कोविड-19 के वैश्विक टीका निर्माताओं को अपने तीसरे चरण के परीक्षण में बाधाओं का सामना करना पड़ा है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि इन टीके के लिए क्लीनिकल परीक्षण के नमूने का आकार सुरक्षा और प्रभाव साबित करने के लिहाज से बेहद छोटा है। इस वक्त प्रमुख टीका उम्मीदवार अगले साल बड़े पैमाने पर तीसरे चरण के परीक्षण के लिए तैयारी कर रहे हैं।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के सूत्रों ने कहा कि विदेशी टीका निर्माताओं का भारत की आबादी पर क्लीनिकल परीक्षण करने की अनुमति देते समय भारतीय नियामक को अब बेहद सावधान रहना पड़ेगा। दरअसल, भारतीय नियामक ने हाल ही में रूस के स्पूतनिक वी का तीसरे चरण का क्लीनिकल परीक्षण कराने के डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज के प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि जो आंकड़े जमा कराए गए हैं वे एक ‘छोटे’ नमूना आकार से लिए गए थे। एक सूत्र ने कहा, ‘हमने अभी तक सीरम इंस्टीट्यूट को नमूना आकार बढ़ाने के लिए नहीं कहा है। इसे दूसरे और तीसरे चरण के अध्ययन के लिए मंजूरी मिली है और यह उसका ही पालन कर रही है। एक सूत्र ने कहा, ‘लेकिन हम भविष्य की मंजूरी को लेकर बेहद सतर्क रहेंगे।’
इस बीच, जायडस कैडिला और भारत बायोटेक जैसे घरेलू खिलाड़ी तीसरे चरण में बड़े पैमाने पर टीके के प्रभाव से जुड़ी जांच के लिए तैयारी कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक भारत बायोटेक के कोवैक्सीन का परीक्षण 30,000 लोगों पर किया जाएगा जबकि जायडस के जाइकोव डी का परीक्षण 12,000-14,000 लोगों पर किया जा सकता है।
कथित तौर पर टीके के परीक्षण में शामिल एक प्रतिभागी पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩे के बाद सोमवार को जॉनसन ऐंड जॉनसन (जेऐंडजे) कोविड-19 टीके पर रोक लगा दी गई। कंपनी ने एक बयान में कहा, ‘टीके के परीक्षण में शामिल एक प्रतिभागी के बीमार होने और उसकी बीमारी का कोई स्पष्ट अंदाजा न मिलने की वजह से हम तीसरे चरण के परीक्षण सहित हमारे सभी कोविड-19 टीके के क्लीनिकल परीक्षणों पर अस्थायी रूप से रोक लगा रहे हैं और इसकी खुराक अभी नहीं दी जाएगी।’ इसका मतलब यह है कि करीब 60,000 लोग जो अपनी मर्जी से इस परीक्षण में शामिल होने के लिए ऑनलाइन नामांकन कराते उसे भी अब बंद कर दिया गया है और अब स्वतंत्र सुरक्षा समिति स्थिति की समीक्षा करेगी। इससे पहले, परीक्षण में शामिल एक व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र में कुछ गंभीर लक्षण देखने को मिले जो रीढ़ की हड्डी में सूजन से जुड़ी एक दुर्लभ बीमारी है, इसके बाद ही एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफ र्ड यूनिवर्सिटी के टीके के परीक्षण को स्थगित कर दिया गया था और इसे ब्रिटेन तथा भारत में फि र से शुरू किया गया था। दरअसल, अमेरिका के नियामक को अभी ब्रिटेन में अपने परीक्षणों को फि र से शुरू करने के लिए एस्ट्राजेनेका को मंजूरी देनी बाकी है।
इन घटनाओं के संदर्भ में वरिष्ठ विषाणुविज्ञानी जैकब जॉन और यहां तक कि कई स्वदेशी टीका निर्माता भी बताते हैं कि एस्ट्राजेनेका टीके के लिए भारत में हो रहे क्लीनिकल परीक्षणों का नमूना आकार काफ ी छोटा है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) भी एस्ट्राजेनेका के टीके के लिए भारत में 1,600 से अधिक लोगों पर तीसरे चरण का क्लीनिकल परीक्षण कर रही है।
