पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) तथा ओपेक प्लस के अंदरूनी विवाद की वजह से निकट भविष्य में कच्चे तेल के उत्पादन को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। आने वाले दिनों में तेल कीमतों में महंगाई बने रहने के आसार हैं क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के कारण मांग में इजाफा देखा जा रहा है। ऐसे में अगर ईंधन निर्यातक देश उत्पादन बढ़ाने को तैयार हो जाते हैं तो भी कीमतें तेज बनी रहेंंगी। ऐसे में भारत के विदेशी मुदा खाते पर दबाव और मुद्रास्फीति में तेजी बने रहने के आसार हैं। अप्रैल 2020 में तेल निर्यातक देशों के समूह में इस बात पर सहमति बनी थी कि विश्व अर्थव्यवस्था में गिरावट के बाद ईंधन कीमतों के समर्थन के लिए उत्पादन में दो वर्षों तक कटौती की जाएगी। परंतु तेज गति से टीकाकरण और तेज आर्थिक सुधार की वजह से ईंधन की मांग में भी गति आई है।
वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमत 2021 में ही 50 फीसदी से अधिक बढ़ गई है। इसकी वजह से तेल निर्यातक देशों को उत्पादन कोटे की समीक्षा करनी पड़ी। बहरहाल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात राष्ट्रीय कोटा आवंटन की प्रविधि पर सहमत नहीं हैं। ऐसे में अगस्त में वैश्विक तेल आपूर्ति में इजाफा होने की संभावना नहीं है। इस बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। घरेलू गैस सिलिंडर की कीमत में भी इजाफा हुआ है। तेल विपणन कंपनियों द्वारा खुदरा कीमतों में इजाफे के अलावा पेट्रोलियम उत्पादों पर कर और शुल्क भी काफी अधिक हैं। वर्ष 2020-21 में केंद्र और राज्यों को पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले कर से कुल मिलाकर 6.7 लाख करोड़ रुपये का कर राजस्व हासिल हुआ। यह 2019-20 में हासिल हुए 5.5 लाख करोड़ रुपये के राजस्व से अधिक है जबकि इस बीच महामारी और लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियों और मांग में कमी आई। चालू वित्त वर्ष में राजकोष में ईंधन से हासिल होने वाले करों का योगदान और बढऩे की आशा है। तेल एवं गैस की बढ़ी कीमतें व्यापार घाटे पर दबाव डालती हैं। हम अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल और 50 फीसदी गैस आयात करते हैं। उच्च शुल्क दरों का यह भी एक कारण है। कार्बन कर की वजह से भी शुल्क बढ़ा है। इससे पर्यावरण को कम नुकसानदेह तकनीक अपनाने का प्रोत्साहन बढ़ा है। परंतु तमाम वैकल्पिक प्रयासों के बावजूद आने वाले वर्षों में भारत जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहेगा। नीति निर्माताओं के लिए बेहतर होगा कि वे तेल एवं गैस का घरेलू उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करें और ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) जैसी कंपनियों को विदेश में ईंधन स्रोत तलाशने के लिए प्रोत्साहन दें। घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन पांच वर्ष से स्थिर है। ओएनजीसी तथा ऑयल इंडिया लिमिटेड ने कोई नई खोज नहीं की है और मौजूदा तेल क्षेत्र पुराने हो रहे हैं। नीतिगत मोर्चे पर कुछ सार्थक बदलाव हुए हैं। उदाहरण के लिए सरकार ने ओपन एक्रेज लाइसेंसिंग नीति अपनाई है जिससे खनन करने वालों को संभावित तेल क्षेत्र के भूगर्भीय आंकड़ों की जांच और बोली लगाना आसान हुआ है।
एनईएलपी और उसके बाद एचईएलपी अधीन होने वाली नीलामियों को लेकर उत्साह नहीं नजर आया। विदेशी ऊर्जा कंपनियों का दावा है कि उन्हें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पहले काफी लालफीताशाही का सामना करना पड़ता है। तेल खनन और उत्पादन को लेकर कर व्यवहार भी जटिल है। कर और निवेश मानकों को सहज बनाने के अलावा जरूरत यह भी है कि ओएनजीसी, ओवीएल और ऑयल इंडिया लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों के प्रदर्शन पर नजर रखी जाए। संबंधित मंत्री ने यह धमकी दी है कि सरकारी कंपनियों के गैरइस्तेमालशुदा तेल क्षेत्र नीलाम किए जा सकते हैं। लेकिन इससे बहुत सुधार शायद ही हो। खनन और उत्पादन से जुड़ी सरकारी कंपनियों को अपना प्रदर्शन सुधारने का अवसर और संसाधन मुहैया कराने चाहिए।