ओपनएआई के मुख्य कार्याधिकारी सैम ऑल्टमैन ने कहा कि अगले कुछ महीनों में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (आई) और जेनरेटिव एआई की लागत में भारी कमी आएगी, जिससे भारत जैसे देशों को फायदा होगा। ऑल्टमैन ने देश की राजधानी में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान चुनिंदा मीडिया राउंडटेबल के दौरान कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि हम कीमतें जितनी ज्यादा कम करने जा रहे हैं उसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। मुझे लगता है कि इससे वैश्विक स्तर पर हमारे काम में मदद मिलेगी।’ पिछले 14 महीनों में ओपनएआई के किसी मॉडल से जवाब पाने की लागत 1,000 गुना से ज्यादा कम हो गई है। ऑल्टमैन ने कहा कि हालांकि फ्रंटियर एआई मॉडल के हर जवाब की कीमत आगे चलकर उतनी तेजी से कम नहीं होगी, लेकिन ये कीमतें निश्चित रूप से कम होंगी।
उन्होंने कहा कि एआई से लिखे सॉफ्टवेयर कोड की हर लाइन की लागत भी पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है और अब यह इंसानों से लिखे कोड से सस्ती है। उन्होंने यह भी कहा कि एआई मॉडल हर इंसानी सोच वाले टोकन के लिए बनाए गए उन्हीं पैरामीटर्स की तुलना में हर टोकन और इंफरेंस टाइम के हिसाब से पहले से ज्यादा कुशल हैं। ऑल्टमैन ने कहा, ‘ऊर्जा लागत की तुलना हमेशा अजीब होती है। लोग आमतौर पर किसी इंसान के कुछ समाधान निकालने के अनुमानित समय पर उसकी एनर्जी कॉस्ट के बारे में बात करते हैं औऱ इसकी तुलना एआई के कुल ट्रेनिंग समय से करते हैं। एक इंसान को अपनी पूरी जिंदगी में ट्रेनिंग लेने, अपने शरीर को लंबे समय तक चलाने में भी ज्यादा एनर्जी की जरूरत होती है।’
बहुत सारे संसाधन, चाहे वह धन हो, एनर्जी हो या पानी, अब ट्रेनिंग के बजाय एआई मॉडलों के लिए ज्यादा जरूरी हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड के एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देशों को यह भी तय करना होगा कि वे अपने डेटा पर स्थानीय स्तर पर एआई इनफेरेंस और ट्रेनिंग चलाना चाहते हैं या यह काम किसी दूसरी कंपनी या देश को आउटसोर्स करना चाहते हैं। ऑल्टमैन ने कहा, ‘मैं इस बात से हैरान हूं कि अलग-अलग लीडर इस बारे में क्या सोचते हैं कि वे एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना चाहते हैं या नहीं। इसका फैसला हर देश को अपने हिसाब से करना है।’
उन्होंने कहा कि एआई आर्किटेक्चर के इन्फ्रास्ट्रक्चर, मॉडल और एप्लीकेशन लेयर में निवेश करने का भारत का पक्का इरादा ‘वाकई बहुत कमाल का’ है। उन्होंने कहा कि भारत में एआई टूल्स को जिस तेजी से अपनाया जा रहा है, वह अविश्वसनीय है।