जॉन ने कहा, ‘टीके के परीक्षण के लिए 1,600 लोगों का नमूना आकार काफ ी बड़ा नहीं है क्योंकि प्रायोगिक दवा के लिए बीमारी के मामलों की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए। नमूना आकार बड़ा होगा तभी टीके का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकेगा।’ वहीं घरेलू टीका निर्माता यह स्वीकार करते हैं कि प्रतिकूल घटनाएं नियमित रूप से बड़े पैमाने पर परीक्षणों के दौरान सामने आती हैं और उनका दावा है कि नमूना आकार इस वजह से बड़ा होना चाहिए क्योंकि इससे यह अंदाजा मिल सकेगा कि भारतीय आबादी में किस तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं।
कोविड-19 का टीका तैयार कर रही एक टीका निर्माता कंपनी के मालिक ने कहा, ‘विशेष रूप से ब्रिटेन में 40,000 लोगों के एक समूह पर परीक्षण हो रहा है। हम कुछ हजार लोगों पर परीक्षण की अनुमति दे रहे हैं। इस तरह के परीक्षण में केवल प्रतिरोधक प्रतिक्रिया या ऐंटीबॉडी पैदा करने के लिए एक टीके की क्षमता की जांच की जा सकती है लेकिन इससे टीका लगे लोगों में और बिना टीका वाले लोगों में प्रभाव की जांच नहीं हो सकती है।’
मूल बात यह है कि टीका निर्माता प्रभाव साबित करने के लिए जितना कम जोखिम लेता है नमूने का आकार उतना ही बड़ा होता है। अगर 50 प्रतिशत लोगों को टीका दिया जाता है और उन्हें बीमारी नहीं होती है और नियामक उसे स्वीकार करता है (जो कोविड-19 टीके का मामला है) तब टीके का प्रभाव स्थापित करने का जोखिम कम होता है और ऐसे में नमूना बड़ा रखने की जरूरत होगी।
बायोलॉजिकल ई की प्रबंध निदेशक महिमा दातला ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से पहले बातचीत में बताया था कि भारतीय खिलाडिय़ों ने टीके के प्रभाव का अध्ययन कभी नहीं किया है क्योंकि यहां नए टीके की खोज नहीं हुई है। वह कहती हैं, ‘हम पहले से ही खोज किए गए टीके का अनुसरण कर रहे हैं। खोज करने वाला प्रभाव का अध्ययन करता है ताकि यह साबित हो सके कि टीका सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। लेकिन भारत में किसी ने भी प्रभाव के अध्ययन के इस पैमाने पर काम नहीं किया है।’
60 साल से कम उम्र के लोगों की कोविड से ज्यादा मौत
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि कोविड-19 संबंधी 47 प्रतिशत मौत के मामलों में 60 साल से कम उम्र के लोग शामिल हैं। मंत्रालय के सचिव राजेश भूषण ने कहा कि कोविड-19 संबंधी मौतों में 70 प्रतिशत मामले पुरुषों और 30 प्रतिशत मामले महिलाओं से संबंधित हैं। भूषण ने कहा, ‘कोविड-19 संबंधी मौत के लगभग 53 प्रतिशत मामलों में लोगों की उम्र 60 साल या इससे अधिक रही। मौत के 35 प्रतिशत मामलों में 45-60 वर्ष आयु समूह के लोग शामिल रहे हैं। 10 प्रतिशत मामलों में 26-44 वर्ष आयु समूह के लोग शामिल रहे। 18-25 वर्ष आयु समूह और 17 साल से कम उम्र के लोगों में एक-एक प्रतिशत मौत के मामले देखने को मिले।’ 60 साल और इससे अधिक आयु समूह में मौत के मामलों में 24.6 प्रतिशत लोगों को पहले से कोई बीमारी थी।