भारत बायोटेक के कोवैक्सीन परीक्षण को लेकर ताजा विवाद फिर से बढ़ गया है और सक्रिय कार्यकर्ताओं के एक समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को एक पत्र लिख कर भोपाल की साइट पर तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण में कथित उल्लंघन की ओर ध्यान आकृष्ट कराने की कोशिश की जहां भर्ती वॉलंटियर में से अधिकांश यूनियन कार्बाइड गैस रिसाव त्रासदी से प्रभावित रहे हैं। कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि घटना स्थल पर परीक्षण प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए और एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र जांच कराई जाए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि भोपाल में परीक्षण में शामिल 42 साल के व्यक्ति की मौत पर विषय विशेषज्ञ समिति (एसईसी) की बैठक में कोई चर्चा नहीं हुई जिसने कोवैक्सीन को मंजूरी देने की सिफारिश की थी। उस व्यक्ति की मौत परीक्षण में खुराक दिए जाने के 9 दिन बाद 21 दिसंबर को हुई।
देश के शीर्ष स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महामारी विज्ञान और संचारी रोग विभाग के प्रमुख समीरन पांडा ने कहा, ‘परीक्षण के दौरान होने वाली किसी भी जटिलता के लिए उचित समितियों और एजेंसियों को समय पर रिपोर्ट करने जैसे निर्धारित कदमों का पालन किया जा रहा है। कोई भी घटना जिसका जांच उत्पाद (टीका)से कोई सूत्र जुड़ा हो उसकी जांच करने के लिए भी जांच की जा रही है।’
पत्र में कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि प्रायोगिक दवा की खुराक दिए जाने के बाद नौ दिन के दौरान परीक्षण स्थल पर प्रतिभागियों का कोई फॉलोअप नहीं किया गया। उन्होंने कहा, ‘मौत या उसकी मौजूदा स्थिति की जांच में विभिन्न पक्षों, पीआईए इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी, डेटा सेफ्टी मॉनिटरिंग बोर्ड और डीसीजीआई द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मृतक के परिवार को घटना के हफ्तों बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रति मिली और वह भी पीपुल्स हॉस्पिटल्स को रिपोर्ट मिलने के कई दिनों के बाद उन तक यह रिपोर्ट पहुंची। परिवार को अभी भी मृतक की सहमति फॉर्म या कोवैक्सीन परीक्षण में उनकी भागीदारी से संबंधित किसी भी दस्तावेज की प्रति नहीं दी गई है।’
जब उनसे पूछा गया कि क्या टीकाकरण जहर फैलाने का कारण बन सकता है (जो प्रथम दृष्टया में व्यक्ति की मौत का कारण हो सकता है), उस पर पांडा ने कहा, ‘सावधानी से किए गए विषाक्तता अध्ययन, उत्पादन, आपूर्ति और टीका लगाए जाने के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण के उपायों और क्लीनिकल परीक्षण के शुरुआती चरणों में आए सुरक्षा डेटा को देखते हुए टीकाकरण के कारण विषाक्तता जैसी संभावना नहीं लगती है।’
भोपाल ग्रुप फॉर इन्फ ॉर्मेशन ऐंड एक्शन की रचना ढींगरा के साथ-साथ अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री कार्यालय से कहा है कि वह पीपुल्स कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज ऐंड रिसर्च, भोपाल में कोवैक्सीन के क्लीनिकल परीक्षण को तुरंत रोकने के लिए हस्तक्षेप करें और क्लीनिकल परीक्षण के संचालन से संबंधित प्रोटोकॉल और कानूनी नियमों के उल्लंघन का पता लगाने के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी, समग्र और समयबद्ध जांच कराने के लिए एक स्वतंत्र निकाय भी बनाए।
रविवार दोपहर भोपाल में इन परीक्षणों में शामिल लोगों ने संवाददाता सम्मेलन के जरिये मीडिया से अपनी आपबीती साझा की। परीक्षण में शामिल लोगों ने दावा किया कि वे पढ़-लिख नहीं सकते और उन सभी ने आरोप लगाया कि उनकी सहमति की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई। उनमें से ज्यादातर लोगों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनका परीक्षण किसके लिए किया गया था, उन्हें टीका दिया जाएगा या कोई प्रायोगिक दवा दी जाएगी और अगर वे बीमार पड़ते हैं तो वे साइट हॉस्पिटल से संपर्क कर सकते हैं। खुद को जीतेंद्र नावरिया की मां कहने वाली एक महिला ने अपने बेटे के अनुभव को साझा किया।
