भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पिछले दिनों मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की उस बैठक का ब्योरा जारी किया जो इस महीने के आरंभ में हुई थी। छह सदस्यीय एमपीसी ने रीपो दर को 4 फीसदी पर अपरिवर्तित रहने दिया जबकि उसका रुख समझौतापरक रहा। यह निर्णय सभी छह सदस्यों ने सर्वसम्मति से लिया। ब्योरे से पता चल रहा है कि एमपीसी के सदस्य शायद वृद्धि को मंदी से उबारने को अपना दायित्व मानते हैं। इस ब्योरे में आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास विशिष्ट तौर पर कहते हैं, ‘वायरस की दूसरी लहर ने यह अनिवार्य कर दिया है कि आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को टिकाऊ बनाने के लिए मौद्रिक उपाय उसका समर्थन करें।’ वहीं डिप्टी गवर्नर माइकल पात्र ने दलील दी कि ‘नीतिगत चयन बदल गए हैं और उनका झुकाव समायोजन बढ़ाने की ओर है’ जबकि आशिमा गोयल ने कहा कि उत्पादन का अंतर बढ़ा इसलिए नीति को ‘मांग को प्रोत्साहन देना था।’
आरबीआई का अधीनस्थ आदेश भले ही वृद्धि की सहायता करने का है लेकिन उसे याद रखना चाहिए कि अब वह मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाला केंद्रीय बैंक है। आरबीआई अधिनियम के अनुसार यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों में तय दायरे से बाहर रहे तो केंद्रीय बैंक अपने कदमों के बारे में स्पष्टीकरण दे। ऐसे में इस बात की अनदेखी करना एमपीसी के वैधानिक अधिकार में है कि भारत में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति अब तय दायरे के बाहर है और वह 6.3 फीसदी हो चुकी है। यह व्यापक आधार वाली मूल मुद्रास्फीति से संचालित है जो ठहरने वाली है। थोक मूल्य मुद्रास्फीति भी तीन दशकों के उच्चतम स्तर पर है और मई में वह 12.94 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर रही। इसके पीछे ईंधन और जिंस कीमतों में लगातार वृद्धि के साथ कम आधार प्रभाव भी एक वजह है। गत वर्ष भी मुद्रास्फीति दो तिमाहियों तक तय दायरे से बाहर थी। इसके बाद खाद्य कीमतों में अचानक गिरावट के बाद यह वापस छह फीसदी के नीचे चली गई। तथ्य यह है कि एक ओर जहां आरबीआई के पास उल्लेखनीय वैधानिक गुंजाइश होगी वहीं इसमें संदेह नहीं कि वह शायद महामारी के कारण मुद्रास्फीति के जोखिम को कम करके आंक रहा है। यह ऐसे समय पर हुआ है जब सरकार का राजकोषीय घाटा काफी अधिक है और दुनिया के कई केंद्रीय बैंक इस बात पर विचार कर रहे हैं कि अपने समझौतापरक कदमों को कैसे रोका जाए।
भारतीय केंद्रीय बैंक को याद रखना चाहिए कि मुद्रास्फीति निवेश और वृद्धि के लिए खतरा बन सकती है और साथ ही गरीबी में कमी लाने के लक्ष्य के लिए भी। मुद्रास्फीति को सीमित दायरे में रखने की वजह भी यही है। यदि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है, जैसा कि आरबीआई के कई अर्थशास्त्रियों ने दावा भी किया है तो एक बार महामारी से जुड़ी दिक्कतों के दूर होने पर यह वापसी करेगी। ऐसे में आरबीआई को समग्र मांग में अचानक इजाफे से निपटने की अग्रिम तैयारी रखनी चाहिए। साथ ही कंपनियों और उपभोक्ताओं के बीच मुद्रास्फीति की ऊंची अपेक्षाओं को लेकर भी उसे तैयार रहना होगा। खेद की बात है कि फिलहाल यह बैंक की प्राथमिकता में नहीं नजर आ रहा है। हालांकि उसका अधिदेश तथा आर्थिक दलील दोनों का संकेत है कि ऐसा होना चाहिए।
सरकार भी मौजूदा हालात में उच्च मुद्रास्फीति को लेकर सहज है क्योंकि ऐसे समय में सरकारी व्यय को समर्थन देने के लिए भारी भरकम लाभांश की अनुमति मिलती है जब राजस्व में कमी आ रही है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता और उनका एक चीज पर ध्यान देना अहम है। ऐसे समय में जब तमाम अन्य केंद्रीय बैंक अपने रुख को सावधानीपूर्वक सुधार रहे हैं, भारत अर्थव्यवस्था को महामारी से उबारने के लिए लगातार समझौतापरक नीति जारी नहीं रख सकता क्योंकि यह मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली है।