GST में बदलाव के बाद अब इंश्योरेंस सेक्टर की नजरें आने वाले केंद्रीय बजट 2026-27 पर टिकी हैं। कंपनियां चाहती हैं कि सरकार लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस पर इनकम टैक्स के फायदे बढ़ाए। दोनों टैक्स सिस्टम में प्रोटेक्शन और हेल्थ प्लान्स के लिए ज्यादा छूट मिले, पेंशन स्कीम्स को और मजबूत सपोर्ट दिया जाए। साथ ही, हाई वैल्यू वाली पॉलिसीज के मैच्योर होने पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगने की सीमा को 5 लाख रुपए से बढ़ाकर 10 लाख रुपए किया जाए। यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान्स (यूलिप्स) के लिए भी टैक्स-फ्री मैच्योरिटी की लिमिट को 5 लाख तक ले जाने की मांग है।
ये मांगें इसलिए उठ रही हैं क्योंकि GST में हाल ही में प्रीमियम पर छूट दी गई है, जिससे इंश्योरेंस थोड़ा सस्ता हो गया। बंधन लाइफ इंश्योरेंस के MD और CEO सतीश्वर बी कहते हैं कि ये बदलाव से लोगों को इंश्योरेंस आसानी से मिल रहा है। वो उम्मीद करते हैं कि बजट में ये रफ्तार बनी रहेगी। उनके मुताबिक, प्रोटेक्शन और हेल्थ प्लान्स पर दोनों टैक्स रिजीम में बेहतर फायदे मिलने से ज्यादा परिवारों को कवर मिलेगा। पेंशन प्रोडक्ट्स को और सपोर्ट मिले और यूलिप्स की प्रीमियम कैप को ट्रेडिशनल प्लान्स की तरह 5 लाख तक बढ़ाया जाए। वो कहते हैं कि ऐसे आसान बदलाव से भारत का फाइनेंशियल फ्यूचर मजबूत होगा और ‘2047 तक सभी के लिए इंश्योरेंस’ का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।
ट्रेडिशनल लाइफ पॉलिसीज में भी बदलाव की मांग जोर पकड़ रही है। कंपनियां चाहती हैं कि हाई वैल्यू वाली इन पॉलिसीज के मैच्योर होने पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगने की सीमा को 5 लाख से 10 लाख रुपए तक बढ़ाया जाए। याद रहे, फरवरी 2023 में सरकार ने यूलिप्स को छोड़कर बाकी ट्रेडिशनल पॉलिसीज पर सालाना 5 लाख से ज्यादा प्रीमियम वाली स्कीम्स पर इनकम टैक्स लगाना शुरू किया था। इससे पहले ये पूरी तरह टैक्स-फ्री होती थीं। अब इंडस्ट्री का मानना है कि महंगाई और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए ये सीमा ऊंची होनी चाहिए, ताकि लोग ज्यादा निवेश करें और सिक्योरिटी बढ़े।
जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। वो इनकम टैक्स एक्ट की सेक्शन 80D के तहत डिडक्शन की लिमिट बढ़ाने की बात कर रही हैं। अभी 60 साल से कम उम्र के लोगों और परिवारों के लिए ये 25 हजार रुपए है, जबकि सीनियर सिटीजन के लिए 50 हजार। लेकिन मेडिकल खर्चों में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए ये लिमिट कम पड़ रही है। इफको-टोकियो जनरल इंश्योरेंस के MD और CEO सुब्रत मंडल कहते हैं कि ये सीमाएं कई साल पुरानी हैं। मेडिकल इन्फ्लेशन और ज्यादा कवर की जरूरत को देखते हुए इन्हें दोगुना करना चाहिए। इससे लोग कम कवर की बजाय ठीक-ठाक प्रोटेक्शन लेंगे और लंबे समय के लिए फाइनेंशियल सेफ्टी मिलेगी।
क्लाइमेट चेंज के खतरे भी इंश्योरेंस इंडस्ट्री की चिंता में हैं। एसबीआई जनरल इंश्योरेंस के MD और CEO नवीन चंद्र झा कहते हैं कि बजट 2026 में क्लाइमेट-रिस्क इंश्योरेंस को बढ़ावा देने वाले कदम उठाए जा सकते हैं। इससे देश की रिस्क मैनेजमेंट मजबूत होगी। वो डेटा बेस्ड बदलावों पर जोर देते हैं, जैसे एक ही जगह इंश्योरेंस डेटा का एक्सचेंज और कंसेंट बेस्ड डिजिटल सिस्टम। इससे अंडरराइटिंग सही होगी, फ्रॉड रुकेगा और क्लेम प्रोसेस आसान बनेगा। झा के मुताबिक, सस्ते रेट्स, नई टेक्नोलॉजी और डेटा का सही इस्तेमाल से जनरल इंश्योरेंस कंपनियां बढ़ेंगी और फाइनेंशियल इंक्लूजन का लक्ष्य हासिल होगा।
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पब्लिक सेक्टर की तीन बड़ी जनरल इंश्योरेंस कंपनियां नेशनल इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस की हालत ठीक नहीं है। इनकी सॉल्वेंसी रेशियो नेगेटिव है, यानी ये रिस्क कवर करने में कमजोर हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स उम्मीद कर रहे हैं कि बजट में इनके लिए स्पेशल फंडिंग का ऐलान हो। इक्रा की वाइस प्रेसिडेंट नेहा पारिख कहती हैं कि PSU कंपनियों की कमजोर सॉल्वेंसी को देखते हुए रीकैपिटलाइजेशन के लिए पैसा दिया जाए। साथ ही, इंश्योरेंस की कम पहुंच को बढ़ाने के लिए छोटी पॉलिसीज पर इंसेंटिव मिलें। इससे कम आय वाले लोग भी इंश्योरेंस लेंगे और सेक्टर ग्रो करेगा।