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कारों के कबाड़ के नहीं मिल रहे अच्छे दाम

कबाड़ नीति के प्रभाव में आने के एक साल बाद भी केंद्र एवं कुछ राज्य सरकारें ही इसको आगे बढ़ा रहीं

Last Updated- May 05, 2023 | 11:01 PM IST
Car junk is not getting good prices
BS

इस साल जनवरी में नीति आयोग से एक एंबेसेडर कार वाहन कबाड़खाना (स्क्रैपयार्ड) भेजी गई। यह कबाड़खाने में पहुंचने वाली पहली कार थी। तब से अब तक दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा स्थित वाहन कबाड़खाने में 10,000 वाहन आ चुके हैं। हालांकि, नीति आयोग से आई यह कार लगभग एक महीने तक भारत की कबाड़ नीति के तहत कबाड़ में तब्दील होने वाली एकमात्र कार थी। कबाड़ नीति अप्रैल 2022 में प्रभाव में आई थी। कई पीढ़ियों पहले वाहन विनिर्माण उद्योग लगाना जितना मुश्किल था उतना ही मुश्किल भारत में पुराने वाहनों को कबाड़खाने भेजना है।

हालांकि यह नीति पूरी तरह स्पष्ट है। 1 अप्रैल 2022 से सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की 15 साल से अधिक पुरानी कारें सड़कों पर नहीं दौड़ सकती हैं। इस वर्ष अप्रैल से 15 साल से अधिक पुराने वाहनों जैसे ट्रकों को अनिवार्य परिचालन जांच से गुजरना होगा।

1 जून 2024 से सभी कारों एवं यात्री वाहनों (15 साल पुराने पेट्रोल एवं 10 साल पुराने डीजल वाहन) को अपना पंजीयन बरकरार रखने के लिए इसी तरह की जांच से गुजरना होगा। कबाड़ नीति में कहा गया है कि अगर ऐसे वाहन परिचालन के लिए अनुपयुक्त पाए जाते हैं या पंजीयन का नवीकरण नहीं करा पाते हैं तो उनकी जगह फिर कबाड़खाने में होगी।

पहला कबाड़खाना सेरो था जो सरकार नियंत्रित एमएसटीसी और महिंद्रा एक्सेलो के बीच संयुक्त उद्यम के तौर पर स्थापित हुआ था। सेरो संयंत्र में सालाना 24,000 वाहन कबाड़ में तब्दील किए जाने की क्षमता होगी, मगर आधी क्षमता भी हासिल करने में फिलहाल कुछ वर्षों का समय लग सकता है।

हालांकि, एमएसटीसी के चेयरमैन सुरेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा कि देश में उनके ऐसे छह कबाड़ संयंत्र हैं और अन्य तीन स्थापित किए जा रहे हैं। गुप्ता ने कहा, ‘कारोबार जरूर बढ़ रहा है मगर यह नया है इसलिए हम लंबे समय तक इंतजार करने के लिए तैयार हैं।’

कार के लिए बने इन कबाड़खानों के समक्ष एक चुनौती यह भी है कि भारत में पुरानी कारों के खरीदार मिल जाते हैं इसलिए वे कबाड़खाने भेजने के बजाय बेच दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली (राज्य) सरकार कबाड़खाने पर पहल करने वाली अग्रणी संस्थाओं में एक रही है। 2021 में दिल्ली ने 15 साल पुराने 2,930 वाहनों के पंजीकरण रद्द कर दिए। यह संख्या बढ़कर अब सालाना 6,000 हो गई है मगर इनमें शायद ही कोई वाहन 2016 में स्थापित सीरो के रीसाइकलिंग संयंत्र में पहुंचा है।

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वाहन जितना बड़ा होता है उसे कबाड़ में तब्दील करना उतना ही मुश्किल होता है। उदाहरण के लिए मुंबई में अगर कोई ट्रक चलने के लायक नहीं रहती है देश के किसी हिस्से में इसे खरीदने वाले जरूर मिल जाते हैं। पुरानी कारों के मामले ऐसा नहीं है इसलिए सरकार ने उनके लिए कबाड़ नीति शुरू की है।

