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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मासिक धर्म स्वच्छता अब अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का मौलिक अधिकार

कोर्ट का मानना है कि मासिक धर्म की प्रोडक्ट्स और जरूरी सुविधाएं लड़कियों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ उनकी कुल भलाई के लिए बेहद जरूरी हैं

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रिमझिम सिंह   
Last Updated- January 30, 2026 | 5:49 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि मासिक धर्म की सफाई का हक और मासिक धर्म से जुड़ी चीजों तक पहुंच, संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

यह फैसला जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने सुनाया। मामला केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक स्वच्छता नीति’ को देशभर में लागू करने से जुड़ा था। कोर्ट ने खासतौर पर सरकारी और सरकारी मदद वाले स्कूलों पर ध्यान दिया। सवाल उठा था कि क्या स्कूलों में ठीक मासिक स्वच्छता की सुविधाएं न होना लड़कियों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है।

मासिक स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार में शामिल किया

कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार मासिक स्वास्थ्य भी शामिल है। बेंच ने लिखा, “अगर लड़की को सुरक्षित, असरदार और किफायती मासिक स्वच्छता की सुविधाएं मिलें, तो उसका यौन और प्रजनन स्वास्थ्य बेहतर स्तर तक पहुंच सकता है।”

कोर्ट का मानना है कि मासिक धर्म से जुड़े प्रोडक्ट्स और जरूरी सुविधाएं लड़कियों के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी हैं। बिना इनके लड़कियां कई तरह की परेशानियों से गुजरती हैं।

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सुविधाओं की कमी से शिक्षा का अधिकार भी खतरे में

कोर्ट ने एक अहम सवाल पर गौर किया – क्या स्कूलों में अलग-अलग लड़के-लड़कियों के टॉयलेट और मासिक धर्म के लिए पैड्स जैसी चीजें न होना शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है?

जजों ने देखा कि खराब बुनियादी ढांचा और बेसिक सुविधाओं की कमी से लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं या पूरी पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं। इससे उनकी आगे की पढ़ाई और जिंदगी के मौके प्रभावित होते हैं।

कोर्ट ने कहा कि मासिक स्वच्छता की सुविधाओं तक पहुंच न होना लड़की की गरिमा को नुकसान पहुंचाता है। फैसले में लिखा गया है, “अगर मासिक स्वास्थ्य के साधन नहीं मिलते, तो लड़की की गरिमा कमजोर होती है। असली गरिमा तब होती है जब कोई बिना अपमान, अलग-थलग या अनावश्यक तकलीफ के जीवन जी सके।” संविधान में खासकर बच्चों के लिए गरिमा को बहुत अहम माना गया है।

लड़कियों, माता-पिता को जागरूक और मजबूत बनाने का संदेश

कोर्ट ने इस फैसले को जागरूकता का जरिया बताया। इसका मतलब है कि लड़की छात्राएं, टीचर्स और अभिभावक समझें कि मासिक स्वच्छता उनका कानूनी हक है और वे स्कूलों में अच्छी सुविधाएं मांग सकते हैं।

बेंच ने कहा कि मासिक धर्म के उत्पाद और सुरक्षित शौचालय जैसी सुविधाएं देना जरूरी है, ताकि लड़कियों के लिए पढ़ाई का माहौल समावेशी और सहायक बने।

First Published : January 30, 2026 | 5:31 PM IST