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भारत के लिए पूर्व एशिया से निकला एक मौका

Last Updated- December 12, 2022 | 3:12 AM IST

महामारी से जुड़ी अनिश्चितताएं कायम रहने के बीच वैश्विक व्यापार में 2020 की आखिरी तिमाही से रिकवरी के स्वस्थ संकेत देखने को मिले हैं (अंकटाड की फरवरी 2021 में जारी वैश्विक व्यापार रिपोर्ट)। वर्ष 2021 की पहली तिमाही में सकारात्मक प्रतिक्रिया मजबूत हुई और सालाना 10 फीसदी एवं तिमाही आधार पर 4 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई और व्यापार मात्रा महामारी से पहले के स्तर को पार कर गई। वस्तु व्यापार दोनों तिमाहियों में अग्रणी स्थिति में रहा है जबकि सेवा व्यापार पीछे रह गया।
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का वस्तु व्यापार बैरोमीटर  मई 2021 में 109.6 के मूल्य पर रहा जबकि 2020 की चौथी तिमाही में सूचकांक मूल्य 103.9 रहा था। यह वैश्विक वाणिज्यिक व्यापार में आई उछाल से भी मेल खाता है। मई महीने में बैरोमीटर के सारे घटक सूचकांक रुझान स्तर से ऊपर थे एवं उनमें बढ़त देखी जा रही थी। बैरोमीटर यह स्पष्ट पूर्वानुमान देता है कि 2021 की पहली एवं दूसरी तिमाहियों में व्यापार मजबूत बना रहेगा। वैश्विक व्यापार में रिकवरी का सिलसिला जारी रहने से वैश्विक एवं व्यक्तिगत अर्थव्यवस्थाओं पर महामारी के प्रतिकूल असर को नरम करने में काफी मदद मिल सकती है। भारत को इस सकारात्मक रुझान का फायदा उठाने की जरूरत है।
वैश्विक व्यापार रिकवरी में कुछ स्पष्ट क्षेत्रीय एवं क्षेत्रवार पैटर्न देखने को मिले हैं। विकासशील देशों का व्यापार बढ़त की स्थिति में है और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में व्यापार वृद्धि को पीछे छोड़ दिया है। पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में व्यापार का प्रदर्शन सबसे मजबूत रहा है। महामारी पर नियंत्रण के शुरुआती एवं असरदार तरीके अपनाने के बाद ये अर्थव्यवस्थाएं बीते साल में वैश्विक व्यापार पुनरुत्थान के केंद्र में रही हैं। दूसरे देशों से व्यापार के सापेक्ष इन देशों में व्यापार वृद्धि मजबूत बने रहने की उम्मीद है। जहां चीन निर्यात वृद्धि प्रदर्शन में आगे है, वहीं पूर्व-एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की भी महामारी के समय बाजार हिस्सेदारी बढ़ गई है। बाजार हिस्सेदारी में प्रभावी बढ़त के साथ वियतनाम सबसे आगे रहा है। महामारी से संबंधित क्षेत्र जैसे संचार एवं ऑफिस उपकरण, फार्मा और कृषि-खाद्य उत्पाद क्षेत्रों में मजबूत प्रसार हुआ है, वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स, मोटर वाहन, कपड़ा एवं परिधान जैसे अन्य क्षेत्रों ने भी तिमाही आधार पर सकारात्मक वृद्धि दिखाई है। पूर्व-एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ मजबूत एवं बढ़ते व्यापार संपर्क रखने वाले इन देशों का वैश्विक व्यापार विकास के छिटके हुए लाभ मिलना तय है।
भारत के लिए बढ़े हुए वैश्विक संपर्क के साथ आत्म-निर्भरता के अपने मकसद को हासिल करने के लिए पूर्व एशिया के साथ व्यापारिक समेकन सुदृढ़ करने पर नजदीकी निगाह रखना एक वांछनीय रणनीति होगी। भारत सरकार की तरफ से 13 वरीय क्षेत्रों में विनिर्माण एवं निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए घोषित ‘उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन’ योजना (पीएलआई) इसे और भी प्रासंगिक बना देती है। वरीयता वाले इन क्षेत्रों में से इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार एवं ऑफिस उपकरण, मोटर वाहन, फार्मा, कपड़ा एवं परिधान क्षेत्र अग्रणी वैश्विक व्यापार वृद्धि वाले क्षेत्रों से अतिव्याप्त हैं और पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाएं महामारी के दौरान इन क्षेत्रों में निर्यात प्रदर्शन के मामले में अगली कतार में रही हैं। ऑफिस उपकरण, संचार उपकरण और कपड़ा जैसे कुछ क्षेत्रों में वियतनाम, थाईलैंड, कोरिया एवं ताइवान ने वृद्धि दर्ज की है जबकि चीन को महामारी के दौरान बाजार हिस्सेदारी एवं प्रतिस्पद्र्धा क्षमता में नुकसान उठाना पड़ा है।
