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भारत में वीडियो स्ट्रीमिंग कारोबार की वास्तविकता पर एक नजर

Last Updated- December 14, 2022 | 11:06 PM IST

एमेजॉन प्राइम वीडियो वर्ष 2016 में भारत में दस्तक देने के बाद से अब तक नौ भाषाओं में 22 मौलिक कार्यक्रम पेश कर चुका है। इसने इस साल गुलाबो सिताबो और शकुंतला देवी जैसी सात फिल्में सीधे अपने प्लेटफॉर्म पर ही रिलीज की हैं। यह दूसरे स्टूडियो की सैकड़ों फिल्में और टेलीविजन शो भी स्ट्रीम करता है। इसके अलावा वह दुनिया भर के अपने मौलिक कार्यक्रम भी भारतीय दर्शकों के लिए परोसता है। एमेजॉन प्राइम गीत-संगीत की भी स्ट्रीमिंग करता है। वहीं दिग्गज ऑनलाइन विक्रेता के तौर पर एमेजॉन लहसुन से लेकर वॉशिंग मशीन तक हरेक चीज बेचती है और आज यह 280 अरब डॉलर की कंपनी बन चुकी है। इसके पीछे सोच यह है कि एक उपभोक्ता के तौर पर आप एमेजॉन की तमाम सेवाओं के बंद बगीचे में ही कैद रहें जिससे कंपनी को मोटा राजस्व एवं विज्ञापन मिलता रहे।
केवल एमेजॉन ही नहीं, ‘बंद बगीचे का सिद्धांत’ बड़ी मीडिया एवं तकनीकी कंपनियों की भी कारोबारी रणनीति को प्रभावित कर रहा है। इन कंपनियों में ऐपल (1.5 अरब उपभोक्ता एवं 260 अरब डॉलर राजस्व), गूगल (1.7 अरब उपभोक्ता एवं 161 अरब डॉलर राजस्व), फेसबुक (2.6 अरब उपभोक्ता एवं 71 अरब डॉलर राजस्व) और डिज्नी (69.5 अरब डॉलर राजस्व) शामिल हैं। लेकिन ऐसे बंद बगीचे कितने हो सकते हैं? और क्या इसके नाम पर उड़ाई जा रही पूंजी प्रतिफल के लायक भी है? ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग कारोबार पर एक महीने तक रखी गई गहरी नजर से हासिल यह पहली टिप्पणी है। इस समाचारपत्र में सितंबर में दो लेख भी इस मुद्दे पर प्रकाशित हुए हैं।
पीटर चर्निन कई वर्षों तक रूपर्ट मर्डोक के दाहिने हाथ रहे। वर्ष 2010 में उन्होंने ‘द चर्निन ग्रुप’ का गठन किया जो मीडिया एवं प्रौद्योगिकी कंपनियों में निजी इक्विटी निवेश करता है। चर्निन ने एक संगोष्ठी में कहा, ‘हर तरह का प्रभावी कंटेंट अपने दम पर बनाने की सोच खराब है। पिछले तीन वर्षों में इन बंद बगीचों ने कंटेंट बनाने वालों के साथ करार करने में अरबों डॉलर खर्च किए हैं। वे गारंटी के तौर पर अरबों डॉलर का भुगतान कर रहे हैं और उन्हें अनर्जित गारंटी के मद में करोड़ों डॉलर बट्टे खाते में डालने पड़ेंगे।’ वह कहते हैं कि ऐसा होने से अंत में रचनात्मक पारिस्थितिकी की लाभपरकता में ह्रास आएगा।
भारत में इस समय करीब 60 स्ट्रीमिंग ब्रांड ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सेवाएं दे रहे हैं। कॉमस्कोर के हिसाब से सबसे बड़ा ओटीटी प्लेटफॉर्म गूगल का यूट्यूब है जिसके 38.8 करोड़ विजिटर हैं। यह आंकड़ा वीडियो स्ट्रीमिंग देखने वाले कुल दर्शकों के 98 फीसदी से भी अधिक है। फिर टाइम्स ग्रुप के एमएक्स प्लेयर (14.8 करोड़) और डिज्नी प्लस हॉटस्टार (8.34 करोड़) का स्थान आता है। कई प्लेटफॉर्म कंटेंट परोसने के लिए पैसे बहा रहे हैं। मीडिया पार्टनर्स एशिया की मानें तो ओटीटी प्लेटफॉर्म कंटेंट के लिए वर्ष 2017 में जहां 1,690 करोड़ रुपये खर्च कर रहे थे, वहीं 2019 में यह आंकड़ा 4,320 करोड़ रुपये हो गया। इसके वर्ष 2020 के अंत तक करीब 5,250 करोड़ रुपये हो जाने के आसार हैं। लेकिन वर्ष 2019 में 8,000 करोड़ रुपये राजस्व वाले ओटीटी उद्योग के लिए इतना बड़ा खर्च उसके टिकाऊपन पर सवाल उठाता है।