वह महिला अपने बेटे को लेकर चिंतित है और उनका कहना है कि उनका बेटा ही एकमात्र कमाऊ सदस्य है। उन्होंने कहा, ‘मेरा बेटा टीके की खुराक दिए जाने के तुरंत बाद बीमार पड़ गया और जब हम एक अस्पताल गए तो हमें 450 रुपये देने के लिए कहा गया। हम पैसा देने में सक्षम नहीं थे। आखिरकार कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उसका लीवर की बीमारी के लिए इलाज चल रहा है।’
परीक्षण में शामिल लोगों ने दावा किया कि उनके इलाके में गाडिय़ां आईं और यह घोषणा की गई कि सभी को ‘कोविड-19 टीका’ के लिए 750 रुपये का भुगतान किया जाएगा। पत्र में कहा गया है, ‘750 रुपये की राशि यात्रा खर्चों और परीक्षण में शामिल प्रतिभागियों की दैनिक मजदूरी की हानि की भरपाई के नाम पर देने की बात है। इस राशि का इस्तेमाल लोगों को प्रलोभन देने के लिए किया गया ताकि वे टीका लगाने के लिए आगे आएं क्योंकि गरीब तबके के लोगों के लिए यह पर्याप्त राशि है।’
इसमें यह भी कहा गया है कि नैशनल एथिकल गाइडलाइंस फॉर बायोमेडिकल ऐंड हेल्थ रिसर्च में 20171 मानव प्रतिभागी शामिल हैं और आईसीएमआर द्वारा कोविड-19 महामारी के दौरान 2 अप्रैल, 2020 को प्रकाशित एथिक्स कमिटी रिव्यूइंग बायोमेडिकल ऐंड हेल्थ रिसर्च के दिशानिर्देश के मुताबिक सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक रूप से वंचित समुदायों और जो लोग सहमति देने में सक्षम हैं लेकिन जिनकी स्वेच्छा या सहमति को उनकी परिस्थितियों के कारण समझौता करा लिया जाता है वैसे कमजोर समूहों के लिए अनुसंधान के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा उपाय दिए जाने चाहिए।
कार्यकर्ताओं ने कहा, ‘प्रतिभागियों की आर्थिक, शैक्षणिक और सेहत की स्थिति पहले से ही गैस आपदा के साथ-साथ दूषित पानी की कवजह से खराब है ऐसे में स्पष्ट रूप से कमजोर समूहों के भीतर आते हैं।’ हालांकि, टीका निर्माता ने बताया कि क्लीनिकल परीक्षण में भागीदारी पूरी तरह से स्वैच्छिक है। कंपनी ने कहा, ‘हर क्लीनिकल परीक्षण में लोगों को शामिल करने, उन्हें शामिल न किए जाने की श्रेणी से जुड़े मापदंड अच्छी तरह परिभाषित हैं ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कौन से लोग क्लीनिकल परीक्षण में हिस्सा लेने के लिए पात्र हैं। केवल योग्य प्रतिभागियों को उनके विभिन्न स्वास्थ्य मापदंडों के सावधानीपूर्वक मूल्यांकन के बाद परीक्षण में शामिल किया जाता है। ये प्रतिभागी समाज के विभिन्न तबके से आ सकते हैं क्योंकि इसमें विविध प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न सामाजिक-आर्थिक जनसांख्यिकी का आवश्यकतानुसार प्रतिनिधित्व का मौका दिया जाता है।’
भारत बायोटेक की प्रतिक्रिया
हैदराबाद स्थित कंपनी ने कहा, ‘भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज द्वारा जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मौत की वजह संदिग्ध विषाक्तता की वजह से हृदय गति रुकने के कारण हुई है और इस मामले की पुलिस जांच भी की जा रही है। वॉलंटियर की परीक्षण साइट द्वारा दी गई खुराक और प्रारंभिक जांच के नौ दिन बाद मौत हो गई जिससे संकेत मिलता है कि मौत का प्रायोगिक दवाओं से कोई संबंध नहीं है। हम इस बात की पुष्टि नहीं कर सकते कि वॉलंटियर को प्रायोगिक टीका या दवाइयां दी गईं क्योंकि अध्ययन में यह पता नहीं चलता।’ कंपनी ने दावा किया गया किइस गंभीर प्रतिकूल घटना की पूरी जांच की गई है और इसमें टीका या प्रायोगिक दवा की वजह से मौत होने का कोई संबंध नहीं दिख रहा है।
इसमें कहा गया है कि वॉलंटियर ने नामांकन के समय तीसरे चरण के परीक्षण में भागीदार के रूप में सभी मानदंडों को पूरा किया था और साइट द्वारा भी उनके स्वस्थ होने की सूचना दी गई थी। इसके अलावा खुराक दिए जाने के सात दिन बाद तक किसी भी प्रतिकूल घटनाओं की कोई सूचना नहीं मिली थी।
टीका निर्माता ने कहा कि स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं की जानकारी साइट टीम ने इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमिटी, केंद्रीय औषधि नियंत्रण मानक संगठन (सीडीएससीओ) और डेटा सुरक्षा निगरानी बोर्ड (डीएसएमबी) को सभी आवश्यक दिशानिर्देशों के अनुसार दी थी। कंपनी ने कहा, ‘ऐसे कई कारक हैं जो क्लीनिकल परीक्षण के दौरान प्रतिकूल घटना का कारण बन सकते हैं जिसमें रोगी की अंदरूनी बीमारी, पहले से मौजूद स्थितियां या दुर्घटना जैसी कोई घटना भी हो सकती है।’