन्हें अपनी पार्टी छोड़ने और भाजपा में शामिल होने में वास्तविक रूप से कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन पार्टी, बिहार में गठबंधन की नाव को एक झटका देने की कोशिश कर रही है, जहां वह जद (यू) के साथ सरकार में भागीदार है। एक तरह से नीतीश कुमार भाजपा को कार्रवाई करने के लिए उकसा रहे हैः मसलन अगर वह आरसीपी सिंह को अपना कहने का दावा करते हैं तब वह जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं।
उन्होंने पहले ही भाजपा के प्रदेश संगठन को जातीय जनगणना का समर्थन करने के लिए मजबूर करके खुद का दबदबा बढ़ाया है। हालांकि एक पार्टी के रूप में यह विशेष रूप से जनगणना के विचार से उत्साहित नहीं है जिसमें जातिगत आधार पर मतदाताओं को देखने का विकल्प मिलता है। राज्यसभा चुनाव के नतीजे 10 जून को आएंगे। लेकिन इसके बाद भी राजनीति जोरदार तरीके से जारी रहेगी।

First Published - June 8, 2022 | 12:49 AM IST

संबंधित पोस्ट