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2 लाख परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट! POP की मूर्तियों पर रोक से महाराष्ट्र के मूर्तिकारों में आक्रोश, सरकार से राहत की मांग

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि पीओपी मूर्तियों पर प्रतिबंध प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार लगाया गया है।

Last Updated- March 23, 2025 | 10:14 PM IST
Ganesh
फोटो क्रेडिट: Pexels

गणेशोत्सव महाराष्ट्र में आस्था के साथ कारोबार का भी पर्व है। सुंदर मूर्तियां लोगों को आकर्षित करती हैं और उनके प्यार ने राज्य में मूर्तियों के कारोबार को हजारों करोड़ रुपये के पार पहुंचा दिया है। मगर इस कारोबार पर अब प्रदूषण की नजर लग गई है क्योंकि अदालती आदेश की वजह से सरकार ने प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियां बनाने, बेचने और विसर्जित करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसकी सीधी चोट मूर्तिकारों के कारोबार और राज्य के सबसे बड़े पर्व गणेशोत्सव पर पड़ने वाली है।

अदालत के फैसले से महाराष्ट्र के करीब तीन लाख मूर्तिकारों का कारोबार चौपट हो रहा है। यहां ज्यादातर मूर्तियां गणेशोत्सव के लिए ही बनती हैं मगर राज्य के कुछ हिस्सों में मूर्तियों के कारखाने साल भर चलते रहते हैं। रायगढ़ जिले की पेण तहसील और इसके आसपास का क्षेत्र गणपति की मूर्तियों का केंद्र माना जाता है। करीब के गांव हमरापुर, कलवा, जोहा, तांबडशेत, दादर, रावे, सोनकार, उरनोली, हनमंत पाडा, वडखल, बोरी, शिर्की में गणेशोत्सव के 10 दिन और पितृपक्ष के 15 दिन छोड़कर साल भर घर-घर में 6 इंच से 12 फुट की मूर्तियां बनती रहती हैं। इस क्षेत्र में ऐसी 1,600 इकाइयां हैं, जिनका सालाना कारोबार 250 से 300 करोड़ रुपए का है और साल में 3 से 3.25 करोड़ मूर्तियां बनती हैं। इनमें से करीब 1.25 करोड़ मूर्तियां गोवा, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के थोक व्यापारियों के पास जाती हैं, जहां से देश भर में पहुंचती हैं।

पीओपी पर प्रतिबंध की बात से मूर्तिकारों में गहरा आक्रोश है और वे मूर्तियां इसी से बनाने पर अड़े हैं। उनका कहना है कि रोक नहीं हटी तो प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति बनाने नाले 2 लाख परिवार भूखे मर जाएंगे। रसायन विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ जयंत गाडगिल भी मूर्तिकारों का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि समुद्र में लाखों तरह के जहर पहुंच रहे हैं और केवल पीओपी को प्रदूषण का कारण नहीं माना जाए। उन्होंने कहा कि मूर्तियां शाडू मिट्टी से भी बनती हैं, जिसमें 8 हानिकारक तत्व मिलते हैं, जबकि प्लास्टर ऑफ पेरिस में ऐसे तत्व केवल दो हैं। साथ ही पीओपी का दोबारा इस्तेमाल हो सकता है और सल्फर तथा कैल्शियम हटा लें तो इसमें 85 फीसदी मिट्टी ही होती है।

लालबाग के राजा की मूर्ति बनाने वाले संतोष रत्नाकर कांबले भी यही तर्क देते हैं। उनका कहना है कि पीओपी पानी में मिट्टी के मुकाबले देर में घुलता है, इसलिए यह शाडू मिट्टी के मुकाबले बेहतर है। उनका कहना है कि सरकार शाडू मिट्टी के कम हानिकारक विकल्प दे रही है तो पीओपी के भी दे वरना पाबंदी हटाए।

मूर्तिकारों के पास दूसरे तर्क भी हैं। उनका कहना है कि मिट्टी से दो-ढाई फुट से ऊंची मूर्ति नहीं बन सकती क्योंकि उसमें दरार आ जाती है और टूट सकती है। गणोशोत्सव पर 36 फुट तक ऊंचाई वाली मूर्तियों की मांग रहती है। साथ ही मिट्टी की मूर्ति पीओपी मूर्ति से 40 फीसदी महंगी पड़ती है और पीओपी जैसी बारीक कारीगरी भी उसमें नहीं हो पाती। ऐसे में पीओपी पर रोक से गणेशोत्सव और महाराष्ट्र की संस्कृति पर गहरी चोट पड़ेगी।

मूर्तिकारों और दूसरे संगठनों का विरोध देखकर सराकर बीच का रास्ता निकालने की जुगत भिड़ा रही है क्योंकि इससे बेरोजगारी फैलने का डर है और आस्था की बात तो है ही। पारंपरिक मूर्ति निर्माण बरकरार रखने और बेरोजगारी से बचने के लिए सराकर ने डॉ अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति बनाई है, जो पीओपी के विकल्प सुझाएगी।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि पीओपी मूर्तियों पर प्रतिबंध प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार लगाया गया है। कई बार सीमा आगे बढ़ाने के बाद अब उच्चतम न्यायालय ने आखिरी फैसला देते हुए पीओपी मूर्तियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। मगर उन्होंने कहा कि काकोडकर समिति की रिपोर्ट आने तक प्रतिबंध नहीं लगाने का अनुरोध अदालत से किया जाएगा।

