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कुछ सार्वजनिक बैंकों में केंद्र नहीं रखेगा कोई हिस्सेदारी!

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Last Updated- December 14, 2022 | 10:26 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने निजी क्षेत्र के बैंकों के नियमों की समीक्षा के लिए सेवानिवृत्त अफसर पी के मोहंती की अगुआई में एक समिति गठित की है ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मापदंडों और घरेलू जरूरतों के मुताबिक बनाया जा सके। समिति की रिपोर्ट एक सप्ताह में आ जाएगी।
सरकार का यह विचार बन रहा है कि अगर किसी सार्वजनिक बैंक का निजीकरण किया जाए तो उसे उस बैंक से पूरी तरह बाहर निकल जाना चाहिए। हालांकि सरकार इस बिक्री को आकर्षक बनाने के लिए चाहती है कि आरबीआई निजी क्षेत्र के बैंकों में स्वामित्व के नियमों में ढील दे।
एक शीर्ष सरकारी सूत्र ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), वित्त मंत्रालय, आरबीआई के बीच इस बारे में गहन विचार-विमर्श हुआ था कि सरकार को सार्वजनिक बैंकों में कितनी हिस्सेदारी अपने पास बनाए रखनी चाहिए। इस वित्त वर्ष में, विशेष रूप से जुलाई से सरकार के बाहर के विशेषज्ञों से भी चर्चा चल रही हैं। जुलाई में पीएमओ ने संबंधित अधिकारियों से दो दिन तक इस विषय में व्यापक चर्चा करने को कहा था। इसके बाद कई बार चर्चा हुई और सरकारी अधिकारियों की राय बनी कि जिस बैंक का विनिवेश किया जाए, उसमें कोई हिस्सेदारी नहीं रखी जाए। सूत्रों ने कहा कि अगर सरकार किसी बैंक में 10 फीसदी भी हिस्सेदारी रखती है तो रणनीतिक निवेशक को यह भरोसा दिलाना मुश्किल होगा कि सरकार बोर्ड के फैसलों में कोई दखल नहीं देगी।
उदाहरण के लिए भारतीय कंपनी अधिनियम के तहत कंपनी की चुकता शेयर पूंजी का 10 फीसदी शेयरधारक एक लिखित नोटिस के जरिये बोर्ड से असामान्य आम बैठक बुलाने का आग्रह कर सकता है। इसके अलावा भी ऐसे कई तरीके हैं, जिनके जरिये सरकार अपनी मौजूदगी दर्ज कराएगी और नए प्रबंधन के साथ इस तनाव से बैंक को बढऩे में मदद नहीं मिलेगी।
आरबीआई ने जून में सेवानिवृत्त अफसर पी के मोहंती की अगुआई में एक समिति गठित की थी, जो भारतीय निजी बैंकों के लाइसेंस एवं स्वामित्व नियमों की समीक्षा करेगी ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और घरेलू जरूरतों के मुताबिक बनाया जा सके। यह रिपोर्ट एक सप्ताह में आ जाएगी। इसके आधार पर सार्वजनिक बैंकों से निकलने पर काम शुरू होगा।
सूत्रों ने कहा कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के 12 बैंकों में से सबसे छोटे चार बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना बना रही है। इनमें बैंक ऑफ महाराष्ट्र, पंजाब ऐंड सिंध बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक शामिल हैं। जिन बड़े बैंकों में अन्य का विलय किया गया है, उनमें हिस्सेदारी नहीं बेची जाएगी। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भागीदारों के साथ बैठक में उन्हें सलाह दी कि छोटे बैंकों को ‘स्वायत्त’ बनाने के लिए उनसे निकलने का मतलब ‘व्यक्तिगत स्वायत्तता’ नहीं होना चाहिए। सूत्रों ने कहा कि यह मुश्किल फैसला है। प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशों का यह मतलब नहीं है कि सरकार को हिस्सेदारी रखनी चाहिए, लेकिन उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि विनिवेश किए जाने वाले बैंक में कड़े कॉरपोरेट प्रशासन मानकों का पालन हो। इसका मतलब है कि सरकार को पूंजीगत बाजार में यह भरोसा बनाए रखना होगा कि उसके निकलने से जमाकर्ताओं में सुरक्षा की भावना खत्म नहीं होगी। इस बार की उम्मीद है कि कॉरपोरेट प्रशासन के मानदंडों को मजबूत करने से यह सुनिश्चित होगा कि जब इन बैंकों को सहयोग बंद हो जाएगा तो उनकी रेेटिंग में गिरावट नहीं आएगी। एसऐंडपी और मूडीज ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अपने आकलन में लिखा है कि उनकी रेटिंग सॉवरिन सहयोग पर आधारित है।

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First Published - October 19, 2020 | 11:23 PM IST

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