धातुओं जैसे कुछ क्षेत्रों पर 2026 से कार्बन कर लगाने के यूरोपीय संघ (ईयू) के फैसले से वैश्विक व्यापार को नुकसान होगा और कार्बन उत्सर्जन को रोकने में मदद नहीं मिलेगी। थिंक टैंक जीटीआरआई ने रविवार को यह आशंका जताई।
‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि यूरोपीय संघ के आयुक्त वोपके होकेस्ट्रा ने एक बयान में कहा है कि ‘कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली’ (सीबीएएम) का एकमात्र उद्देश्य कार्बन रिसाव को रोकना है और इसमें कई बड़ी ‘खामियां’ हैं।
इसके मुताबिक, जीवाश्म ईंधन ग्रीनहाउस में 90 प्रतिशत और कार्बन उत्सर्जन में 75 प्रतिशत योगदान देता है और अगर कार्बन उत्सर्जन से मुक्ति का लक्ष्य है तो यूरोपीय संघ को जीवाश्म-ईंधन के आयात पर भारी कर लगाना चाहिए।
GTRI के को-फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा, “कार्बन रिसाव का आशय यूरोपीय संघ में कार्बन की कीमतों का भुगतान करने से बचने के लिए कमजोर पर्यावरणीय नियमों वाले देशों में उत्पादन स्थानांतरित करने से है। इस पर लगाम का उद्देश्य सिर्फ यूरोपीय संघ की उन कंपनियों से आयात पर कर लगाकर हासिल किया जा सकता था, जिन्होंने उत्पादन को अन्य देशों में स्थानांतरित कर दिया है। हालांकि, ईयू ने सीबीएएम के माध्यम से सभी आयातों पर कर लगाने का विकल्प चुना है।”
उन्होंने तर्क दिया कि एक कंपनी बेहतर प्रौद्योगिकी, सस्ते श्रम, कर प्रोत्साहन, सब्सिडी पर मिलने वाली जमीन एवं बिजली के लिए दूसरे देश में स्थानांतरित हो सकती है, न कि केवल कार्बन करों से बचने के लिए।
श्रीवास्तव ने कहा कि यूरोपीय संघ ने इन प्रमुख बिंदुओं को नजरअंदाज किया और इस तरह उत्पादन को दूसरी जगह ले जाने की संकल्पना का विरोध किया है।
उन्होंने कहा, “सीबीएएम से वैश्विक उत्सर्जन में कमी नहीं आएगी क्योंकि इसमें अधिक उत्सर्जन वाले उत्पादों के आयात पर रोक नहीं लगाई गई है। यह कार्बन रिसाव को नहीं रोकेगा, सिर्फ वैश्विक व्यापार को चोट पहुंचाएगा।”