वस्त्र और परिधान के क्षेत्र में भारत की लंबी गिरावट का कारण कोई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति या कमजोर कारखाने नहीं थे, बल्कि खराब नीतियां थीं। कई वर्षों तक अपने ही सिंथेटिक उद्योग को नुकसान पहुंचाने के बाद, आखिरकार देश उन बाधाओं को दूर कर रहा है जिन्होंने इसे पीछे रखा था। नीति में सुधार शुरू हो गया है ऐसे में अब क्रियान्वयन, उद्योग का दायरा और गति सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। अब बदलाव शुरू हो सकता है। पिछले साल चीन ने 113 अरब डॉलर के परिधानों का निर्यात किया, बांग्लादेश ने 51 अरब डॉलर और वियतनाम ने 39 अरब डॉलर का निर्यात किया जबकि भारत, कपड़ा के क्षेत्र में अपनी समृद्ध विरासत के बावजूद केवल 17 अरब डॉलर का निर्यात कर पाया।
कपड़ा क्षेत्र में भारत क्यों है कमजोर: भारत ने उस सिंथेटिक कपड़ा क्रांति पर ध्यान नहीं दिया जो वैश्विक परिधान व्यापार के 70 प्रतिशत हिस्से को चलाती है। सिंथेटिक कपड़ों के दम पर स्पोर्ट्सवियर, विंटरवियर, एथलीजर और फास्ट फैशन को ताकत मिलती है जिन श्रेणियों का अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया में दबदबा है।
वियतनाम और बांग्लादेश ने इस मांग को पूरा करने के लिए सुगम, कम लागत वाली सिंथेटिक कपड़ों की आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाईं। भारत कपास से चिपका रहा और यही नहीं उसने शुल्क, एंटी-डंपिंग कदमों और व्यापक गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) के माध्यम से सिंथेटिक कपड़ों को काफी महंगा बना दिया, जिससे आयात प्रतिबंधित हो गया और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) सर्दियों के कपड़ों (विंटरवियर) के क्षेत्र से तेजी से बाहर हो गए।
इसका सीधा असर कारखाने में दिखाई देता है। भारत के अधिकांश कारखाने कपास वाले वसंत और गर्मियों के सीजन के दौरान ही पूरी क्षमता से चलते हैं और शरद ऋतु तथा सर्दियों में यहां निष्क्रियता बनी रहती हैं, जब सिंथेटिक कपड़ों के बलबूते वैश्विक ऑर्डर मिलता है। तो इन कारखानों पर लागत तो साल भर रहती है, लेकिन राजस्व नहीं। आधुनिक परिधान के विकास इंजन सिंथेटिक कपड़ों को अनदेखा करके, भारत ने अपने वस्त्र उद्योग को एक तरह से पंगु बना दिया है जिससे उत्पादन सीमित हो गया, मजदूरी घट गई और उस क्षेत्र में बाजार हिस्सेदारी खो गई जहां भविष्य टिका हुआ है। अच्छी खबर यह है कि अब ऐसी स्थिति नहीं है।
चार सुधार: हाल के नीतिगत बदलावों ने उन चार प्रमुख बाधाओं को दूर कर दिया है जिन्होंने भारत को सिंथेटिक परिधानों में अप्रतिस्पर्धी बना दिया था। पहला, सरकार ने पॉलिएस्टर और विस्कोस फाइबर व यार्न जैसे 20 से अधिक सिंथेटिक कच्चे माल पर क्यूसीओ वापस ले लिया है, जिससे वैश्विक कच्चे माल तक पहुंच हासिल हो गई है। कच्चे माल की कीमतें पहले से ही गिर रही हैं, जिससे निर्माताओं को प्रतिस्पर्धा करने का वास्तविक मौका मिल रहा है।
दूसरा, श्रम सुधारों ने औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत श्रमिक सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 कर दिया है, जबकि तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्य अब काम के समय में लचीलापन बरतने की अनुमति देते हैं। इससे कारखानों के लिए साल भर कर्मचारियों को काम पर रखना, विस्तार करना और चलाना आसान हो जाता है।
तीसरा, भारत मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से अमेरिकी टैरिफ से हुए नुकसान को कम कर रहा है। भारतीय परिधानों को ब्रिटेन और यूरोपीय संघ (ईयू) में 8-12 फीसदी और अमेरिका में 22 फीसदी तक शुल्क का सामना करना पड़ता था जबकि वियतनाम और बांग्लादेश शून्य शुल्क का भुगतान करते थे। भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता पूरा होने और यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ बातचीत आगे बढ़ने के साथ, हाल ही में अमेरिका की तरफ से व्यापार के मोर्चे पर उठाए गए कदमों के बावजूद टैरिफ समानता करीब है।
