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नॉन-टैरिफ बैरियर पर पर भारत-अमेरिका में बनी सहमति, साइड लेटर से होगा समाधान!

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भारत और अमेरिका साइड लेटर पर हस्ताक्षर कर इस मुद्दे को कर सकते हैं हल

Last Updated- April 28, 2025 | 7:39 AM IST

भारत और अमेरिका प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते से इतर कथित अनुबंध (साइड लेटर) पर हस्ताक्षर करके विवादास्पद गैर-शुल्क बाधाओं का समाधान कर सकते हैं। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर कहा, ‘दोनों सरकारों के बीच आपसी समझ के तहत भारत और अमेरिका के बीच कई साइड लेटर पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। ये मुख्य रूप से गैर-शुल्क बाधाओं से संबंधित होंगे।’

मुक्त व्यापार समझौते के संदर्भ में साइड लेटर अलग-अलग दस्तावेज होते हैं, जिन पर मुख्य समझौते के साथ-साथ बातचीत की जाती है ताकि विशिष्ट चिंताओं को दूर किया जा सके या दोनों पक्षों के बीच विशेष व्यवस्था की जा सके। ये कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं लेकिन केवल उन्हीं देशों के बीच मान्य होता है जो उस पर हस्ताक्षर करते हैं।

उदाहरण के लिए आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते को पूरा करते समय ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने ऑस्ट्रेलिया में कार्यरत भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों की विदेशी आय पर कर लगाने से रोकने के लिए अपने घरेलू कानूनों में संशोधन करने पर सहमति व्यक्त की थी। इससे भारत सरकार द्वारा उठाई गई दोहरे कराधान निषेध संधि से संबंधित चिंता का समाधान हो गया। हालांकि यह आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं था लेकिन दोनों देशों के व्यापार मंत्रियों द्वारा एक-दूसरे को पत्र लिखकर आपसी समझ को रेखांकित करते हुए इसे औपचारिक रूप दिया गया।

हाल के दिनों में अमेरिका ने भारत में अमेरिकी व्यवसायों के सामने आने वाली गैर-शुल्क बाधाओं पर गंभीर चिंता जताई है। हाल में भारत की यात्रा पर आए अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने और अमेरिकी कंपनियों को अधिक बाजार पहुंच प्रदान करने पर जोर दिया था।

इस महीने की शुरुआत में विदेशी व्यापार बाधाओं पर जारी राष्ट्रीय व्यापार अनुमान रिपोर्ट में अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपीए) के मसौदा नियमों पर चिंता व्यक्त की थी।

यूएसटीआर को दिए गए प्रस्तुतिकरण में गूगल, एमेजॉन, मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों की संस्था कोलिशन ऑफ सर्विसेज इंडस्ट्रीज (सीएसआई) ने स्थानीय सामग्री की आवश्यकता और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) तथा रुपे कार्ड को अनुचित लाभ देने, डेटा स्थानीयकरण, दूरसंचार उपकरणों का अनिवार्य परीक्षण और प्रमाणन की आवश्यकता, विदेशी कंपनियों पर कर में भेदभाव, आईटी उत्पादों पर सीमा शुल्क आदि का जिक्र किया था। अमेरिकी कंपनियों ने भारत सरकार द्वारा दिए गए गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी आदेशों पर भी चिंता जताई है।

इकनॉमिक लॉ प्रैक्टिस में सीनियर पार्टनर संजय नोतानी ने कहा कि दोनों देशों को गैर-शुल्क बाधाओं को समझने के लिए हर क्षेत्र से संबंधित अलग दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, ‘वर्तमान में धातु, रसायन, औद्योगिक उत्पाद, पूंजीगत वस्तुओं और दूरसंचार सहित कई क्षेत्रों में इस तरह की गैर-शुल्क बाधाएं मौजूद हैं। हमें सबसे पहले इन बाधाओं की प्रकृति का आकलन करने की आवश्यकता है क्योंकि सभी के लिए एक समाधान नहीं हो सकता है।’

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First Published - April 27, 2025 | 10:17 PM IST

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