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कोर्ट में जाएगा डिजिटल कर!

Last Updated- December 12, 2022 | 8:21 AM IST

बजट में विदेशी डिजिटल ऑपरेटरों पर 2 प्रतिशत इक्वलाइजेशन लेवी लगाने को लेकर केंद्र सरकार के  स्पष्टीकरण के बाद इसकी संभावना बढ़ गई है। इसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। कुछ कंपनियां आगामी सप्ताहों में रिट याचिका दायर करने की संभावना तलाश रही हैं।
लेवी के कथित अतिरिक्त क्षेत्रीय पहुंच के आधार पर याचिका दाखिल की जा सकती है, क्योंकि इसका मकसद उन इकाइयों को शामिल करना है, जिनकी भारत में भौतिक उपस्थिति नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय कराधान नियमों के खिलाफ जाता है।
इसके अलावा द्विपक्षीय कर समझौतों के तहत भी इसे चुनौती दी जा सकती है क्योंकि इसे ‘आयकर के प्रच्छन्न रूप के रूप में देखा जा रहा है, जिसे कर संधियों के तहत भारत की बाध्यताओं से बचने के लिए’ तैयार किया गया है।
यह लेवी पिछले साल तक 6 प्रतिशत की दर से सिर्फ डिजिटल विज्ञापन सेवाओं पर लागू होता था, सरकार ने अब इसकी संभावना गैर प्रवासी ई-कॉमर्स कंपनियों पर 2 प्रतिशत कर लगाने तक बढ़ा दी है, जिनका कारोबार 1 अप्रैल से 2 करोड़ रुपये से ऊपर है। एक वरिष्ठ कर सलाहकार ने कहा, ‘कुछ कंपनियां बजट में इक्वलाइजेशन लेवी के स्पस्टीकरण के खिलाप रिट याचिका दाखिल करने पर विचार कर रही हैं। इस पर बातचीत चल रही है क्योंकि इससे न सिर्फ विदेशी कंपनियों की कमाई प्रभावित होगी, बल्कि इसका उनके भारतीय साझेदारों व सहायक इकाइयों पर भी असर पड़ेगा।’
स्पष्टीकरण के मुताबिक अगर भारतीय आईपी एड्रेस से ऑनलाइन लेन-देन की जाती है तो यह लेवी के दायरे में आ सकता है। बहरहाल इसे विक्रेता के साथ वस्तु या सेवाओं के ग्राहकों द्वारा चुनौती दी जा सकती है। एक वकील ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा, ‘इस तरह से न तो खरीदार की आवासीय स्थिति और न ही भारतीय आईपी एड्रेस का इस्तेमाल ही इक्वलाइजेशन लेवी को तेज करने का तार्किक आधार है।’
दरअसल स्पष्टीकरण के मुताबिक ईमेल से किए गए ऑर्डर पर भी लेवी लगेगी। उदाहरण के लिए अगर भारत का एक मर्सिडीज बेंज डीलर ईमेल से 15,000 करोड़ रुपये का ऑर्डर जर्मन कार निर्माता को करता है तो इस लेन-देन पर 2 प्रतिशत लेवी लगेगा, जो 300 करोड़ रुपये होगा। स्पष्टीकरण के मुताबिक अगर लेन-देने का कोई भी हिस्सा ऑनलाइन रहता है, जिसमें खरीद ऑर्डर देना या ऑनलाइन भुगतान करना शामिल है, तो उस पर कर लागू होगा। वहीं अगर टेलीफोन कॉल पर ऑर्डर दिया जाता है तो  लेवी के दायरे में नहीं आएगा।
एकेएम ग्लोबल के पार्टनर अमित माहेश्वरी ने कहा, ‘निश्चित रूप से इससे करदाताओं की चिंता बढ़ेगी क्योंकि तमाम ऐसे मसले हैं, जिनका समाधान नहीं किया गया है और नए बदलाव ने संभावनाएं बढ़ा दी हैं। पेमेंट गेटवे, सॉफ्टवेयर कंपनियां, टेक दिग्गज, ई कॉमर्स ऑपरेटर और यहां तक कि इस प्लेटफॉर्म से कोई सामान बेचने वाला व्यक्ति भी अब ईएल के दायरे में आएगा।’
सरकार के एक वरिष्ठ कर अधिकारी ने कहा कि एक अप्रैल, 2020 से इसे पेश किए जाने के बाद से ही सरकार का मकसद इस तरह के लेन-देन पर कर लगाने का रहा है। सरकार देर से भुगतान पर लगने वाले शुल्क में कुछ राहत देने पर विचार कर सकती है क्योंकि कुछ कंपनियां अब महसूस कर रही थीं कि वे संभवत: इस शुल्क के दायरे में नहीं आएंगी।

First Published - February 13, 2021 | 12:04 AM IST

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