ग्रेटर नोएडा और अन्य संयंत्रों में पुरानी कारें तभी आनी शुरू हुईं जब केंद्र एवं राज्य सरकारों ने अपने वाहनों को स्क्रैपयार्ड में भेजना शुरू किया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2023 के बजट भाषण में कहा था कि उन्होंने 15 साल पुराने 9,00,000 सरकारी वाहनों को कबाड़ में तब्दील करने की अनुमति दे दी है।

कबाड़खाने तभी सफल होते हैं जब बड़ी तादाद में इनमें पुराने वाहन आते हैं। इसका कारण यह है कि कबाड़खाना स्थापित करने में काफी लागत आती है। गुप्ता लागत बताने के लिए तैयार नहीं हुए मगर विशेषज्ञों ने कहा कि एक संयंत्र स्थापित करने पर कम से कम 18 करोड़ रुपये लागत आती है। इसमें भूमि अधिग्रहण पर आने वाले खर्च शामिल नहीं होते हैं।

सीरो संयंत्र पट्टे पर ली गई जमीन पर तैयार हुए हैं जिसका मतलब है कि किराये के रूप में काफी रकम देनी पड़ती होगी। ग्रेटर नोएडा में स्थापित कबाड़खाना 5 एकड़ क्षेत्र में फैला है जिनमें वर्क शेड एरिया लगभग 43,450 वर्ग फुट क्षेत्र में है। ये संयंत्र शहरों के नजदीक ही स्थापित किए जाते हैं और इसके कारण भी स्पष्ट हैं। संयंत्र स्थापित करने में शुरुआती खर्च भी अधिक आते हैं, यही कारण है कि केंद्र सरकार ने एमएसटीसी को भी इस परियोजना में शामिल किया है।

वाहनों का कबाड़खाना कुछ इस तरह काम करता है। ये संयंत्र वाहन मालिकों से उनके वाहन खरीदते हैं और लाइसेंस प्राप्त इकाइयों को हानिकारक सामग्री बेचते हैं। इन सामग्री में कार की बैटरियां होती हैं। धातु से बने हिस्से उन्हें बेच दिया जाता है जो उन्हें खरीदना चाहते हैं। एमएसटीसी लौह धातु अलग करने के लिए उच्च क्षमता वाले चुंबकों का इस्तेमाल करती है। कंपनी के एक अधिकारी ने कहा, ‘बाद में बची लौह एवं अलौह धातुएं हमारे ई-कॉमर्स पोर्टल के माध्यम से बेच दी जाती हैं।’

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फिक्की के पूर्व महासचिव एवं वाहन क्षेत्र के विशेषज्ञ दिलीप चिनॉय ने कहा कि सरकार ने विक्रेताओं को विशेष प्रोत्साहन देने की पेशकश की है जो एक अच्छी पहल है। मगर राज्य सरकारों को अपनी तरफ से अधिक सक्रियता दिखानी होगी। नए प्रावधान तैयार करने और वित्तीय समर्थन देने के लिए उन्हें अपने मोटर वाहन अधिनियमों में बदलाव करने होंगे। दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक ने इस मामले में पहल भी कर दी है। इस साल उत्तर प्रदेश ने अपने मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन भी किए हैं।

इन कदमों को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने लिखा है कि ‘इससे भारत के वाहन क्षेत्र में दो महत्त्वपूर्ण बदलाव आ सकते हैं।’ पहली बात तो यह कि इससे राष्ट्रीय स्तर पुराने वाहनों को परिचालन से हटाने से संबंधित नियम तय हो रहे हैं। इससे पुराने वाहनों को परिचालन से हटाने को लेकर जागरुकता और ज्ञान बढ़ते हैं। दूसरा बदलाव यह है कि इससे विभिन्न राज्यों में पंजीकरण नियमों में समानता आएगी।

मगर जमीन एक बड़ा विषय रहेगा। एमएसटीसी के जितने यार्ड हैं उनमें कोई किसी के लिए राज्य सरकारों ने जमीन मुहैया नहीं कराई है बल्कि यह निजी इकाइयों से आई है। एक विशेषज्ञ ने कहा है कि अगर दिल्ली में ताज महल होटल को मुनाफा कमाने के लिए सॉफ्ट लीजहोल्ड मॉडल की जरूरत है तो एक कार कबाड़खाने के लिए भी ऐसी ही मॉडल लाभदायक होगा।

First Published - May 5, 2023 | 11:01 PM IST

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