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कोरोना इलाज में प्लाज्मा थेरेपी से मिल रहे सकारात्मक नतीजे

Last Updated- December 15, 2022 | 4:26 AM IST

दिल्ली के द्वारका में आकाश हेल्थकेयर के एक युवा कर्मचारी को कोरोनावायरस संक्रमण था और अचानक उनकी तबीयत ज्यादा बिगडऩे लगी। उन्हें ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी और वह हांफ ने भी लगे। हाल ही में संक्रमण से ठीक हुए अस्पताल के एक अन्य स्टाफ  ने उन्हें अपना रक्त प्लाज्मा दिया। महज एक ही दिन के भीतर मरीज की हालत में सुधार हुआ। आकाश हेल्थकेयर के प्रबंध निदेशक डॉ आशीष चौधरी ने कहा ‘सुबह वह सांस नहीं ले पा रहे थे और हांफ रहे थे लेकिन शाम में वह आराम से बैठकर बिस्कुट खा रहे थे।’ उन्होंने कहा कि किसी मरीज को दिया गया प्लाज्मा कितनी तेजी से या कितने प्रभावी ढंग से काम करेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी किस चरण में हैं, मरीज का कौन सा अंग काम करना बंद कर रहा है। कॉन्वैलेसेंट प्लाज्मा थेरेपी (सीपीटी) कोई जादू की गोली नहीं है। यह अब भी एक प्रयोगात्मक इलाज है जिसका इस्तेमाल कोविड-19 में किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल दशकों से हो रहा है और इसे सार्स1 और मर्स में भी इस्तेमाल किया गया था।वॉकहार्ट हॉस्पिटल में प्लाज्मा परीक्षण के प्रमुख जांचकर्ता डॉ बेहराम पर्दीवाला का कहना है कि वह प्लाज्मा थेरेपी परीक्षण के नतीजों से काफ ी खुश हैं। उन्होंने कहा, ‘सीपीटी का इस्तेमाल रेमडेसीविर और टोसिलिजुमाब जैसे इलाज के अन्य साधनों के सहायक के रूप में किया जा सकता है। इसे अलग इलाज के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि मुझे नहीं लगता कि यह पारंपरिक इलाज की जगह ले सकता है।’ भारत में सीपीटी का इस्तेमाल कब और किस पर किया जाए, इस बारे में स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से स्पष्ट दिशानिर्देश दिए गए हैं।
यह इलाज उन मरीजों के लिए उपयुक्त है जिन्हें स्टेरॉयड के इस्तेमाल के बावजूद ऑक्सीजन की ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है। पर्दीवाला कहते हैं, ‘हमें गंभीर मरीजों पर इसका इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं है। ऐसा करना भी मूर्खता होगी क्योंकि गंभीर मरीज पर कोई भी प्रायोगिक इलाज करना उसके जीवन को ख़तरे में डालना है।’ डॉक्टर बताते हैं कि अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के लिए शुरुआती इलाज आमतौर पर स्टेरॉयड होता है जब किसी का एसपीओ2 (ऑक्सीजन सैचुरेशन) 96 फ ीसदी से ऊपर नहीं जा रहा होता है, धड़कन दर ज्यादा होती है और सी-रिएक्टिव प्रोटीन (सीआरपी) भी ज्यादा होता है। अगर स्टेरॉयड से कोई ज्यादा बदलाव नहीं आता तब डॉक्टर टोसिलिजुमाब (इसे तब दिया जाता है जब इंटरल्यूकिन-6 (आईएल6) ज्यादा होता है)  या रेमडेसिविर (जब आमतौर पर सीआरपी ज्यादा होता है) के जरिये इलाज करते हैं। कुछ मामलों में डॉक्टर रक्त प्लाज्मा देने का भी फैसला तब कर सकते हैं जब उन्होंने देखा कि मरीज में स्टेरॉयड के बाद भी कोई सुधार नहीं आया। इंटरल्यूकिन-6 (आईएल6) एक प्रोटिन है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर करने में मदद करता है। यह सूजन, संक्रमण आदि से भी बढ़ सकता है। सीपीटी के लिए समय सबसे महत्त्वपूर्ण है। मैक्स हेल्थकेयर के समूह मेडिकल निदेशक डॉ संदीप बुद्धिराजा ने कहा, ‘पहले यह सोचा गया था कि प्लाज्मा थेरेपी तब दी जानी चाहिए जब कुछ भी काम नहीं कर रहा हो और मरीज वेंटिलेटर पर हो। लेकिन यह अवधारणा अब बदल गई है और डॉक्टर अब इस बीमारी में इस थेरेपी का पहले ही इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि गंभीर रूप से बीमार मरीजों का इलाज किया जा सके।’
