दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत कंपनियों का समेकन अनिवार्य रूप से कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि बाजार एक व्यावहारिक कंपनी को ही बचाता है। ये बातें आज भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के चेयरमैन एमएस साहू ने कही।
बुनियादी ढांचा क्षेत्र में फंसे हुए ऋण पर आयोजित फिक्की के सेमिनार को संबोधित करते हुए साहू ने कहा, ‘उपयुक्त मामलों के परिसमापन पर खीज न दिखाएं। जब बाजार इस नतीजे पर पहुंचता है कि अब कंपनी को उबारने के लिए कोई व्यवहारिक समाधान योजना नहीं है तब वह परिसमापन की ओर बढ़ता है।’
साहू उस आलोचना पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे कि आईबीसी के पास आए मामलों में से केवल 25 फीसदी का ही समाधान हो पाया जबकि बाकी का परिसमापन हुआ। उन्होंने कहा कि बहुत ही कम कंपनियां ऐसी थी जिनके पास मामूली संपत्ति थी या कॉर्पोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में आने के समय पर निष्क्रीय थी।
आईबीबीआई प्रमुख ने कहा कि दबावग्रस्त संपत्तियों में परिसमापन में जाने वाली कंपनियों में से 75 फीसदी की हिस्सेदारी केवल 25 फीसदी थी। उन्होंने कहा, ‘यदि किसी के पास संपत्ति है तो इसका मतलब है कि उसमें सुधार होने की उम्मीद है। इन मामलों में आईबीसी उपलब्ध संपत्ति के मूल्य को अधिकतम बढ़ाने का प्रयास करता है न कि उस संपत्ति के मूल्य को बढ़ाता है जो है ही नहीं।’
उन्होंने कहा कि परिसमापन या बचाव बाजार की ताकतों का परिणाम है और कानून उसे केवल प्रभावी बनाता है। उन्होंने कहा, ‘यदि कीमत ठीक हो तो सबसे अधिक सड़े हुए टमाटर बिकते हैं।’
अब तक करीब 4,000 कंपनियों को कॉर्पोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया में शामिल किया गया है। इनमें से 2,000 की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और करीब 300 से 350 का समाधान समाधान योजना के तहत किया गया है।
सफल समाधान योजना पाने वाली इन 300 से 350 कंपनियों का परिसमापन मूल्य दावा किए गए रकम का करीब 22 फीसदी था। इन कंपनियों में ऋणदाताओं को अपने दावा का 45 फीसदी प्राप्त हुआ जो परिसमापन मूल्य का करीब 200 फीसदी था।