वार्ताओं में चीन एक जानी पहचानी रणनीति अपनाता है: सैद्धांतिक रूप से किसी बात पर सहमत होना और व्यवहार में उस पर बिल्कुल अमल न करना। या ऐसी प्रतिबद्धता जताना जिसे निभाने का उसका कोई इरादा नहीं होता। बाद में विवाद खड़ा करना या गड़बड़ी करना अथवा जमीन पर नए तथ्यों का निर्मााण करना ताकि नए सिरे से दबाव बनाया जाए और नए सिरे से वार्ता करके और अधिक रियायतें हासिल की जाएं। इस प्रकार वार्ता एक अंतहीन निरंतर प्रक्रिया में बदल जाती है। जो लोग चीन के साथ भारत की सीमा संबंधी वार्ताओं का इतिहास जानते हैं, उन्हें पता है कि इस सिलसिले को आज तक अमल में लाया जा रहा है। भारत के खिलाफ यह रणनीति कारगर रही है लेकिन दक्षिण चीन सागर में यह कामयाब हो भी सकती है और नहीं भी। बावजूद चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा बनाए नियमों को धता बताने में कामयाब रहा, उसने बाजार पहुंच को हथियार बनाकर वैश्विक कंपनियों को अपने आदेश मानने पर विवश किया। भारत ने भी ऐसे ही तौर तरीके अपनाए हालांकि उसे बहुत अच्छे नतीजे नहीं मिले। या तो वह चीन की तरह चतुर नहीं है या फिर उसका रसूख उतना नहीं है। नतीजे में उसे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता मंचों तथा न्यायालय में एक के बाद एक झटकों का सामना करना पड़ा (वोडाफोन, देवास, एमेजॉन आदि), यहां तक कि डब्ल्यूटीओ ने भी कारोबारी विवाद के मामलों में बार-बार भारत के खिलाफ निर्णय दिए हैं।
विदेश में भारतीय परिसंपत्तियों की जब्ती की कार्रवाई हुई है। ऐसी जब्ती को लेकर शर्मिंदगी वाली खबरें सामने आने पर सरकार प्रतिक्रिया देने में संघर्ष करती रही। उसने भारतीय अदालतों का इस्तेमाल करके निवेश गारंटी समझौतों (आईजीए) के तहत दिए गए मध्यस्थता निर्णयों को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया, साथ ही उसने विवादों को निपटाने के लिए मौखिक सौदेबाजी की। यहां तक कि कुछ वर्ष पहले सरकार ने खामोशी से 58 ऐसे आईजीए रद्द कर दिए जिन पर उसने 1990 के दशक में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए हस्ताक्षर किए थे। वोडाफोन ने अपने कर का मामला हॉलैंड के साथ हुए आईजीए के तहत लड़ा। अवपीड़क नियामकीय कदम उठाने के प्रयास भी किए गए। सवाल यह उठता है कि क्या देश के कारोबारी/विधिक/राजनैतिक व्यवहार में कुछ कमी है जिसे दूर करना जरूरी है? यदि हर रक्षा सौदे पर रिश्वत का इल्जाम लगेगा, आपूर्तिकर्ता को काली सूची में डाला जाएगा तो आपूर्तिकर्ता नहीं बचेंगे। कुछ हथियार प्रणालियों के मामले में ऐसा हो भी चुका है। यदि रक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी निविदा असंभव हो चुकी है तो पहले से चयन करना ही इकलौता विकल्प बचता है। बावजूद देवास के संदर्भ में एक आरोप यह भी था कि कोई बोली नहीं आमंत्रित की गई। यह संभव है कि कोई सरकार यह मानते हुए अपने ही नागरिकों के साथ रिश्तों में मनमाने बदलाव लाती हो कि लिखित अनुबंध अंतिम शब्द नहीं होता। ऐसे में संभव है कि लिखित अनुबंध का मसौदा लापरवाही से तैयार किया गया हो, उसे बनाने में दिमाग का इस्तेमाल न किया गया हो। देवास अनुबंध से 1,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिला जबकि कुल हर्जाना 15,000 करोड़ रुपये घोषित हुआ। यह मामला एनरॉन से अलग नहीं था। बिजली परियोजना की सौदेबाजी करने वालों ने इस बात का आंतरिकीकरण नहीं किया था कि गैस आधारित बिजली संयंत्र कोयला संयंत्र की तुलना में आसानी से उच्च क्षमता हासिल कर सकते हैं। ऐसे में उस अनुबंध को बहुत उदार माना गया जो हासिल करने की दृष्टि से कठिन क्षमता इस्तेमाल के अनुमान पर भी अत्यधिक ऊंचे प्रतिफल की पेशकश करे। इसके भयावह नतीजे महाराष्ट्र राज्य बिजली बोर्ड के दिवालिया होने की आशंका के रूप में सामने आए। इसका निरस्त होना अनिवार्य था।
शुरुआती गलती के बाद कई बार हालात अधिक नाकामी भरे या हास्यास्पद हो जाते हैं। देवास मामले में सरकार के अनुबंध रद्द करने की वजह उससे अलग थी जो सर्वोच्च न्यायालय ने अब घोषित (धोखाधड़ी) की है। एंट्रिक्स के तत्कालीन चेयरमैन जी. माधवन नायर, जिन पर पिछली सरकार ने देवास को अवांछित लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया था, उन्हें भाजपा ने पार्टी में शामिल कर लिया। अब जब फर्जीवाड़ा सामने है तो क्या पार्टी माधवन नायर को त्यागेगी? कुछ लोग एक अनुबंध को रिश्ते की शुरुआत के रूप में देख सकते हैं जबकि विवादी संस्कृतियों में इसे पारिभाषिक शब्द के रूप में देखा जाता है जिसे सुविधा के साथ इस्तेमाल किया जाए। बावजूद अन्य लोग इसे सुविधा के अस्थायी उपाय के रूप में देख सकते हैं। यकीनन शक्ति संतुलन में बदलाव के साथ भूमिकाएं बदल सकती हैं। ऐसे में अनुबंध संबंधी वार्ताओं और डब्ल्यूटीओ के मंचों में वकीलों की फौज अक्सर भारतीय वार्ताकारों को बिना तैयारी के पकड़ लेती है। हमें अपने अनुभव से सीखना चाहिए कि अस्पष्ट रुख की कीमत चुकानी पड़ती है। इसलिए हस्ताक्षर करने के पहले तैयारी करके रखें।