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क्यों परवान नहीं चढ़ा सौदा

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Last Updated- December 14, 2022 | 9:06 PM IST

लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) के साथ विलय के लिए अपनी शुरुआती पेशकश में सुधार की तैयारी थी। लेकिन यही काफी नहीं था, क्योंकि आयॉन समर्थित एनबीएफसी क्लिक्स समूह बैंकिंग में आने की कोशिश कर रहा था। आरबीआई द्वारा मंगलवार को डीबीएस बैंक के साथ आर्थिक रूप से दबावग्रस्त इस बैंक के एकीकरण के सौदे के मसौदे की घोषणा किए जाने के बाद बैंक के साथ विलय की यह कोशिश बेकार हो गई।
तब छह महीने की औपचारिक और भागदौड़ भरी बातचीत के बाद क्लिक्स पर पर्दा क्यों डाला गया जिसमें कई उतार-चढ़ाव, एक नया बोर्ड और प्रबंध निदेशक को हटाने की कई बातें सामने आई हैं? इस साल जून में एलवीबी बोर्ड ने घोषणा की थी कि उसने एकीकरण केलिए क्लिक्स समूह के साथ बातचीत के लिए एक गैर-बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए है। हालांकि अनौपचारिक बातचीत अप्रैल से ही शुरू हो गई थी। एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी) के रूप में यह सोचने वाली बात थी कि विकास के अगले चरण में बैंकिंग मेंं प्रवेश करना आकर्षक होता। अक्टूबर के पहले सप्ताह में क्लिक्स ने एक गैर-बाध्यकारी सांकेतिक प्रस्ताव दिया था। हालांकि इस बीच बहुत सारी कार्रवाई हुई थी – बैंक के मुख्य कार्याधिकारी एस सुंदर और छह निदेशकों को हटाए जाने का फैसला किया गया था। इस मामले की निगरानी के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तीन सदस्यों वाली निदेशकों की एक नई समिति नियुक्त की गई थी।
इस बातचीत में शामिल रहने वालो लोगों का कहना है कि इस सांकेतिक पेशकश को इस तरह से तैयार किया गया था कि क्लिक्स के शेयरधारकों का विलय वाली इकाई के 90 प्रतिशत भाग पर नियंत्रण होता। अपने कोष के जरिये आयॉन की क्लिक्स कैपिटल में 85 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, जबकि बाकी हिस्सा जेनपैक्ट के पूर्व कर्ताधर्ता प्रमोद भसीन और भारत में डीई शॉ के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी अनिल चावला आदि के बीच विभाजित किया गया था। हालांकि इस पेशकश को बेहतर बनाने के लिए निदेशकों की समिति के दबाव की वजह से क्लिक्स भी उन बदलावों पर काम करने पर विचार कर रही थी, जिसके तहत विलय वाली इकाई में उनकी हिस्सेदारी कम होकर 85 प्रतिशत हो जाती। वे बैंक में 2,000 करोड़ रुपये और डालने के लिए धन जुटाते।
हालांकि जब भसीन से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि वह इस सौदे की बारीकियों पर जरा भी टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि हमें सौदे के लिए अधिक धन जुटाना पड़ता, जबकि डीबीएस के पास पूंजी है और नियामक के इस नजरिये से डीएसबी बैंक इंडिया को प्राथमिकता दी गई है, यह बात स्पष्ट है। अलबत्ता उन्होंने यह भी कहा कि एलवीबी की तरफ से काफी देरी हुई है।

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First Published - November 19, 2020 | 12:22 AM IST

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