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व्यावहारिक हो प्रतिक्रिया

Last Updated- December 11, 2022 | 5:18 PM IST

देश में मंकीपॉक्स वायरस का चौथा पुष्ट मामला बीते सप्ताहांत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सामने आया। ऐसे में यह सवाल पूछने का उचित समय है कि हमारा देश एक और संभावित घातक बीमारी से निपटने के लिए किस हद तक तैयार है। गत सप्ताह विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मंकीपॉक्स को एक ‘वैश्विक आपात स्थिति’ घोषित किया। यह समझने की आवश्यकता है कि मंकीपॉक्स वायरस कोविड वायरस तथा उसके विभिन्न स्वरूपों से किस प्रकार अलग है। अब तक यह उतना संक्रामक नहीं है और मानव से मानव में इसका प्रसार होने के लिए लंबे समय तक संपर्क में रहना आवश्यक है। ह्यूमन इम्युनोडिफिसिएंसी वायरस या एचआईवी के शुरुआती दौर की तरह यह फिलहाल पश्चिम में और प्रमुख तौर पर एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंड और क्वीयर) समुदाय में देखा जा रहा है। डब्ल्यूएचओ द्वारा मंकीपॉक्स को आपात परिस्थिति घोषित करने का निर्णय सर्वसम्मति से नहीं लिया गया। पश्चिम और मध्य अफ्रीका के कई देशों में सन 1970 के दशक से ही यह स्थानीय बीमारी रही है और 2003 में अमेरिका में भी इसका प्रसार हुआ था। यह वायरस प्रमुख रूप से जानवरों और मनुष्यों के बीच स्थानांतरित होता है और अतीत में जब भी यह बीमारी फैली तो यह पाया गया कि पालतू पशुओं खासकर चूहों और गिलहरी जैसे जानवरों की वजह से इसका प्रसार हुआ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोध के मुताबिक जिन लोगों को स्मालपॉक्स का टीका लग चुका है उन्हें मंकीपॉक्स वायरस से काफी हद तक बचाव हासिल है। आगे चलकर भारत में आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर निश्चित तौर पर यह बात काफी प्रभावी साबित होगी। यह जरूरी होगा कि देश में स्मालपॉक्स के टीकों की तादाद का आकलन किया जाए तो मंकीपॉक्स के पीड़ितों के आसपास के तमाम लोगों को यह टीका लगाया जाए। यदि वायरस आगे और अधिक फैलता है तो तीसरी पीढ़ी के स्मालपॉक्स टीकों के साथ एक आम टीकाकरण अभियान चलाना भी उपयोगी साबित हो सकता है। विश्व स्तर पर स्मालपॉक्स के 3.5 करोड़ टीकों की खुराक उपलब्ध हैं जिन्हें डब्ल्यूएचओ लगाता है। एजेंसी की सबसे बड़ी सफलता थी सन 1970 के दशक में स्मालपॉक्स का उन्मूलन। अमेरिका के पास 20 करोड़ खुराक का अतिरिक्त भंडार है और उसने स्वास्थ्यकर्मियों समेत आबादी के उस वर्ग को टीका लगाना शुरू कर दिया है जो जोखिम वाला माना जा सकता है। अमेरिका में इस समय स्मालपॉक्स का जो टीका लगता है उसे 2000 के दशक के मध्य में जैविक आतंकवाद की आशंकाओं के बीच विकसित किया गया था। इस टीके के साथ दिक्कत यह है कि आबादी का एक हिस्सा जो इम्युनोडिफिशिएंट (प्रतिरक्षा प्रणाली के तत्वों की कमी) है, उसे यह टीका नहीं लगाया जा सकता।
डेनमार्क की एक टीका निर्माता कंपनी बावेरियन नॉर्डिक ने एक नया टीका बनाया है जिसका नाम है इम्वानेक्स। पश्चिमी देशों के नियामकों ने इसे मंकीपॉक्स के मामलों में इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी है। कंपनी एक साल में तीन करोड़ खुराक तैयार कर सकती है लेकिन इसे बनाने का तरीका स्मालपॉक्स के टीके बनाने में इस्तेमाल होने वाले पुराने तरीके से अलग है। ऐसे में इसका उत्पादन बढ़ाना या दूसरों के माध्यम से इसे बनवाना मुश्किल हो सकता है। अमेरिका और यूरोपीय संघ इसकी मदद से स्मालपॉक्स टीकों की कमी पूरी कर सकते हैं। भारत एक बड़ा टीका निर्माता देश है और उसे भी यह देखना होगा कि क्या उसकी विनिर्माण क्षमता स्मालपॉक्स टीके का उत्पादन बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली अब इस हकीकत से अवगत हो चुकी है कि क्या कुछ किए जाने की आवश्यकता है। संपर्क में आने वालों का पता लगाना, संस्थागत रूप से क्वारंटीन किया जाना और वायरस में किसी भी खतरनाक बदलाव पर नजर रखना। यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था जरूरत के मुताबिक काम करती है तो डरने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। मंकीपॉक्स कोविड-19 नहीं है और खासतौर पर ओमीक्रोन तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि ओमीक्रोन, वायरस का अत्यधिक संक्रामक स्वरूप निकला। भारत को नापतौलकर और समुचित प्रतिक्रिया देनी चाहिए और इस दौरान उसे समय का ध्यान रखते हुए प्रतिबद्ध रहना होगा।

First Published - July 26, 2022 | 1:12 AM IST

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