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बड़े बैंक चाहिए या अधिक फुर्तीले बैंक? तकनीकी बदलाव के बीच बदलाव के लिए तैयार सेक्टर

तेजी से बढ़ते तकनीकी नवाचार और उसी गति से बदलती ग्राहकों की अपेक्षाओं के बीच बैंकिंग क्षेत्र बड़े बदलाव के लिए तैयार नजर आ रहा है

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आर जगन्नाथन   
Last Updated- December 08, 2025 | 11:07 PM IST

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ इस बारे में चर्चा कर रही है कि विलय की पिछली प्रक्रिया में बाकी रह गए छह सरकारी बैंकों का समेकन किया जाए। इन बैंकों में बैंक ऑफ इंडिया जैसा बड़ा बैंक भी शामिल है और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, पंजाब ऐंड सिंध बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और यूको बैंक जैसे मझोले और छोटे बैंक भी शामिल हैं। 

बड़ा सवाल यह है कि हमें बड़े बैंकों की आवश्यकता है या अधिक तेजी से काम करने वाले फुर्तीले बैंकों की? ऐसा नहीं है कि बैंकिंग में आकार महत्त्वपूर्ण नहीं है लेकिन फुर्ती एक ऐसी चीज है जो भविष्य में बचे रहने और नाकाम होने में अहम अंतर करेगा। खासकर तब जबकि आने वाले समय में फिनटेक, म्युचुअल फंड्स, बड़ी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और यहां तक कि बड़े निकाय भी बैंकिंग क्षेत्र में निवेश पर विचार कर सकते हैं।

यह क्षेत्र बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहा है। इसमें संदेह नहीं कि विदेशी कंपनियां भारतीय बैंकों और फिनटेक में हिस्सेदारी खरीदना चाहती हैं। कुछ वर्ष पहले सिंगापुर के डीबीएस ने लक्ष्मी विलास बैंक का अधिग्रहण किया। अभी हाल ही में निजी क्षेत्र के दो छोटे बैंकों येस बैंक और आरबीएल बैंक का दो विदेशी बैंकों ने अधिग्रहण कर लिया, सुमितोमो मित्सुई फाइनैंशियल ग्रुप और एमिरेट्स एनबीडी। 

स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक की इस सोच में बदलाव आ रहा है कि विफल होते हुए बैंकों का बड़े सरकारी या निजी बैंकों में विलय किया जाए। परंतु, प्रौद्योगिकी और ग्राहक आवश्यकताओं में बदलते रुझानों के संदर्भ में, इसे और भी तेजी से बदलना होगा। जब प्रतिस्पर्धा तेज होने वाली है, तब इसे विनियमन से जुड़ी समस्याओं के लिए और अधिक नए समाधान खोजने होंगे।

मानसिकता में पहला बदलाव शायद कॉरपोरेट प्रवर्तकों के संबंध में हो सकता है। बहुत बड़ी कंपनियां जो एनबीएफसी का संचालन कर रही हैं, उनके पास प्रबंधन के लिए बहुत अधिक संपत्ति है। उदाहरण के लिए, बजाज फाइनैंस की समेकित परिसंपत्ति करीब 4.6 लाख करोड़ रुपये की है। यानी उसका व्यवस्थागत जोखिम मझोले आकार के बैंकों के संभावित जोखिम से कतई कम नहीं है। आदर्श हालात में इतने बड़े बैंकों को पारंपरिक बैंक में बदल दिया जाना चाहिए। परंतु रिजर्व बैंक काॅरपोरेट स्वामित्व वाले बैंक के विचार के विरुद्ध है।

बात यह है कि अगर उन पर बड़ी एनबीएफसी संचालित करने के लिए भरोसा किया जा सकता है तो बैंक चलाने के लिए क्यों नहीं? रिजर्व बैंक की हिचक के ऐतिहासिक कारण हैं। राष्ट्रीयकरण के पहले बैंक अपने ही प्रवर्तकों की कंपनियों को ऋण दिया करते थे जिससे बड़ी समस्याएं उठ खड़ी होती थीं। लेकिन आज जबकि कंपनियां पहले से ही भुगतान बैंक चला रही हैं, तो कठोर नियमन और निगरानी के बीच वे पारंपरिक बैंक भी चला सकती हैं।

इसे एक और तरह से भी देखा जा सकता है। जैसे-जैसे एनबीएफसी का आकार बढ़ता है उनका जोखिम किसी तरह बैंकों से कम नहीं रहता। फर्क बस यह है कि वे असीमित जमा नहीं बटोर सकते। लेकिन जब पेमेंट बैंक सैद्धांतिक रूप से उपयोगकर्ता आधार का विस्तार करके असीमित देनदारियां जुटा सकते हैं (निस्संदेह प्रति खाते की सीमा लगभग 2 लाख रुपये है, जो नियमन में ढील दिए जाने पर लगभग 5 लाख रुपये तक बढ़ सकती है), तब कंपनियों को बैंक चलाने की अनुमति न देने का तर्क और अधिक कमजोर होता जाएगा। दिग्गज एनबीएफसी निश्चित रूप से बैंकों को चलाने की जिम्मेदारी निभाने के लिए भरोसेमंद मानी जा सकती हैं, क्योंकि यदि वे गलती करती हैं तो उन्हें प्रतिष्ठा को होने वाले नुकसान के रूप में अधिक हानि उठानी पड़ेगी।

