प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले साल में उथल-पुथल के बावजूद, भारतीय बाजार में कुल विदेशी शेयरधारिता में अमेरिकी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की हिस्सेदारी बढ़ी है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड ने डिपॉजिटरी के आंकड़ों का विश्लेषण किया है जिसके अनुसार डेट और इक्विटी दोनों में अमेरिकी एफपीआई की हिस्सेदारी जनवरी 2025 में 39.7 फीसदी थी जो जनवरी 2026 में बढ़कर 41 फीसदी हो गई। हालांकि इस दौरान एफपीआई ने डेट और इक्विटी में कुल मिलाकर 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की शुद्ध बिकवाली की।
इस दौरान अमेरिकी एफपीआई का निवेश 29.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 32.1 लाख करोड़ रुपये हो गया है। अमेरिका के एफपीआई की डेट ऐसेट में लगभग 15,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है जबकि इक्विटी परिसंपत्तियां 2.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ी हैं।
जियोजित फाइनैंशियल सर्विसेज के कार्यकारी निदेशक सतीश मेनन ने बताया कि कई एफपीआई का ज्यादा निवेश लार्ज-कैप शेयरों में है जिनमें बीते एक साल में कुछ बढ़ोतरी देखी गई है। जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के दौरान बीएसई सेंसेक्स में 6.1 फीसदी का इजाफा हुआ।
मेनन ने कहा कि संभव है कि इससे निकासी के कारण कस्टडी में रखी परिसंपत्तियों में आई गिरावट की भरपाई हुई हो। मेनन ने कहा कि अमेरिका और भारत के बीच व्यापार करार पर अब असमंजस दूर हो चुका है। इससे निवेश में तेजी आ सकती है। हाल के दिनों में अमेरिकी शेयर बाजार के कमजोर प्रदर्शन को देखते हुए अमेरिका के एफपीआई दूसरे बाजार का रुख कर सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक खरीदारी शुरू करेंगे।’
मिरे ऐसेट इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स (इंडिया) के मुख्य निवेश अधिकारी नीलेश सुराणा ने बताया कि पिछले 18 महीनों में कई कारणों से विदेशी निवेशकों के बीच भारत का आकर्षण कम हुआ है। 2024 में वैश्विक मानकों की तुलना में भारतीय बाजार अपेक्षाकृत महंगे हो गए। साथ ही वृद्धि दर और कमाई में भी नरमी देखी गई। इसके अलावा वैश्विक निवेशक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के अवसरों पर ध्यान दे रहे हैं जो भारत में काफी हद तक मौजूद नहीं हैं।
हालांकि सुराणा का मानना है कि ये तीनों कारण अब विपरीत होने लगे हैं, जिससे एफपीआई की निकासी थम सकती है। उन्होंने बताया कि एआई का जोश अब शीर्ष पर पहुंच चुका है और कई मौद्रिक तथा राजकोषीय उपायों की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था अब ज्यादा कमाई वाली वृद्धि के लिए बेहतर स्थिति में है।
सुराना के अनुसार भारतीय बाजारों में गिरावट ने इसे ज्यादा आकर्षक बना दिया है।
बाजार के एक विशेषज्ञ ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि बिकवाली के बावजूद, एफपीआई की परिसंपत्तियां बढ़ी हैं। मॉरीशस जैसे देशों से विभिन्न एफपीआई के मूल देशों, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, में भी लगातार बदलाव हो रहा है क्योंकि अधिकारियों ने कर कम करने की व्यवस्था पर नाराजगी जताई है। हाल के वर्षों में कुल एफपीआई में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़ने में इसका भी योगदान हो सकता है।
यह फायदा ऐसे साल में हुआ है जब ट्रंप ने पहली बार भारत पर कई पड़ोसी देशों के मुकाबले ज्यादा शुल्क लगाए थे।