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RBI डिप्टी गवर्नर का भरोसा: खुदरा मुद्रास्फीति में आगे भी बनी रहेगी नरमी, अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज

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कुल मुद्रास्फीति 2025 के अंत में कई सालों के निचले स्तर तक गिरकर लगभग 1.5 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत पर आ गई

Last Updated- February 24, 2026 | 10:42 PM IST
Retail Inflation
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

कुछ समय से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 4 प्रतिशत लक्ष्य से नीचे रही खुदरा मुद्रास्फीति के आने वाले महीनों में भी नरम रहने की संभावना है। यह बात रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने शुक्रवार को एक कार्यक्रम में कही। उनका यह व्याख्यान मंगलवार को आरबीआई की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है।

कुल मुद्रास्फीति 2025 के अंत में कई सालों के निचले स्तर तक गिरकर लगभग 1.5 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत पर आ गई। नवीनतम श्रृंखला के ताजा आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति 2.75 प्रतिशत रही। संशोधित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) श्रृंखला में, जिसमें 2012 के स्थान पर 2024 को नया आधार वर्ष माना गया है, खपत बास्केट की संरचना में उल्लेखनीय बदलाव हुआ है। खाद्य और पेय पदार्थों का भार 2012 श्रृंखला के 42.86 प्रतिशत से घटाकर 36.75 प्रतिशत कर दिया गया है।

सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज (सीडीएस) के 14वें स्थापना दिवस व्याख्यान में गुप्ता ने कहा, ‘विशेषकर लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (फिट) ढांचे के तहत मुद्रास्फीति समय के साथ कम और अधिक स्थिर भी हुई है। भारत में औसत वार्षिक सीपीआई मुद्रास्फीति 1990 के दशक में लगभग 10 प्रतिशत से घटकर अगले दो दशकों में लगभग 6 प्रतिशत प्रति वर्ष रही। पिछले चार वर्षों में यह 5 प्रतिशत से नीचे रही और आने वाले महीनों में इसके नरम रहने की संभावना है।’

उन्होंने यह भी कहा कि अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित वृद्धि में लगातार सुधार हुआ है और पिछले साढ़े चार दशकों में यह औसतन हर वर्ष 0.03 प्रतिशत अंक बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप वृद्धि 1980 के दशक में औसतन 5.7 प्रतिशत से बढ़कर 1990 के दशक में 5.8 प्रतिशत और फिर 2000 के दशक में 6.3 प्रतिशत तक मजबूत हुई। 2010 के दशक में 6.6 प्रतिशत तक पहुंची और पिछले चार वर्षों में तेजी से बढ़कर 7.7 प्रतिशत हो गई।

उन्होंने कहा, ‘1980 के दशक से भारत की आर्थिक वृद्धि की गति को देखते हुए यह आसानी से देखा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मजबूत हुई है। इसमें बीते साढ़े चार दशक में प्रति वर्ष औसतन 0.03 प्रतिशत अंक की दर से वृद्धि हुई है।’

गुप्ता ने कहा कि भारत की व्यापक आर्थिक बुनियाद लचीली बनी रही है। मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय कमी और निरंतर संरचनात्मक सुधारों के कारण इसे बल मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक परिणामों में भी समय के साथ कम उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। वृद्धि में स्थिरता आई है और यह तमाम क्षेत्रों में एक तय दायरे में रही है। जबकि मुद्रास्फीति में उतार-चढ़ाव कम हुआ है। उत्पादन आधार में विविधता और जीडीपी में तेल की गहनता में कमी के साथ ढांचागत बदलावों ने बाहरी झटकों को कम किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी अर्थव्यवस्था को सामान्यतः व्यापक आर्थिक रूप से स्थिर तब माना जाता है जब प्रमुख संकेतक जैसे मुद्रास्फीति, चालू खाता घाटा, राजकोषीय घाटा, सार्वजनिक ऋण की गुणवत्ता और वित्तीय क्षेत्र के मानक आदि टिकाऊ हों, वृद्धि का समर्थन करें और अत्यधिक जोखिम या ओवरहीटिंग का संकेत न दें। भारत के मामले में इन अधिकांश मानकों ने पिछले चार दशकों में सुरक्षित सीमा के भीतर बने रहते हुए हाल के वर्षों में स्पष्ट सुधार दिखाया है।

बाहरी मोर्चे पर उन्होंने कहा कि चालू खाता घाटा (सीएडी) 1990 से सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 0.5 प्रतिशत से 2.2 प्रतिशत के मध्यम दायरे में रहा है। पिछले छह वर्षों में सीएडी औसतन जीडीपी का लगभग 0.75 प्रतिशत रहा है, जो 1980-81 से 2019-20 के बीच इसके दीर्घकालिक औसत का लगभग आधा है।

उन्होंने इस लचीलेपन का श्रेय विशेष रूप से मजबूत सेवाओं के निर्यात और प्रेषण जैसे विविध प्रवाह स्रोतों को दिया, जिन्होंने अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों से बचाने में खासी मदद की।

महामारी के दौरान सार्वजनिक ऋण बढ़ा था, लेकिन बाद में जैसे ही अर्थव्यवस्था में तेजी आई, राजकोषीय समेकन फिर से शुरू हो गया। उन्होंने कहा कि सामान्य सरकारी ऋण और राजकोषीय घाटे महामारी के शिखर से कम हुए हैं, जबकि कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब भी ऊंचे ऋणों के बोझ से जूझ रही हैं।

गुप्ता ने खास तौर पर कुल खर्च में पूंजीगत व्यय के हिस्से में वृद्धि पर सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता में सुधार पर भी जोर दिया। कर आधार को व्यापक बनाने, अनुपालन बढ़ाने और कर संरचना को तर्कसंगत बनाने के प्रयासों ने प्रत्यक्ष कर संग्रह को मजबूत किया है, जिससे राजकोषीय स्थिरता आई है।

वित्तीय क्षेत्र की सेहत पिछले दशक की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बेहतर हुई है। पूंजी बफर नियामक आवश्यकताओं से काफी ऊपर है, परिसंपत्ति गुणवत्ता मजबूत हुई है और सकल फंसे हुए कर्ज (एनपीए) में स्पष्ट गिरावट आई है।

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First Published - February 24, 2026 | 10:42 PM IST

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