अगर रिजर्व बैंक सही मायनों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और उपभोक्ताओं की बेहतर सेवा करना चाहता है तो उसे कुछ अन्य बातों पर विचार करना चाहिए। इसकी शुरुआत विदेशी बैंकों को संकटग्रस्त बैंकों का अधिग्रहण करने की अनुमति देने से हुई थी, लेकिन कुछ समय बाद ऐसे बैंक जिनमें कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के भी शामिल हैं दबाव महसूस करने लगेंगे, क्योंकि बैंक जमा धीरे-धीरे म्युचुअल फंडों की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं?

अब फुर्तीला धन प्रबंधन जरूरी है न कि केवल जमा जुटाने की लागत और ऋणों पर ब्याज अर्जित करने के बीच उचित अंतर। जैसे-जैसे बचतकर्ता म्युचुअल फंड में बेहतर अवसर देख रहे हैं,  यह अंतर कम हो रहा है। बहुत जल्द म्युचुअल फंड अपनी योजनाओं से निकासी के लिए चेक जारी करना शुरू कर देंगे, जिससे बचत और चालू खातों की तरह ही व्यवस्था दिखाई देगी। इस तरह जमा जुटाने और म्युचुअल फंड निवेश के बीच की रेखा धीरे-धीरे धुंधली होने लगेगी। 

म्युचुअल फंड अब बैंक जमाओं के लगभग 33 से 35 फीसदी के बराबर हिस्सा रखते हैं, जो एक दशक पहले करीब 10 से 12 फीसदी था। ऐसे में कुछ वर्षों में, उनके पास बैंकों जितना धन हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि बैंक जमा में कमी आएगी, परंतु उसमें ठहराव आ सकता है। इसका अर्थ यह है कि ट्रेजरी प्रबंधन को और अधिक धारदार बनाना होगा। भुगतान बैंक जिनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी जमा का 75 फीसदी हिस्सा एक वर्ष तक की अवधि वाले अल्पकालिक प्रतिभूतियों में रखें, वे अच्छे कोष प्रबंधक भी बन जाएंगे क्योंकि यही कम अवधि के लिए उपलब्ध धन उन्हें कुछ मार्जिन मुहैया कराएगा। 

यूपीआई के तेज विस्तार के बीच बैंक नहीं बल्कि जीपे, फोनपे और पेटीएम आदि फिनटेक ही ग्राहकों के अरबों रुपये के मासिक लेनदेन का प्रबंधन करती हैं। जीपे और फोनपे मिलकर 80 फीसदी लेनदेन संभालती हैं। भले ही वे अभी धन नहीं अर्जित कर पा रही हों लेकिन उनके पास किसी भी बैंक से अधिक ग्राहकों के डेटा हैं। इस बीच और अधिक फिनटेक कंपनियों का आगमन होगा। डेटा बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है इसलिए जिनके पास डेटा है वे कई चीजों की बिक्री कर सकते हैं। यह जाहिर सी बात है कि गूगल डेटा का उपयोग करके उत्पाद बेचने और विज्ञापन से पैसे कमाने में किसी भी बैंक से बेहतर ही रहेगा। बैंक बड़े बदलाव के मुहाने पर हैं।

गत अक्टूबर तक गैर सूचीबद्ध फोनपे के कारोबार का मूल्यांकन करीब 14.5 अरब डॉलर था। यह बैंक ऑफ महाराष्ट्र से तीन गुना है। रिजर्व बैंक को खुद से यह पूछना चाहिए कि क्या एक बेहतर नियमन वाली फिनटेक कंपनी छोटे बैंकों या अन्य बैंकों की बेहतर स्वामी नहीं होगी?

संक्षेप में कहें तो, चाहे आप सरकार हों और बहुत सारे बैंकों (बड़े या छोटे) के मालिक हों, या नियामक हों, जिसे उनकी निगरानी करनी है और यह सुनिश्चित करना है कि उनमें से कोई भी प्रणालीगत जोखिम पैदा न करे, केवल बड़े बैंकों के बारे में सोचना पर्याप्त नहीं है। हालांकि हमें ऐसे बड़े बैंकों की आवश्यकता है जो समग्र बैंकिंग कर सकें या परियोजनाओं की फंडिंग और विलय-अधिग्रहण में शामिल जोखिमों का भार उठा सकें। लेकिन अधिकांश बैंक और एनबीएफसी को लगातार बदलती बाजार आवश्यकताओं के अनुरूप फुर्ती और अनुकूलन पर ध्यान केंद्रित करना होगा। विशेष रूप से उभरती गिग अर्थव्यवस्था में, जहां आपकी परिसंपत्ति वृद्धि की अपेक्षाओं को आधार देने के लिए आसान ईएमआई उपलब्ध नहीं हैं।

बड़े तकनीकी नवाचार और तेजी से बदलती ग्राहकों की अपेक्षाओं के दौर में बैंकों और नियामकों को पहले से अधिक तेजी दिखानी होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : December 8, 2025 | 11:07 PM IST