हाल में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि वह उस पत्र से बेहद आहत हुई हैं जिसे कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने नेतृत्व की ‘निष्क्रियता’ की शिकायत करते हुए लिखा था लेकिन इन नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि इन 23 में से कुछ नेताओं ने इसे महज एक पाखंड बताया है और कहा कि पत्र की वजह से जवाबी कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी है।
कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद के क्षेत्र लखीमपुर खीरी में वहां के जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने एक प्रस्ताव पारित कर उन्हें कांग्रेस के लिए विश्वासघाती बताया और उनके निष्कासन की मांग की। इसके बाद वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने ट्वीट किया, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद को आधिकारिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। कांग्रेस को खुद के नेताओं पर निशाना साध कर अपनी ऊर्जा बरबाद करने के बजाय सर्जिकल स्ट्राइक के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को निशाना बनाने की जरूरत है।’ जिला कांग्रेस अध्यक्ष धीरज गुज्जर का दावा है कि उन्हें एक अनाम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव ने यह बयान जारी करने के निर्देश दिए थे। पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद ने भी उस पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। बुधवार को देर शाम कांग्रेस महासचिव (संगठन) के सी वेणुगोपाल ने पत्र जारी कर घोषणा की कि कई अध्यादेशों पर कांग्रेस के रुख को स्पष्ट करने और इन अध्यादेशों का अध्ययन करने के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया जा रहा है जिन्हें सरकार आगामी संसद सत्र में पारित करने की कोशिश करेगी। इस समिति के सदस्यों में पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, गौरव गोगोई और लुधियाना से कांग्रेस सांसद डॉ अमर सिंह हैं। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि इसमें पार्टी के दो शीर्ष वकीलों अभिषेक सिंघवी और मनीष तिवारी के नाम शामिल नहीं हैं जो आनंदपुर साहिब से सांसद हैं और उन्होंने भी पत्र पर हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि छह महीने में एआईसीसी का सत्र आयोजित किया जाएगा जिसमें एक नया अध्यक्ष चुना जाएगा लेकिन सीडब्ल्यूसी के प्रस्ताव में यह बात शामिल नहीं है। यही वजह है कि असहमति जताने वाले नेता पूछ रहे हैं कि इसका वास्तव में क्या मतलब है? क्या चुनाव कराया जाएगा और यह प्रक्रिया छह महीने में पूरी होगी? या यह प्रक्रिया छह महीने के बाद शुरू होगी?
एक अन्य दिलचस्प घटनाक्रम में शिवसेना के मुखपत्र सामना ने अपने संपादकीय में कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं की आलोचना की है। यह बिल्कुल असामान्य बात है क्योंकि शिवसेना का कांग्रेस पार्टी के आंतरिक मामलों में बोलने का कोई औचित्य नहीं है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने भी इस पत्र पर हस्ताक्षर किए जो शिवसेना-कांग्रेस सरकार बनाने में एक प्रमुख कड़ी थे और इस गठजोड़ के विरोध में खड़ी सोनिया का सामना भी उन्होंने ही किया था। जाहिर है अब वह निशाने पर है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी सीडब्ल्यूसी की बैठक के बाद एक बयान में कहा कि यह स्वीकार किया जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी का संगठन देश की मौजूदा स्थिति में कांग्रेस के दर्शन को आगे बढ़ाने और लोकतंत्र की रक्षा करने की स्थिति में नहीं है। वह चिकबल्लापुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए थे और कर्नाटक में कांग्रेस के कई वरिष्ठ सदस्यों में से एक थे जो चुनाव हार गए थे। लेकिन पार्टी में उनके प्रतिस्पद्र्धी और अनुसूचित जाति के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े राज्यसभा सीट हासिल करने में सफ ल रहे जब जून में राज्यसभा के चुनाव हुए थे।