भूषण पावर ऐंड स्टील (बीपीएसएल) का समाधान पिछले साढ़े तीन वर्षों तक खिंच गया और इस दौरान इस्पात क्षेत्र में तेजी, आर्थिक मंदी, कोविड के कारण कारोबार ठप और तेजी से सुधार का दौर दिखा।
बीपीएसएल को जुलाई 2017 में ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत समाधान के लिए नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) भेजा गया था। शुक्रवार को वह समाधान के करीब पहुंच गई क्योंकि अधिकतर लेनदारों ने जेएसडब्ल्यू स्टील के प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया और अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार है। इस प्रक्रिया को 31 मार्च तक बंद करने का विचार है। लेकिन इस मामले के शुरुआत से लेकर अब तक क्षेत्र सबसे अच्छा और सबसे खराब दौर से गुजरा है।
क्रिसिल रिसर्च की निदेशक ईशा चौधरी ने कहा कि वित्त वर्ष 2017 में इस्पात क्षेत्र में अंतिम चक्रीय नरमी दर्ज की गई थी और उस दौरान इस्पात की मांग में वृद्धि घटकर 3.1 फीसदी रह गई थी। उसके बाद वित्त वर्ष 2018 और वित्त वर्ष 2019 दो काफी दमदार वर्ष रहे। फिर निर्माण एवं खपत में नरमी के बारण घरेलू बाजार में इस्पात की मांग में वृद्धि वित्त वर्ष 2020 में घटकर 1.4 फीसदी रह गई।
वित्त वर्ष 2020 के बाद स्थिति में सुधार होने लगी थी लेकिन कोविड वैश्विक महामारी की रोकथाम के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई जिससे मांग को जबरदस्त झटका लगा। हालांकि लॉकडाउन के बाद मांग में तेजी से सुधार हुआ और इस्पात की कीमतें जनवरी में अपनी सर्वकालिक ऊंचाई को छू गईं। वित्त वर्ष 2021 की पहली छमाही के दौरान लॉकडाउन के कारण सालाना आधार पर मांग में 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। चौधरी ने कहा कि 20 अक्टूबर के बाद सभी अंतिम उपयोगकर्ता क्षेत्रों में जबरदस्त सुधार हुआ और वित्त वर्ष 2021 में इस्पात की मांग में गिरावट 5.6 से 6.5 फीसदी के दायरे में सीमित हो गई।
बीपीएसएल ऐसी एकमात्र परिसंपत्ति नहीं है जिसे लंबी समाधान प्रक्रिया के दौरान कारोबारी चक्र में बदलाव से गुजरना पड़ा। लंबी मुकदमेबाजी के कारण कई मामलों में देरी हुई है। भारतीय ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) के आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर तक करीब 1,942 सीआईआरपी (कॉरपोरेट ऋण शोधन अक्षमता समाधान प्रक्रिया) जारी थी जिनमें से 1,442 मामलों में 270 दिनों से अधिक की देरी हुई।