अंत में, सरकार ने वस्तुओं और सेवाओं की कर विसंगतियों को ठीक कर दिया है, जिसमें तैयार परिधानों की तुलना में रेशे और धागे पर अधिक दरों पर कर लगाया जाता था। इससे नकदी प्रवाह में सुधार हुआ है और कारखानों को पूरी तरह से संचालित करने का मौका मिलता है।
भारत को अब क्या करना चाहिए: सबसे महत्त्वपूर्ण विकृतियों के दूर हो जाने के बाद, भारत को अब उस दूसरे स्तर की चुनौती को दूर करना चाहिए जो इस क्षेत्र को पीछे खींच रहा है। सबसे पहले, फाइबर और धागे के कम मूल्य वाले निर्यात को प्रोत्साहित करना बंद करें। वर्तमान छूटें वास्तव में इन्हें घरेलू स्तर की तुलना में विदेश में बेचना सस्ता बनाती हैं, जिससे भारतीय परिधान निर्माताओं को किफायती कच्चे माल की कमी हो जाती है। भारत को कच्चे माल नहीं, तैयार परिधान को बढ़ावा देना चाहिए।
दूसरा, भारत की वस्त्र श्रृंखला यानी बुने हुए कपड़े और इसके प्रसंस्करण की सबसे कमजोर कड़ी को ठीक करें। भारत बहुत अधिक धागे का निर्यात करता है लेकिन इसके पास वैश्विक कपड़ा बाजार का केवल 6 फीसदी हिस्सा है क्योंकि इसकी बुनाई और प्रसंस्करण इकाइयां छोटी, पुरानी और असंगठित हैं। धागे की ताकत को कपड़े के क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता की भूमिका में बदलने के लिए भारत को बड़े, आधुनिक, एकीकृत बुनाई और प्रसंस्करण पार्क बनाने चाहिए। चीन ने इसी तरह कपड़े के क्षेत्र में अपनी ताकत बनाई है।
तीसरा, निर्यात के नियमों को सुधारें। अभी जो नियम है, उसके हिसाब से अगर कोई निर्यातक बाहर से कपड़ा मंगाता है, तो उसे यह हिसाब देना होता है कि उस कपड़े से उसने कौन सा परिधान बनाया। बड़ी-बड़ी कंपनियों में सैकड़ों तरह के कपड़े और डिजाइन बनते हैं, इसलिए ये हिसाब रखना लगभग नामुमकिन है। इसकी जगह, भारत को बांग्लादेश की तरह नियम बनाना चाहिए। बांग्लादेश में कंपनियों को उनके निर्यात के मूल्य के हिसाब से कुछ फीसदी तक कच्चा माल आयात करने की छूट मिल जाती है।
आखिर में, सीमा शुल्क के नियमों को आसान बनाया जाए ताकि बटन, जिप और लेबल जैसी छोटी-मोटी चीजों को बिना आयात शुल्क के मंगाया जा सके। इसके लिए सिर्फ घोषणा करनी हो और जोखिम के हिसाब से जांच हो। अभी के नियम में तो कम कीमत वाली चीजों के लिए भी बहुत जानकारी देनी पड़ती है।
कंपनी स्तर पर पहल: भारत के जो बड़े कपड़ा निर्यातक हैं, उन्हें अब सिर्फ विदेशी ब्रांडों के लिए माल आपूर्ति करने का काम बंद करना होगा। उन्हें अपने खुद के डिजाइन और लेबल बनाने होंगे, और ‘फास्ट फैशन’ का तरीका सीखना होगा जिसमें कपड़े कुछ ही हफ्ते में डिजाइन से दुकान तक पहुंच जाते हैं। अधिक पैसे कमाने के लिए, उन्हें महंगे सिंथेटिक कपड़ों, ब्रांडेड कपड़ों और नए तरह के मिश्रित कपड़ों का इस्तेमाल करना होगा, जो दुनिया के बाजारों में छाए हुए हैं। सिर्फ कम टैरिफ पर ध्यान देने के बजाय, कपड़ों की गुणवत्ता अच्छी रखनी होगी तभी वे तरक्की कर पाएंगे।
सबसे जरूरी काम ये है कि कारखानों को बेहतर बनाया जाए। भारत में कपास के कपड़ों के लिए करीब 1,200 कारखाने हैं जो ‘फास्ट फैशन’ के हिसाब से काम करते हैं, लेकिन सिंथेटिक कपड़ों के लिए ऐसे बहुत कम कारखाने हैं। लगभग 80 फीसदी निर्यातक अभी भी कुछ जरूरी बातों पर ध्यान नहीं देते हैं जैसे कि एक कपड़े को बनाने में कितना समय लगना चाहिए।
जापान एक उदाहरण है: मुक्त व्यापार समझौते के तहत दस साल तक कोई कर नहीं लगने के बावजूद, भारत से होने वाला निर्यात लगभग नहीं बढ़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारतीय कंपनियों ने जापान के ऊंचे दर्जे की गुणवत्ता और काम करने के तरीकों को नहीं अपनाया। अब भी लाखों नई नौकरियां और एक बहुत बड़ा वैश्विक बाजार मिल सकता है, अगर कपड़ा बनाने वाली कंपनियां साहस दिखाएं।
(लेखक जीटीआरआई के संस्थापक हैं)