केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी), चार्टर्ड अकाउंटेंट और बिचौलियों का बड़ा नेटवर्क तलाशा है, जिस पर राजनीतिक चंदे के नाम पर करीब 9,169 करोड़ रुपये का काला धन सफेद करने का आरोप है। ऐसे में राजनीतिक चंदा देने वालों को सही तरीका जरूर जान लेना चाहिए और उन बिचौलियों से बचना चाहिए, जो फर्जी चंदे से कर छूट दिलाने का वादा करते हैं।
चंते से जुड़ी छूट लेने के लिए पहले फर्जी राजनीतिक पार्टियां बनाई जाती हैं। उसके बाद बिचौलिये उन पार्टियों को चंदा भेज देते हैं ताकि दानकर्ता आयकर अधिनियम की धारा 80जीजीसी, 80जीजीबी और धारा 13ए के तहत कर योग्य आय में कटौती का दावा कर सकें।
सिंघानिया ऐंड कंपनी की पार्टनर ऋतिका नायर ने कहा, ‘दानकर्ता ऐसी पार्टियों को रकम भेज देते हैं। उन्हें चंदे की रसीद मिल जाती है, जिसे दिखाकर वे 100 फीसदी कटौती का दावा करते हैं और आयकर बचा लेते हैं। पार्टी बाद में कमीशन काटकर ज्यादातर रकम नकद में लौटा देती है।’
आयकर विभाग डेटा एनालिटिक्स और कानूनी सत्यापन से फर्जी दावों का पता लगाता है। धारा 80जीसीसी के तहत हरेक दावे में पार्टी का पंजीकरण, गैर नकद भुगतान का तरीका और रसीदों की प्रामाणिकता जांची जाती है।
मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश सुराणा ने कहा, ‘आय के हिसाब से बहुत बड़े दान, धन की राउंड ट्रिपिंग या एक ही गैर मान्य संस्था को कई दानकर्ताओं से दान जैसे संदिग्ध पैटर्न जांचे जाते हैं।’ डेटा मिलाने वाली बड़ी प्रणाली चंदे के दावे का सत्यापन बैंक रिकॉर्ड से, चुनाव आयोग में भेजी गई जानकारी और कंपनियों द्वारा कंपनी मामलों के मंत्रालय के पास भेजी गई जानकारी से करती है। गड़बड़ी मिलने पर जांच और तलाशी की जाती है।
डीएमडी एडवोकेट्स के पार्टनर राहुल सतीजा ने कहा, ‘धोखाधड़ी का पता खुफिया जानकारी पर तलाशी के जरिये या गैर मान्यता प्राप्त या अनुपालन नहीं करने वाली सियासी पार्टियों की जांच और अनजान सी पार्टी को भारी चंदा देकर छूट मांगे जाने पर भी लगाया जा सकता है।’ पता लगने पर करदाता के पास रसीद और यूनीक ट्रांजैक्शन रेफरेंस कोड की ऑनलाइन मांग आने लगती है। आनाकानी होने पर समन या तलाशी शुरू हो सकती है।
धारा 80जीजीसी में व्यक्ति (सरकारी सहायता वाली संस्थाओं को छोड़कर) पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों या चुनावी ट्रस्टों को चंदे पर पूरी छूट मांग सकता है। चुनावी ट्रस्ट पंजीकृत पार्टियों को चंदा बांटते हैं। चंदा पाने वाली पार्टी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29ए के तहत पंजीकृत होनी चाहिए।
सतीजा के मुताबिक कितनी भी बड़ी रकम की कटौती का दावा किया जा सकता है। सुराणा के अनुसार भुगतान नकद के बजाय चेक, डिमांड ड्राफ्ट या इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर के जरिये ही होना चाहिए।
चेक, ड्राफ्ट या ऑनलाइन ट्रांसफर के जरिये राजनीतिक पार्टी की वेबसाइट या क्षेत्रीय कार्यालयों को चंदा दिया जा सकता है। चुनावी ट्रस्टों को दान भी कटौती के दायरे में है। दानकर्ता को नाम, रकम, तारीख, भुगतान के तरीका और पार्टी के पैन/टैन और पंजीयन क्रमांक वाली आधिकारिक रसीद या सर्टिफिकेट संभालकर रखना चिहए। चेक की पर्ची, उसकी तस्वीर, यूटीआर, ऑनलाइन ट्रांसफर का ब्योरा भी रखना चाहिए। सुराणा का कहना है कि पार्टी चुनाव आयोग के पास जो ब्योरा भेजती है, चंदो को उससे मेल खाना चाहिए।
चुनावी ट्रस्टों के जरिये दान करने पर ट्रस्ट से मिली रसीद या सर्टिफिकेट रकें। वॉलंटियर के जरिये चंदा देने पर पार्टी का पंजीयन क्रमांक चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जांच लें। पार्टी से आए ईमेल या एक्नॉलिजमेंट भी संभालकर रखे जाएं। सीएनके के पार्टनर पल्लव प्रद्युम्न नारंग सभी दस्तावेजों की कागजी प्रति और ऑनलाइन प्रति दोनों रखने की सलाह देते हैं।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29सी(3) के तहत 20,000 रुपये से अधिक दान करने पर दानकर्ता फॉर्म 24ए के जरिये अनुपालन की जांच कर सकता है। सतीजा ने कहा, ‘फॉर्म 24ए चुनाव आयोग की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है और वह पार्टी के कोषाध्यक्ष द्वारा जमा कराया जाता है।’
चंदा मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को ही दें। नारंग ने कहा, ‘पार्टी कैसी है और चंदे का क्या इस्तेमाल होगा यह जरूर समझ लें।’ उन्होंने फर्जी वित्तीय लेनदेन से बचने और काले धन को सफेद बनाने वाली संस्थाओं से दूर रहने की भी सलाह दी।
याद रखें कि आयकर विभाग को शक हुआ तो वह पुनर्निर्धारण से पहले करदाता को खुद ही रिटर्न संशोधन का मौका देता है। सुराणा ने कहा, ‘हेराफेरी साबित हो गई तो विभाग कटौती खारिज कर देगा, जुर्माना लगाएगा, फिर से कर आकलन करेगा और गंभीर मामलों में मुकदमा भी करेगा।’
(लेखक स्वतंत्र वित्तीय लेखक हैं)