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि किन मरीजों पर यह थेरेपी काम करेगी। बुद्धिराजा ने स्पष्ट किया, ‘किसी को भी यह धारणा नहीं बना लेनी चाहिए कि अगर कोई प्लाज्मा का इस्तेमाल करता है तो उसे बचाया जा सकता है और बिना प्लाज्मा के उसकी हालत खराब हो सकती है।’ अधिकांश मरीजों में संक्रमित होने के 8वें और 12वें दिन के बीच जटिलता दिखती है और यह महत्त्वपूर्ण समय है जब मरीजों पर बहुत ध्यान देना होता है। मैक्स अस्पताल ने भारत के औषधि महानियंत्रक के पास प्लाज्मा थेरेपी परीक्षण की अनुमति के लिए आवेदन किया था और प्लाज्मा थेरेपी से 50 मरीजों का इलाज भी किया। प्लाज्मा देने के बाद मरीजों को 28 दिन की निगरानी में रखना पड़ता है। अस्पताल ने परीक्षण से इतर भी करीब 200 मरीजों की प्लाज्मा थेरेपी की थी और अब अस्पताल इनका डेटा मिलान कर इसकी प्रभावशीलता का जायजा लेने के लिए शोध करेगा।
हालांकि, अब तक किसी भी शोध में यह बात सामने नहीं आई है कि मृत्यु दर को कम करने में प्लाज्मा थेरेपी का महत्त्वपूर्ण असर दिखा है क्योंकि इसकी मुख्य वजह यह है कि अभी डेटा की मात्रा कम है। इतना वक्त गुजरने के बाद भी डॉक्टर अब भी कोविड-19 के प्रबंधन की बातें सीख रहे हैं। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के क्रिटिकल केयर मेडिसिन के निदेशक और प्रमुख संदीप दीवान ने इसके बारे में कहा, ‘बतौर डॉक्टर हम अब भी सीख रहे हैं कि प्लाज्मा थेरेपी देने का सही समय क्या है।’
हालांकि, डॉक्टर इस बात का खंडन करते हैं कि सीपीटी का इस्तेमाल केवल कारोबारी वजहों से बढ़ रहा है। रक्त से प्लाज्मा को अलग करने की लागत लगभग 10,000 से 11,000 रुपये तक आती है और इलाज में कुल खर्च करीब 15,000 से 20,000 रुपये (भंडारण और परिवहन लागत जोड़कर) तक पड़ जाता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देश
कॉन्वैलेसेंट प्लाज्मा (ऑफ  लेबल) का इस्तेमाल मध्यम स्तर की बीमारी वाले उन मरीजों पर किया जा सकता है जिनमें स्टेरॉयड के बावजूद ऑक्सीजन की कमी हो रही है
किन बातों का ख्याल जरूरी
► ब्लड ग्रुप और दिए जा रहे प्लाज्मा का मिलान है जरूरी
► डोनर प्लाज्मा का एंटीबॉडी विशिष्ट सीमा से ऊपर होना चाहिए
► जिन्हें प्लाज्मा दिया जा रहा है उनकी निगरानी ट्रांसफ्यूजन के कई घंटों बाद तक की जानी चाहिए ताकि कोई प्रतिकूल स्थिति न बने
► आईजीए की कमी या इम्यूनोग्लोबुलिन एलर्जी वाले मरीजों में इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए खुराक
► खुराक 4 से 13 मिली प्रति किलोग्राम के हिसाब से होती है और आमतौर पर 200 मिलीलीटर की एक खुराक धीरे-धीरे दी जानी चाहिए और यह अवधि 2 घंटे से कम नहीं होनी चाहिए
प्लाज्मा क्या है?
► प्लेटलेट्स और आरबीसी को बाहर निकालने के बाद यह रक्त का तरल हिस्सा होता है जिसमें एंटीबॉडी शामिल होती है
प्लाज्मा थेरेपी से जुड़े शोध
► दुनिया भर में करीब 200 परीक्षण हो रहे हैं ताकि इसके प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सके। आईसीएमआर से जुड़े 52 संस्थान भी परीक्षण कर रहे हैं
 
कोरोना : घटनाक्रम
► भारत में कोविड-19 के एक दिन में सर्वाधिक 45,720 नए मामले सामने आने के बाद गुरुवार को देश में संक्रमितों की कुल संख्या 12 लाख पार कर गई। वहीं एक दिन में 1,129 लोगों की मौत के बाद मृतकों की कुल संख्या 29,861 हो गई
► स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि पिछले 24 घंटे में कोविड-19 के 29,557 मरीज ठीक हो गए। इस तरह संक्रमण से ठीक होने की दर अब 63.18 प्रतिशत हो गई है
► पश्चिम बंगाल में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के मद्देनजर गुरुवार को राज्य में पूर्ण लॉकडाउन लागू कर दिया गया
► ओडिशा में कोविड-19 के 1,264 नए मामले सामने के बाद राज्य में संक्रमण के मामले गुरुवार को 21,000 के पार पहुंच गए

First Published - July 23, 2020 | 11:04 PM IST

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