प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय कंपनियों के लिए अब सबसे बड़ा सिरदर्द साइबर अटैक और डेटा चोरी बन गए हैं। ‘FICCI-EY रिस्क सर्वे 2026’ की नई रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, आधे से ज्यादा भारतीय बिजनेस लीडर्स साइबर सिक्योरिटी को अपनी कंपनी की तरक्की में सबसे बड़ी रुकावट मान रहे हैं।
रविवार को जारी इस सर्वे के मुताबिक, करीब 51 फीसदी वरिष्ठ अधिकारियों ने माना कि उनके लिए साइबर ब्रीच और डिजिटल अटैक इस समय सबसे बड़ा जोखिम हैं। इसके बाद ग्राहकों की बदलती मांग (49 फीसदी) और दुनिया भर में हो रही भू-राजनीतिक उथल-पुथल (48 फीसदी) को व्यापार के लिए बड़ी चुनौती माना गया है।
दिलचस्प बात यह है कि आज के दौर में तकनीक और व्यापार का संचालन एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ चुके हैं। सर्वे में शामिल 61 फीसदी दिग्गजों का कहना है कि तकनीक में हो रहे तेज बदलाव और डिजिटल हलचल उनके बाजार की स्थिति को प्रभावित कर रही है। इतने ही लोग यह भी मानते हैं कि साइबर अटैक से न सिर्फ पैसे का नुकसान होता है, बल्कि कंपनी की साख पर भी गहरा दाग लगता है।
रिपोर्ट बताती है कि 57 फीसदी इंडस्ट्री लीडर्स डेटा चोरी और कंपनी के भीतर होने वाली धोखाधड़ी (इंसाइडर फ्रॉड) को लेकर चिंतित हैं, जबकि 47 फीसदी मानते हैं कि साइबर खतरों के बदलते और जटिल स्वरूप से निपटना अब काफी मुश्किल होता जा रहा है।
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आजकल हर जगह आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस यानी AI की चर्चा है, लेकिन भारतीय कंपनियों के लिए यह एक ‘दोधारी तलवार’ साबित हो रहा है। सर्वे के अनुसार, 60 फीसदी लोगों को डर है कि अगर उन्होंने AI जैसी नई तकनीक को नहीं अपनाया, तो वे कामकाज में पिछड़ जाएंगे। वहीं, 54 फीसदी लोगों का मानना है कि AI से जुड़े जोखिमों, जैसे कि नैतिक मुद्दे और गवर्नेंस, को अभी ठीक से मैनेज नहीं किया जा रहा है।
तकनीक के अलावा, कंपनियों को योग्य कर्मचारियों की कमी भी सता रही है। करीब 64 फीसदी अधिकारियों का मानना है कि स्किल्ड वर्कफोर्स की कमी उनके प्रदर्शन पर असर डाल सकती है, जबकि 59 फीसदी लोग कमजोर उत्तराधिकार योजना (सक्सेशन प्लानिंग) को स्थिरता के लिए खतरा मानते हैं।
इस बदलते समय पर फिक्की के राजीव शर्मा कहते हैं कि अब रिस्क को किसी एक घटना की तरह नहीं, बल्कि रणनीति का हिस्सा मानकर निपटा जा रहा है। वहीं EY इंडिया के सुधाकर राजेंद्रन का मानना है कि महंगाई, साइबर खतरे और जलवायु परिवर्तन जैसे जोखिम अब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर कंपनियों की परीक्षा ले रहे हैं।
इसके अलावा, सप्लाई चेन की दिक्कतें (54 फीसदी) और नए नियमों के साथ तालमेल बिठाने की चुनौती (67 फीसदी) भी भारतीय कॉरपोरेट जगत के सामने खड़ी हैं। यहां तक कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़े नियमों (ESG) का पालन न करना भी अब कंपनियों के लिए वित्तीय नुकसान का कारण बन रहा है।
(PTI के इनपुट के साथ)