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प्रत्येक इकाई गुजर रही है लागत पुनर्गठन की प्रक्रिया से

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Last Updated- December 10, 2022 | 10:51 PM IST

आईएनजी ग्रुप एनवी की बीमा और परिसंपत्ति प्रबंधन इकाई आईएनजी इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट अपनी क्षमता बढ़ाने और प्रतिफल पाने के लिए परिचालन का पुनर्गठन कर रही है।
एशिया प्रशांत के बीमा और निवेश के अध्यक्ष और मुख्य कार्याधिकारी हंस वान डर नूरदा ने बाजार और भविष्य की योजनाओं पर गौतम चक्रवर्ती से बातचीत की। पेश है बातचीत के अंश:
वर्तमान परिस्थितियों पर आपका क्या नजरिया है?
लोग अब जोखिम से परहेज करने लगे हैं। मंदी का असर सभी क्षेत्रों पर पड़ा है। केवल यूरोप में यात्रा करना लगता है मंदी से प्रभावित नहीं हुई है। बैंकों में जमा का प्रवाह देखा गया है लेकिन अपनी कसौटी पर खड़े न उतरने वाले लोगों और कंपनियों को वे उधार नहीं दे रहे हैं। यूरोप और अन्य देश पुनर्गठन के दौर से गुजर रहे हैं। प्रत्येक इकाई लागत पुनर्गठन करने की प्रक्रिया में है।
एशिया में कई स्थानीय खिलाड़ियों ने बिक्री हो रही परिसंपत्तियों को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। हालांकि, मैं यह निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अपनी परिसंपत्तियां स्थानीय कंपनियों को बेचेंगी। मैं कुछ हद तक राष्ट्रीयता का भाव देख रहा हूं। समय के साथ-साथ लोग अन्य अवसरों का रुख करेंगे।
मैं अमेरिका और यूरोप के तनाव को देखकर चिंति हूं। मैं इस किंकर्तव्यविमूढ़ता को समझ सकता हूं लेकिन चिंता अगले संकट की है। वैश्विक परिस्थितियां बदल रही हैं।
एशिया को आप किस प्रकार देखते हैं?
एशिया को लेकर मैं आशावादी हूं। एशिया के राज्य हमारे देशों से कहीं बड़े हैं। मैं जापान को लेकर ज्यादा आशावादी नहीं हूं क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका पर निर्भर करती है। लेकिन भारत की जनसंख्या में युवाओं की हिस्सेदारी अधिक है और धन भी बढ़ रहा है। घरेलू बाजार बड़ा है।
चीन और भारत की नीतियों में कोई परिवर्तन करेंगे?
एशिया प्रशांत में हम देश के हिसाब से नीति बना कर चल रहे हैं। हम चीन में अपने निवेशों की समीक्षा कर रहे हैं। चीन में वित्तीय सेवा क्षेत्र में दिलचस्पी को लेकर थोड़ा संशय है। वहां हमारे दो संयुक्त उद्यम हैं। कुल मिला कर वहां 25 विदेशी संयुक्त उद्यम परिचालित हो रहे हैं। इन 25 विदेशी संयुक्त उद्यमों की बाजार हिस्सेदारी केवल पांच प्रतिशत की है जो काफी कम है। लेकिन स्थानीय कंपनियां काफी तेजी से बढ़ रही हैं।
बैंकिंग की बात करें तो कुछ बड़ी कंपनियां अपनी हिस्सेदारी बेच कर बाहर हो रही हैं। हमने चीन में अपने बैंक की शुरुआत करने की संभावनाओं को देखा था। लेकिन फिलहाल यह ज्यादा तरजीही मामला नहीं है। चीन को लेकर मैं ज्यादा आशावादी नहीं हूं। हांलांकि, भारत के मामले में आशावादी हूं। यद्यपि यहां बीमा में हिस्सेदारी लेने में कुछ राजनीतिक बाध्यताएं हैं। निश्चय ही बैंकिंग के क्षेत्र में कुछ सीमाएं हैं। लेकन ये चीन की तुलना में कम हैं।
बाजार में आईएनजी का प्रदर्शन कैसा रहा है?
भारत में भी आईएनजी का कारोबार प्रभावित हुआ है। पिछले साल म्युचुअल फंड बाजार में हमारी हिस्सेदारी दो प्रतिशत की थी। फिल यह घट कर एक प्रतिशत से कम हो गई है। हम नीतिगत समीक्षा में मध्य में हैं। पिछले कुछ वर्षों में हमारा तेजी से विकास हुआ है लेकिन यह समय अपनी अवस्थिति को लेकर सोचने की है। भारत में 36वें स्थान पर होने से लाभ नहीं होने वाला है। जल्दी ही हम कुछ समाधान लेकर आएंगे। 
भारत में भविष्य संबंधी हमारी नीति मुख्यत: समेकन, लागत कम करने और क्षमताएं बढ़ाने, साझेदारों की उत्पादकता बढ़ाने और वितरकों की गुणवत्ता बढ़ाने को लेकर होंगी। समेकन और लागत कम करने की नीति के तहत हमने 300 नौकरयां खत्म की हैं। नियुक्ति के मामले में हम अब काफी सतर्क हैं।
क्या आप अधिग्रहणों के बारे में सोचेंगे?
हम छोटे हैं लेकिन अलग हैं। अधिग्रहणों को लेकर हमारे विचार खुले हैं। भारत में आप किसी चीज को छांट कर नहीं चल सकते।

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First Published - April 4, 2009 | 5:08 PM IST

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