सरकार को डर है कि इसे सियासी मुद्दा न बनाया जाए मगर उस पर चौतरफा हमले तेज हो गए हैं। शिवसेना (यूबीटी) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे अदालत में सरकार की सुस्ती को प्रतिबंध की वजह बताते हैं। राज्य की पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री पंकजा मुंडे ने इस पर कहा है कि राज्य सरकार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर पीओपी मूर्तियों का निर्माण जारी रखने का प्रयास करेगी। इसके लिए राजीव गांधी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आयोग से भी मदद मांगी गई है।

निर्यात भी होती हैं मूर्तियां

हमरापुर गणेश विभाग मूर्तिकार संगठन सबसे बड़ा है। इससे 480 उद्योग इकाइयां जुड़ी हुई हैं। संगठन के सचिव राजन पाटिल कहते हैं कि यहां से मूर्तियों की बिक्री हर साल जून में शुरू हो जाती है और लगभग 2 लाख मूर्तियां विदेश भेजी जाती हैं, जिनकी कीमत लगभग 50-60 करोड़ रुपये होती है। सबसे ज्यादा मूर्तियां थाईलैंड, इंडोनेशिया एवं मॉरीशस भेजी जाती हैं। मूर्तिकारों का कहना है कि गणेश की 30 फीसदी मूर्तियां शाडू मिट्टी से और 70 फीसदी मूर्तियां पीओपी से बनती हैं।

पिछले कुछ सालों में कच्चे माल के दाम में इजाफा होने की वजह से मूर्तियां भी महंगी हुई हैं। कोरोना के पहले 100 रुपये में मिलने वाला मिट्‌टी या पीओपी का बैग अब 200 रुपये में मिल रहा है। रंग और ब्रश के दाम भी बेतहाशा बढ़ गए हैं। पेण इलाके में मिट्टी से बनी एक फुट की बिना रंग की मर्ति 300 रुपये के करीब मिल जाती है और पीओपी की बिना रंगी मूर्ति 200 रुपये में मिल रही है। मिट्टी की रंगी हुई मूर्ति 800 रुपये में मिलती है और रंगने के बाद पीओपी की मूर्ति की कीमत 500 रुपये हो जाती है। मुंबई और आसपास के इलाकों में इनकी कीमत दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है क्योंकि मुंबई में मूर्तिकारों को भाड़ा और मजदूरी अधिक देने पड़ती है। महाराष्ट्र में मूर्ति का कारोबार 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। गणेशोत्सव के दौरान ही 500-600 करोड़ रुपये की मूर्तियां बिक जाती हैं।

महाराष्ट्र की पहचान है गणेशोत्सव

सितंबर महीने में 10 दिन तक चलने वाले गणेशोत्सव में महाराष्ट्र में उत्सव, उमंग, भक्ति के साथ बाजारों की रौनक देखते ही बनती है। गणपति बप्पा के स्वागत के लिए लोग खूबसूरत पंडाल और घर सजाते हैं, जिसके लिए जमकर खरीदारी की जाती है। इसीलिए छोटे-बड़े सभी बाजारों और दुकानों पर भारी भीड़ दिखती है। कारोबारी संगठनों का अनुमान है कि पिछले साल गणेशोत्सव के दौरान सिर्फ महाराष्ट्र में 11,000 करोड़ रुपए से अधिक का व्यापार हुआ । दूसरे राज्यों को मिलाकर इस दौरान 25,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार हुआ। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने गणेशोत्सव के दौरान 25,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार होने का अनुमान लगाया था।

गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और गोवा में आर्थिक गतिविधियों को खास तौर पर बढ़ावा देती है। इन राज्यों में 20 लाख से अधिक गणेश पंडाल लगाए जाते हैं। अकेले महाराष्ट्र में 7 लाख से अधिक पंडाल लगते हैं, कर्नाटक में 5 लाख, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में 2-2 लाख पंडाल लगत हैं। बाकी 2 लाख पंडाल देश के शेष भागों में लगाए जाते हैं। केवल गणेश प्रतिमाओं का व्यापार 500 करोड़ से अधिक का होता है। कैट के राष्ट्रीय मंत्री अध्यक्ष शंकर ठक्कर कहते हैं गणेशोत्सव महाराष्ट्र का सबसे बड़े त्योहार में माना जाता है।

महाराष्ट्र में सार्वजनिक स्थलों पर और अधिकतर घरों में गणपति का आगमन होता है और उन्हें अलग-अलग समय के लिए घरों में ही रखा जाता है। इसके लिए लोग दिल खोलकर खर्च करते हैं। इस त्योहार के मौके पर पिछले साल सिर्फ महाराष्ट्र में 11,000 करोड रुपए से अधिक का व्यापार होने का अनुमान है। हर साल यह कारोबार 10-15 फीसदी बढ़ जाता है।

First Published - March 23, 2025 | 10:14 PM IST

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