बड़े आकार वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां महामारी पर काबू हो जाने के बाद अपना वैल्यू चेन चीन से बाहर ले जाने की कोशिशें तेज कर सकती हैं, जिससे भारत को फायदा होगा अगर वह पूर्व-एशियाई देशों के साथ व्यापार समेकन बढ़ा सके। कपड़ा एवं परिधान और मोटर वाहन जैसे क्षेत्रों में श्रम-बाहुल्य बैकवर्ड संपर्कों की जबरदस्त क्षमता होती है और वहां पर वैल्यू चेन समेकन होना भारत के लिए लाभ की स्थिति होगी। खासतौर पर उस समय जब महामारी ने रोजगार परिदृश्य को तगड़ी चोट पहुंचाई है। भारत को यह मौका भुनाने के लिए पुरजोर मेहनत करनी होगी। अच्छी तरह तैयार पीएलआई योजनाओं के साथ मोटर वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कपड़ा जैसे क्षेत्रों के लिए आयात शुल्क ढांचे को तर्कसंगत बनाने के नीतिगत कदम और मशीनरी एवं तकनीकी उन्नयन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों से एख वैकल्पिक निवेश स्थल के तौर पर भारत की स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी। क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसेप) समझौते का हिस्सा न होते हुए भी भारत को फायदा हो सकता है।
एशियाई समग्र रिकवरी मसौदे (एसीआरएफ) और उसकी क्रियान्वयन योजना से यह साफ दिखता है कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाएं आरसेप को महामारी की पीड़ा से रिकवरी के एक सहारे के तौर पर देख रही हैं। आरसेप को लेकर बातचीत का दौर महामारी के बीच में ही पूरा हुआ और सभी 15 सदस्य देशों ने इसी दौरान समझौते पर दस्तखत भी किए। यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी की अपनी अहमियत का एक और सबूत है। लेकिन एसीआरएफ और इसके घटक यह भी दिखाते हैं कि क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में महामारी की वजह से आई कमजोरी और अमेरिका-चीन के व्यापारिक एवं द्विपक्षीय रिश्तों में अनिश्चितता बने रहने से आसियान विविधीकरण एवं विस्तारित क्षेत्रीय समेकन को आपूर्ति शृंखला की लचक बढ़ाने के एक साधन के तौर पर देखता है। लिहाजा भारत की व्यापार नीति, जो अब रणनीतिक तौर पर अपने आयात पर एकल-स्रोत निर्भरता को कम करने पर केंद्रित हो चुकी है, आसियान की महामारी-पश्चात विविधीकरण एवं विस्तृत क्षेत्रीय समेकन की रिकवरी योजना के अनुरूप है। वैश्विक व्यापार एवं आर्थिक रिकवरी की लहर पर सवार होने के लिए भारतीय व्यापार नीति को इस तालमेल का पूरा फायदा उठाना चाहिए।
इसके अलावा, आसियान के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की समीक्षा प्रक्रिया का इस्तेमाल इसे मदद देने में किया जा सकता है क्योंकि आसियान का व्यापक क्षेत्रीय एकीकरण का नजरिया क्षेत्रीय व्यापार साझेदारों के साथ अपने मुक्त व्यापार समझौतों को मजबूत एवं उन्नत बनाने पर आधारित है। निस्संदेह विनिर्माण में सर्वाधिक वरीय देश (एमएफएन) के लिए लागू शुल्क पर गहराई से गौर करने और वैश्विक एवं तुलनात्मक विकासशील देशों के साथ बेहतर तालमेल बिठाने की जरूरत है। वहीं एफटीए समीक्षा प्रक्रिया के तहत दिलचस्पी वाले क्षेत्रों में शुल्क ढांचे को तर्कसंगत बनाने के तात्कालिक कदम उठाना फायदेमंद हो सकता है। बातचीत में सहयोग के लिए इन क्षेत्रों में व्यापार-निवेश संपर्कों का पूर्व-विश्लेषण विचारणीय है। आयात एवं बाजारों तक वरीय पहुंच मुहैया कराने से इन क्षेत्रों में विदेशी निवेश को आकर्षित करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा भारत के कारोबारी जगत में भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते के बारे में हमेशा एक हिचक रही है जो आसियान द्वारा संरक्षणात्मक कदम के तौर पर लगाए गए विविध गैर-शुल्क अवरोधों से संबंधित है। निरपवाद रूप से आसियान को भारत के सीमित निर्यात एवं क्षेत्र के साथ बढ़ते द्विपक्षीय घाटे के लिए अक्सर इसे कारण बताया जाता रहा है। यह दिलचस्पी वाले क्षेत्रों में विशिष्ट गैर-शुल्क अवरोधों का डेटाबेस बनाने के लिए काफी लाभदायक होगा। इससे गैर-शुल्क उपायों और गैर-शुल्क अवरोधों के बीच फर्क भी साफ हो सकेगा। इस मोर्चे पर वाजिब उम्मीद करने के पहले हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस बारे में पारस्परिकता की उम्मीद बातचीत के स्वाभाविक प्रवाह के तौर पर की जाएगी और भारत को उस हिसाब से तैयार रहना चाहिए।
व्यापारिक रिकवरी के अग्रणी क्षेत्रों में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन की योजनाएं लाकर और आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौते को उन्नत कर पूर्व एशिया के साथ समेकन किया जाता है तो वह महामारी के दौर में भारत की आर्थिक रिकवरी के लिहाज से खासा अहम है।
(लेखिका जेएनयू स्थित अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

First Published - June 29, 2021 | 8:41 PM IST

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