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किसानों और स्टॉक को देखते हुए सरकार ने निर्यात में ढील दी

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केंद्र सरकार ने बाजार संतुलन और किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए गेहूं और चीनी के निर्यात पर रोक हटा दी।

Last Updated- February 16, 2026 | 7:16 AM IST
Wheat
Representative Image

केंद्र सरकार ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए शुक्रवार को 25 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दे दी। गेहूं निर्यात पर पिछले तीन साल से अधिक समय से प्रतिबंध लगा हुआ था। यही नहीं, पहले से स्वीकृत 15 लाख टन के अलावा 5 लाख टन चीनी का निर्यात और खोल दिया गया है। हैरानी की बात है कि यह अनुमति तब दी गई जब व्यापारियों के अनुसार गेहूं एवं चीनी दोनों के निर्यात में घरेलू दरों और वैश्विक कीमतों के बीच बहुत कम या कोई समानता नहीं है।

आधिकारिक बयान में कहा गया है कि निर्यात की अनुमति देने का यह फैसला वर्तमान उपलब्धता और मूल्य परिदृश्य का व्यापक मूल्यांकन करने के बाद लिया गया है, जो किसानों के हितों की रक्षा करने और अधिशेष का प्रबंधन करने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

गेहूं: घरेलू और वैश्विक स्तर पर संतुलन

गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध 13 मई, 2022 को लगाया गया था, क्योंकि उस समय घरेलू उत्पादन में गिरावट और रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ने के कारण भारतीय गेहूं की मांग में तेजी आई थी, जिससे घरेलू स्तर पर कीमतें बढ़ गई थीं। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सरकार की वार्षिक खरीद खतरे में पड़ गई थी। हालात को संभालने के लिए सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया था। अब, 2026-27 के अप्रैल से शुरू होने वाले नए विपणन सत्र में गेहूं की फसल अच्छी होने की उम्मीद है और उत्पादन नए उच्च स्तर को छू सकता है। इस समय व्यापारी और सरकार दोनों के पास गेहूं का विशाल भंडार मौजूद है, इसलिए केंद्र ने प्रतिबंध हटाने जैसा कदम उठाया है।

भारत में 2025-26 सीजन में लगभग 11.8 करोड़ टन गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था। 31 मार्च, 2026 तक केंद्रीय पूल में गेहूं का अंतिम स्टॉक आधिकारिक तौर पर 1.82 करोड़ टन होने का अनुमान है, जबकि बफर की आवश्यकता 75 लाख टन है। यानी अनुमानित स्टॉक लगभग 143 प्रतिशत अधिक हो सकता है, हालांकि व्यापार सूत्रों का कहना है कि यह उत्पादन लगभग 2 करोड़ टन भी हो सकता है।  इतना ही नहीं, आधिकारिक बयान में कहा गया है कि व्यापारियों के पास लगभग 75 लाख टन गेहूं मौजूद है, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में लगभग 32 लाख टन अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि देश में गेहूं बाजार अच्छी स्थिति में है और यह आगे भी बनी रहने की संभावना है। ऐसे में स्वाभाविक है कि नई फसल आते ही कीमतें गिर सकती हैं।

वर्तमान में घरेलू बाजार में गेहूं की कीमतें उत्तरी और पश्चिमी बाजारों में लगभग 2550-2680 रुपये प्रति क्विंटल पर हैं, जबकि 2026-27 सत्र के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। इसके अलावा वर्तमान में भारतीय गेहूं की कीमत लगभग 270-280 डॉलर प्रति टन है, जबकि विश्व स्तर पर गेहूं 197 डॉलर प्रति टन से लेकर 265-270 डॉलर प्रति टन के बीच बिक रहा है।

