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जीएम फसलों को अपनाने में देरी का सर्वाधिक नुकसान किसानों को

Last Updated- December 15, 2022 | 1:35 AM IST

बीटी बैगन की देश में विकसित दो किस्मों को जैविक सुरक्षा परीक्षण की मंजूरी मिलते ही जीन संवद्र्धित (जीएम) फसलों को लेकर चला आ रहा विवाद पुन: भड़क उठा। जबकि 10 वर्ष पहले ऐसे परीक्षणों पर रोक लगा दी गई थी। हालांकि इस मंजूरी का कोई खास मतलब नहीं होगा जब तक कि नए जीएम उत्पादों पर लगी रोक को नहीं हटा लिया जाता। अब तक उसका कोई संकेत नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य सरकारी अधिकारी लगातार विज्ञान और नवाचार आधारित विकास की बात करते रहते हैं।
बीटी-कॉटन सन 2002 में देश में आया और वह इकलौती जीएम फसल है जिसकी खेती की मंजूरी दी गई  है। इसका सीधा लाभ देश में कपास क्रांति के रूप में देखने को मिला। परंतु अब यह सफलता भी कारगर नहीं रही क्योंकि पुराने पड़ चुके बीटी-कॉटन हाइब्रिड की जगह नई जीन संवद्र्धित किस्में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध ही नहीं हैं।
बीटी बैगन की जिन किस्मों को जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रैजल कमेटी (जीईएसी) ने जमीनी परीक्षण की मंजूरी दी है उनके नाम हैं ‘जनक’ और ‘बीएसएस-793।’ इन किस्मों में सीआरवाईएफए1 (इवेंट 142) नामक कीटनाशक जीन शामिल है। इस जीन को मिट्टी में पाए जाने वाले जीवाणु बैसिलस थुरिंगजीनेसिस (बीटी) से प्राप्त किया गया है। यह जीन कीटों के पाचन तंत्र में जो प्रोटीन बनाता है वह उनके लिए जानलेवा साबित होता है। ये किस्में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (पूर्व में राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी शोध केंद्र) में विकसित की गई हैं और इनका लाइसेंस बीज शीतल रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड जालना के पास है जो आगे परीक्षण और वाणिज्यिक उपयोग शुरू करेगा।
यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि जीईएसी की स्वीकृति के पहले कई तरह की शर्तों से गुजरना होता है। उनमें से कुछ तो केवल असहजता पैदा करने के लिए लगाई गई हैं। नियामक  ने अगले तीन साल में परीक्षण के लिए आठ राज्य चिह्नित किए हैं- मध्य प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल। परंतु तकनीकी परीक्षकों को इनमें से हर राज्य से अनापत्ति प्रमाण पत्र और जमीन की उपलब्धता की मंजूरी की जरूरत होगी। इसके अलावा इन परीक्षण में शामिल वैज्ञानिकों के नाम भी जीईएसी को देने होंगे। परीक्षण के नतीजे राज्य जैवविविधता बोर्डों और पंचायत जैव विविधता प्रबंधन समितियों से साझा करने होंगे। अब भला पंचायत स्तर की समितियों में इन वैज्ञानिक कदमों की समीक्षा करने क्या काबिलियत होगी यह सोचने वाली बात है। जाहिर है इरादा प्रक्रिया में देरी करने का है।
यह पहला मौका नहीं है जब इस तकनीक को ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसैंटों की भारतीय अनुषंगी माहिको ने कुछ राज्यों के विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग करके बीटी-बैगन की प्रजाति विकसित की थी तो उसे भी तमाम परीक्षणों से गुजरना पड़ा था। इन नतीजों को जीईएसी ने मंजूरी दी थी। इसके बावजूद सन 2009 में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने चुनिंदा लेकिन मुखर जीएम विरोधी लॉबीइस्ट के कहने पर इसका वाणिज्यिक इस्तेमाल नहीं होने दिया। बाद में इसी बीटी बैगन की बांग्लादेश में सफलतापूर्वक खेती की गई और वहां मानव जीवन या पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।
सरकार को शायद अंदाजा नहीं है कि इस पूरी कवायद में केवल किसानों को ही नुकसान हो रहा है क्योंकि उन्हें बेवजह एक उपयोगी तकनीक के लाभ से वंचित होना पड़ रहा है। यह विडंबना ही है कि जीएम तकनीक का विरोध करने वालों द्वारा फैलाया गया प्रोपगंडा वैज्ञानिक समुदाय के प्रमाणित शोध पर भारी पड़ रहा है। याद रहे कि सन 2016 में दुनिया भर के 109 नोबेल विजेताओं ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर जैव प्रौद्योगिकी विरोधी लॉबी से कहा था कि वे केवल भावनात्मक और बिना ठोस आधार के जीएम खाद्य पदार्थों की आलोचना करना बंद कर दें। उन्होंने यह भी कहा कि पयार्वरण, मनुष्य या जानवरों पर जीएम उत्पाद के नकारात्मक प्रभाव का कोई पुष्ट मामला शायद ही सामने आया है। दुनिया के कई देशों में काफी पहले से यानी सन 1995 से ही जीएम उत्पादों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यदि कोई दुष्प्रभाव होते तो अब तक सामने आ गए होते।
भारत में बीटी कॉटन की खेती सन 2002 से हो रही है। इसके बीच नियमित रूप से पशुओं को खिलाए जाते हैं और उनका दूध मनुष्य इस्तेमाल करते हैं। हाल के वर्षों में कई जगहों पर बिना प्रमाण जीएम बीज मसलन बीटी-बैगन और बीटी सरसों की खेती भी किसानों द्वारा की जा रही है। वह उपज बाजार में गैर जीएम उपज में मिल जाती है और लोग अनजाने में उसका सेवन कर रहे हैं। यानी बीटी जीन अब मानव खाद्य शृंखला और पर्यावरण का हिस्सा बन चुका है लेकिन इसका कोई नुकसान नजर नहीं आया।
सरकार और जीएम विरोधी लॉबी को यूरापेक के जाने माने पर्यावरण कार्यकर्ता मार्क लाइनास के अनुभव से सबक लेना चाहिए। वह 2008 तक यूरोप में जीएम विरोधी अभियान में शामिल थे लेकिन बाद में इसके कट्टर समर्थक बन गए।
विज्ञान और पर्यावरण मामलों से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने भी जीएम फसलों के लाभ और सुरक्षा के कड़े वैज्ञानिक आकलन के बाद उनका समर्थन किया। इस संबंध में समिति की अनुशंसा 25 अगस्त, 2017 को सदन में पेश ‘जेनेटिकली मोडिफाइड क्रॉप्स ऐंड देयर इंपैक्ट ऑन एन्वॉयरनमेंट’ नामक रिपोर्ट से सामने आई। इससे भी अहम बात यह कि उसने जीएम फसलों के बिना पूर्वग्रह आकलन के लिए जैव प्रौद्योगिकी नियामकीय ढांचे के पुनर्गठन की बात कही। सर्वदलीय संसदीय समिति की इन सलाहों को स्वीकार करना और उनका क्रियान्वयन करना आवश्यक है।

First Published - September 22, 2020 | 12:17 AM IST

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