आप यह कह सकते हैं कि वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाओं ने 2016 के बाद डेटा कीमतें गिरने एवं डेटा खपत में आई उछाल के बाद ही तेजी पकड़ी थी। दरअसल यह जमीन कब्जाने का दौर है और कंपनियों के लिए अधिक खर्च करना सामान्य बात है। हो सकता है कि यह दावा सही हो। लेकिन 83.6 करोड़ टीवी दर्शकों एवं 66.2 करोड़ ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं वाले भारत में मनोरंजन उद्योग का बाजार काफी बड़ा होते हुए भी चलताऊ ही है। टीवी शो से लेकर फिल्मों तक किसी भी कंटेंट का प्रति इकाई मुद्रीकरण एवं मार्जिन दुनिया में बहुत कम होने से यह महज 24 अरब डॉलर वाला छोटा मीडिया एवं मनोरंजन बाजार ही है। टीवी में सख्त नियमन होने के साथ ही फिल्मों की बेतरह नजरअंदाजी ने इन रोजगार-बहुल एवं उच्च करदाता उद्योगों के दायरे को काफी सीमित कर दिया है।
मेरी अगली टिप्पणी इसी पर आधारित है। प्रसारण एवं फिल्म उद्योग ही स्ट्रीमिंग के सभी कार्यक्रमों का स्रोत है लेकिन रचनात्मक पहलू एवं कीमत तय करने की उन्हें आजादी नहीं है। इस तरह कई मायनों में स्ट्रीमिंग ने मनोरंजन उद्योग के दूसरे हिस्सों को इसकी बेडिय़ों से आजाद किया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर मिलने वाली आजादी एवं दुनिया भर में फैला बाजार भारतीय कहानियों को दुनिया के सामने परोसने में मदद कर रहा है।
वर्ष 2019 में चार और इस साल तीन भारतीय मौलिक कार्यक्रमों को अंतरराष्ट्रीय एमी अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। यह भारत के रचनात्मक उद्योगों की क्षमता एवं सॉफ्ट पावर के बारे में बताता है जिसे समाचार चैनल ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। इन चैनलों की चीख-पुकार एवं दोषारोपण की शैली खराब गुणवत्ता वाले नियमन को न्योता दे सकती है। ऐसा तब होगा जब भारत इस क्षेत्र में अपने पांव जमा ही रहा है। अगर पहली दो राय निराशावादी लगती हैं तो अगली टिप्पणी तो तीखी है। जहां महामारी के दौरान कुल दर्शक संख्या स्थिर रही एवं विज्ञापन में गिरावट आई, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म के ग्राहकों की संख्या 1 करोड़ से बढ़कर जून 2020 तक 3.1 करोड़ से अधिक हो गई। केवल ग्राहकी पर आधारित स्ट्रीमिंग ब्रांड नेटफ्लिक्स एवं प्राइम वीडियो की ग्राहक संख्या में पिछले छह महीनों में सबसे ज्यादा वृद्धि देखी गई। वहीं ज़ी5 एवं होइचोइ जैसे ब्रांड ने भी मुनाफा बढऩे की बात कही है। यह बड़ी खबर है। बहुत भीड़भाड़ वाले या मनमाने नियमन वाले बाजार में विज्ञापन-समर्थित प्रोग्रामिंग बहुत जल्द खराब गुणवत्ता, ध्रुवीकरण या पूरी तरह फर्जी कार्यक्रमों में तब्दील हो सकती है। इसका कारण यह है कि मुफ्त होने से प्लेटफॉर्म दर्शक जुटाने के लिए कुछ भी करेंगे। लेकिन ग्राहकी-समर्थित मनोरंजन या समाचार कार्यक्रम अमूमन काफी शोध के बाद अच्छी तरह लिखे एवं निर्मित होते हैं।
अगर विज्ञापन एवं ग्राहकी के बीच शक्ति संतुलन भुगतान के पक्ष में थोड़ा भी झुका हो तो यह दर्शाता है कि विज्ञापन से ज्यादा जोर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए बढिय़ा कहानियों पर ही रहेगा।

First Published - October 4, 2020 | 11:07 PM IST

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