नैशनल कंपनी लॉ अपील ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) ने कंपनी मामलों के मंत्रालय और भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) को लेनदारों के दावे से संबंधित दिवालिया कानून में बदलाव करने का निर्देश दिया है। ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में वैधानिक दावों से संबंधित प्रावधानों में कुछ खामियां दिखने पर एनसीएलएटी ने यह निर्देश दिया है।
ट्रिब्यूनल का मानना है कि इस संबंध में सरकार और नियामक को आईबीसी में संशोधन करने पर विचार करना चाहिए ताकि समाधान योजना में वैधानिक दावों को बिना किसी रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी) के शामिल किया जा सके। भले ही ऐसे वैधानिक दावों के लिए कोई आवेदन न किया गया हो लेकिन दिवालिया कंपनी के बहीखाते में उसकी झलक मिलती हो।
अपील ट्रिब्यूनल कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) बनाम सुबोध कुमार अग्रवाल मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। ईपीएफओ ने नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के कोलकाता पीठ के आदेश को चुनौती दी थी जिसके तहत दिवालिया कंपनी एंबिएंट कंप्यूट्रॉनिक्स प्राइवेट लिमिटेड की समाधान योजना को मंजूरी दी गई थी। कंपनी की समाधान योजना में ईपीएफओ को ऐसे पक्ष के तौर पर नहीं नहीं दिखाया गया था जिस पर बकाया हो।
आईबीसी के तहत परिभाषित रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के दायित्वों पर गौर करते हुए ट्रिब्यूनल ने कहा कि आईबीसी के प्रावधानों और विनियमों में किसी जारी कार्यवाही का संज्ञान लेने पर विचार नहीं किया गया है जिसके तहत कॉरपोरेट देनदार को किसी भी वित्तीय देनदारी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
एनसीएलएटी ने पाया कि ईपीएफओ की ओर से जाहिर तौर पर कोई दावा नहीं किया गया था लेकिन वह इससे इनकार नहीं कर सकता है कि आरपी और बोलीदाता को यह पता था कि एम्बिएंट पर उसका 6.16 लाख रुपये का बकाया है। इसके बावजूद समाधान योजना में ईपीएफओ को कोई पक्ष नहीं बनाया गया। उसके बाद ईपीएफओ ने समाधान योजना को चुनौती दी और एम्बिएंट पर 12.17 लाख ररुपये के भविष्य निधि बकाये का दावा किया।