इससे स्पष्ट है कि घरेलू कीमतों और वैश्विक दरों के बीच समानता देखें तो भारतीय गेहूं विश्व बाजारों में अप्रतिस्पर्धी है। व्यापार सूत्रों ने कहा कि जब तक अच्छी फसल और पर्याप्त स्टॉक के कारण देश में गेहूं की कीमतें गिरकर 2250-2300 रुपये प्रति क्विंटल के बीच नहीं आ जातीं, तब तक इसका विश्व स्तर पर निर्यात नहीं किया जा सकता। कुछ बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापारी अगली फसल के लिए 2300 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक का भुगतान करने को तैयार नहीं होंगे, क्योंकि उनमें से अधिकांश को गेहूं में नुकसान हुआ है।

एक ट्रेडिंग फर्म के अधिकारी ने कहा, ‘वर्तमान वित्त वर्ष में केंद्रीय पूल स्टॉक से गेहूं की बेमौसम डंपिंग के कारण अधिकांश व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ है। इसलिए अगले सत्र में किसानों को 2250-2300 रुपये से अधिक का भुगतान वे नहीं करेंगे।’ गेहूं की कीमतों में गिरावट का डर न केवल बढ़ती सब्सिडी के मामले में गंभीर आर्थिक प्रभाव डाल सकता है, बल्कि इसके राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं।

चीनी : राजनीतिक मुद्दा न बन जाए गन्ना

इसी तरह चीनी के मामले में हालात को देखते हुए सरकार ने निर्यात बढ़ाने का फैसला लिया है। सरकार चीन का 5 लाख टन निर्यात बढ़ाकर बाजार की स्थिति को बेहतर बनाए रखने के साथ-साथ समय पर गन्ना बकाया भुगतान चाहती है।

आंकड़ों से पता चला है कि नवंबर 2025 में पहले स्वीकृत 15 लाख टन के निर्यात कोटे में से अब तक केवल लगभग 2.7 लाख टन के अनुबंध हुए हैं, जबकि 31 जनवरी, 2026 तक वास्तविक शिपमेंट भी 1.9 लाख टन से कम है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि गेहूं की तरह ही, चीनी में भी घरेलू कीमतें निर्यात बाजारों की तुलना में अधिक हैं और भारतीय चीनी भी प्रतिस्पर्धा से बाहर है। विश्व स्तर पर भारतीय चीनी 450 डॉलर प्रति टन है, जबकि अन्य जगहों से चीनी 400 डॉलर प्रति टन पर उपलब्ध है। व्यापारियों का आकलन है कि सरकार निर्यात बढ़ाकर घरेलू स्तर पर दरों में वृद्धि और गन्ना बकाया निपटान की गति को बनए रखना चाहती है, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इन दोनों ही मोर्चों पर गच्चा खाने का मतलब है राजनीतिक मोर्चे पर भारी नुकसान। यदि गन्ने का बकाया रुकता है तो किसानों को सीधा नुकसान होगा, जिसे विपक्षी आसानी से मुद्दा बनाकर सरकार पर निशाना साध सकते हैं।

चीनी उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘परिणाम दिखने लगे हैं। पिछले शुक्रवार को देश में एक्स-फैक्ट्री चीनी की कीमतें 3700 रुपये प्रति क्विंटल थी जो अब बढ़कर 3725 रुपये प्रति क्विंटल हो गई हैं यानी कुछ ही दिनों में 25-40 रुपये की वृद्धि है।’ वैश्विक कृषि कमोडिटीज ट्रेडिंग उद्योग में एक प्रमुख खिलाड़ी एमईआईआर कमोडिटीज के प्रबंध निदेशक राहिल शेख ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि निर्यात खोलना काफी हद तक ‘प्रतीकात्मक’ है। यदि स्टॉक बढ़ा तो गन्ना बकाया लंबित हो सकता है। चीनी अधिशेष दो ही तरीके से संभाला जा सकता है। एक तो इथेनॉल उत्पाद और दूसरा निर्यात बढ़ाना। अब चूंकि इथेनॉल की उत्पादन की गुंजाइश बहुत सीमित है, इसलिए निर्यात बढ़ाने का फैसला लिया गया।

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First Published - February 16, 2026 | 7:16 AM IST

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