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आय छिपाने पर माफी अब संभव, लेकिन टैक्स डिमांड और कानूनी स्थिति देखकर ही करें फैसला

बजट 2026 में मिसरिपोर्टिंग मामलों में भी इम्यूनिटी का प्रस्ताव, लेकिन अपील का अधिकार खत्म होने से पहले सोच-समझ जरूरी

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संजीव सिन्हा   
Last Updated- February 09, 2026 | 9:04 AM IST

बजट 2026 में उन करदाताओं को भी जुर्माने और सजा से माफी देने (इम्यूनिटी) का प्रस्ताव रखा गया है, जिन पर आय का गलत ब्योरा देने का आरोप है। अपनी आय को कम बताने वालों को जुर्माने और सजा से माफी देने की व्यवस्था पहले ही चल रही है। अभी तक गलत आय बताने या मिसरिपोर्टिंग पर किसी तरह की माफी नहीं थी मगर बजट में उन्हें भी जुर्माने और सजा से बरी करने का प्रस्ताव है।

दोनों में अंतर

आय कम बताने या अंडररिपोर्टिंग के मामले वे होते हैं, जहां करदाता अपने आयकर रिटर्न में अपनी कुछ आय बताता है मगर कर अधिकारियों के आकलन में उसकी असली आय ज्यादा निकलती है। ऐसे मामले चूक की वजह से, किसी आय को छोड़ देने की वजह से या आय को आय नहीं मानने की वजह से हो सकते हैं। जरूरी नहीं है कि ऐसे हर मामले में करदाता ने जानबूझकर अपनी आय कम करके बताई हो।

आय गलत बताना या मिसरिपोर्टिंग ज्यादा गंभीर अपराध होता है। एसवीएएस बिजनेस एडवाइजर्स के संस्थापक विश्वास पंजियार कहते हैं, ‘इसे आय कम बताने की ज्यादा संगीन हरकत माना जाता है। आम तौर पर ऐसा जानबूझकर किया जाता है, जैसे कमाई दबा लेना, खातों में गलत एंट्री करना, फर्जी खर्च दिखाना या कर योग्य आय में फर्जी कटौती लेना अथवा गलत तथ्य बताना। दोनों में फर्क मंशा का है। आय गलत बताने के पीछे कर अधिकारियों को जानबूझकर गुमराह करने की कोशिश होती है।’

मिसरिपोर्टिंग पर जुर्माना और सजा

अगर कोई रिटर्न में मिसरिपोर्टिंग करता है यानी अपनी आय छिपा लेता है तो कानून के तहत छिपाई गई आय पर 200 फीसदी कर वसूला जाता है। पंजियार बताते हैं, ‘जुर्माना या सजा मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है। अगर कर अधिकारी साबित कर देते हैं कि कर चोरी जानबूझकर की गई या फर्जी दस्तावेज पेश किए गए तो छह महीने से सात साल तक की जेल भी हो सकती है।’

अंडररिपोर्टिंग में माफी

करदाता अगर अपनी आय कम बताता है तो वह आकलन आदेश के मुताबिक कर और ब्याज चुकाकर, आदेश के खिलाफ अपील नहीं करके और तय अवधि के भीतर माफी की अर्जी डालकर जुर्माने तथा सजा से बच सकता है। अभी तक मिसरिपोर्टिंग के मामलों में इस तरह की माफी की व्यवस्था नहीं थी।

मिसरिपोर्टिंग में भी माफी

मुकदमे कम करने और अनुपालन को आसान बनाने के लिए इस साल के बजट में आय छिपाने वालों को भी इस तरह की माफी दे दी गई है। अरीट कंसल्टेंट्स की संस्थापक रूपाली सिंघानिया आगाह करती हैं, ‘मगर ऐसे मामलों में माफी तभी मिलेगी, जब करदाता बकाया कर और जुर्माना भर देगा और साथ ही छिपाई गई आय पर 100 फीसदी कर भी अलग से भरेगा।’ पंजियार कहते हैं, ‘इस प्रस्ताव से निपटारे की व्यवस्था तैयार होती है, जिसमें करदाता को विवाद सीधे निपटाने का मौका मिल जाता है। यह कदम लोगों को आय छिपाने से रोकेगा, लंबे मुकदमे कम होंगे और मामले जल्द खत्म हो जाएंगे।’

खूबियां और खामियां

माफी की व्यवस्था होने से करदाताओं को काला धन (अघोषित विदेशी आय एवं संपत्ति) और कर आरोपण अधिनियम, 2015 (काला धन कानून) के तहत जुर्माने तथा सजा से छूट मिल जाती है और वे छिपाई गई आय को नियमित आय की श्रेणी में ला सकते हैं। प्रस्ताव में विदेश में 20 लाख रुपये तक की संपत्तियों पर भी मुकदमे और सजा का प्रावधान खत्म करने की बात है, जिससे छोटी-मोटी या अनजाने में छिप गई आय के मामलों में अनुपालन आसान हो जाएगा तथा मुकदमे कम होंगे।

मगर एक बात ध्यान रखना जरूरी है। बीडीओ इंडिया में ग्लोबल मोबिलिटी सर्विसेज, टैक्स ऐंड रेग्युलेटरी एडवाइजरी की पार्टनर दीपाश्री शेट्टी कहती हैं, ‘फास्ट-ट्रैक डिस्प्यूट सेटलमेंट (फास्ट-डीएस) व्यवस्था के तहत अदा की गई रकम वापस नहीं आती, चाहे बाद में यह क्यों न पता चले कि उस आय या संपत्ति पर कर नहीं बनता या गलती से इसे मिसरिपोर्टिंग मान लिया गया था। इसीलिए करदाताओं को यह व्यवस्था चुनने से पहले अपनी विदेशी आय या संपत्ति को सावधानी से देख लेना चाहिए। गलत फैसला ले लिया तो गई हुई रकम वापस नहीं आएगी।’

कब चुनें, कब अनदेखा करें

दीपाश्री की सलाह है कि यदि करदाता को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) से विदेशी संपत्ति के बारे में कोई अलर्ट मिला है तो मिसरिपोर्टिंग के मामले में उन्हें इस व्यवस्था का फायदा उठा लेना चाहिए। अगर करदाता आकलन आदेश को स्वीकार कर लेता है तो वह कर और ब्याज चुकाकर माफी का दावा कर सकता है और मुकदमेबाजी से बच सकता है।

लेकिन सिंघानिया कहते हैं, ‘यदि करदाता आदेश को चुनौती देने का फैसला करता है तो उसे माफी का विकल्प नहीं चुनना चाहिए क्योंकि यह विकल्प तभी मिलता है, जब आगे कोई अपील दायर नहीं की जा रही हो।’ करदाताओं को देख लेना चाहिए कि जोड़ी गई संपत्ति या कर कितना है और कानूनी तौर पर वे कितने मजबूत हैं। उन्हें हर फैसला सोच-समझकर किया जाना चाहिए क्योंकि माफी का विकल्प चुनते ही कर विभाग की मांग के खिलाफ अपील का अधिकार खत्म हो जाता है।

 

(लेखक दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

First Published : February 9, 2026 | 9:04 AM IST