प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
Budget 2026: इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि नीतिगत समर्थन भारत के म्युचुअल फंड उद्योग की अगली विकास यात्रा को दिशा देने में अहम भूमिका निभा सकता है। खासतौर पर थीमैटिक, सॉल्यूशन-ओरिएंटेड और डेट फंड सेगमेंट में इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है। निवेशकों के हितों की रक्षा करते हुए इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट नियम (Clearer regulations), लक्षित प्रोत्साहन (targeted incentives) और मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (digital infrastructure) को जरूरी माना जा रहा है।
म्युचुअल फंड प्रोडक्ट्स में इनोवेशन के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती नियामकीय अस्पष्टता मानी जा रही है। बीपीएन फिनकैप के डायरेक्टर ए.के. निगम कहते हैं, “अगर यह साफ किया जाए कि थीमैटिक फंड और सेक्टोरल फंड में क्या अंतर है, तो एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMCs) ज्यादा भरोसे के साथ नए प्रोडक्ट तैयार कर सकेंगी। इसके अलावा, नियंत्रित ढांचे के तहत वैकल्पिक परिसंपत्तियों जैसे एसेट क्लास की अनुमति पर दोबारा विचार करने से उत्पादों का दायरा बढ़ सकता है।”
उन्होंने आगे कहा कि आम श्रेणियों (common categories) के लिए मॉडल प्रोडक्ट डॉक्यूमेंटेशन उपलब्ध कराने से नए फंड लॉन्च की प्रक्रिया तेज होगी और अनुपालन से जुड़ी देरी भी कम हो सकती है।
फाइनैंशियल प्रोडक्ट्स में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) को प्रोत्साहन देना भी ऐसा क्षेत्र है, जहां नीतिगत हस्तक्षेप का बड़ा असर हो सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि डेटा साइंस, एनालिटिक्स और प्रोडक्ट डेवलपमेंट में निवेश करने वाली एसेट मैनेजमेंट कंपनियों को अगर टैक्स क्रेडिट जैसे वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाएं, तो रिसर्च-आधारित फंड डिजाइन को बढ़ावा मिल सकता है।
इसके अलावा, शिक्षण संस्थानों, वित्तीय कंपनियों और नियामकों के बीच ज्वाइंट रिसर्च के लिए अनुदान देने से भी फायदा हो सकता है। इससे निवेशकों के लिए ज्यादा मजबूत थीमैटिक और रणनीति-आधारित इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स तैयार किए जा सकेंगे।
रिटायरमेंट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे लंबी अवधि के लक्ष्यों पर फोक्स्ड सॉल्यूशन-ओरिएंटेड फंड्स को भी बेहतर नीतिगत समर्थन से लाभ मिलने की उम्मीद है। AMFI ने भी अपने बजट प्रपोजल में सरकार से मांग की है कि म्युचुअल फंड्स को ऐसे पेंशन-फोक्स्ड स्कीम लॉन्च करने की अनुमति मिले, जिनमें नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) जैसे टैक्स लाभ मिलें। इसे म्युचुअल फंड लिंक्ड रिटायरमेंट स्कीम (MFLRS) कहा जा रहा है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि लंबे समय के निवेश से जुड़े टैक्स प्रोत्साहन इन फंड्स को ज्यादा लोकप्रिय बना सकते हैं। VSRK कैपिटल के डायरेक्टर स्वप्निल अग्रवाल ने कहा कि पेंशन-स्टाइल म्युचुअल फंड स्कीम्स, वॉलंटरी रिटायरमेंट अकाउंट और डेट-लिंक्ड सेविंग्स स्कीम जैसे रिटायरमेंट- फोक्स्ड उपायों पर दिया गया जोर वित्तीय भविष्य को सुरक्षित करने और समझदारी भरे निवेश व्यवहार की ओर बढ़ते कदम को दर्शाता है।
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डिजिटल डिस्ट्रीब्यूशन और वित्तीय समावेशन (financial inclusion) को मजबूत करना भी नीतिगत समर्थन का एक अहम पहलू बना हुआ है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जरूरत है, जो आपस में जुड़े हों और निवेशकों की ऑनबोर्डिंग को आसान बनाएं।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, फिनटेक कंपनियों और एसेट मैनेजमेंट कंपनियों की साझेदारी को अगर टैक्स प्रोत्साहन या अनुदान मिले, तो एआई और मशीन लर्निंग आधारित सलाह तेजी से अपनाई जा सकती है। इससे दूरदराज और कम सेवाएं पाने वाले वर्गों तक म्युचुअल फंड निवेश की पहुंच बढ़ाने में मदद मिलेगी।
मैक्रो स्तर पर, भारत की फिस्कल कंसोलिडेशन की कहानी फिक्स्ड इनकम और डेट फंड निवेशकों के लिए स्थिरता प्रदान कर रही है। मिरे असेट में फिक्स्ड इनकम के हेड बसंत बाफना कहते हैं, “सरकार लगातार राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। आने वाले पांच वर्षों में कर्ज-से-जीडीपी अनुपात (debt-to-GDP ratio) मौजूदा लगभग 56 फीसदी से घटकर करीब 50 फीसदी होने की उम्मीद है। इसमें मजबूत आर्थिक वृद्धि की अहम भूमिका होगी।”
उन्होंने आगे कहा कि यह वृद्धि मुख्य रूप से सरकार के निरंतर पूंजीगत खर्च और जीएसटी सरलीकरण से मिलने वाले लाभों से आएगी। हालांकि, निकट अवधि में राजस्व पर दबाव बना रह सकता है, जिससे विनिवेश और एसेट मोनेटाइजेशन पर निर्भरता बढ़ सकती है।
एक्सपर्ट्स आगामी बजट से यह उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार लंबी अवधि में विकास के साथ-साथ फिस्कल कंसोलिडेशन पर अपना फोकस बनाए रखेगी। ऐसे में फिक्स्ड इनकम निवेश का आउटलुक स्थिर बना हुआ है। खर्च और कर्ज में कमी के बीच संतुलन बनाने को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता को देखते हुए किसी बड़े या अचानक नीतिगत बदलाव के संकेत नहीं मिलते, जिनकी वजह से पोर्टफोलियो में बदलाव करना पड़े।
इस नजरिये से देखा जाए तो निवेशकों को केंद्रीय बजट से पहले अपने डेट निवेश में किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं है, क्योंकि फिस्कल कंसोलिडेशन और आर्थिक वृद्धि की दिशा फिलहाल बनी हुई है।