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दालों के duty free import से किसान- कारोबारी परेशान, दलहन बुआई पर पड़ा असर

भारतीय बाजारों में दालों का आयात लगातार जारी है क्योंकि सरकार ने मार्च 2026 तक अरहर, पीली मटर और उड़द के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दे दी है।

Last Updated- August 01, 2025 | 6:06 PM IST
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दालों की कीमतों को कम करने के लिए सरकार ने शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी जिससे कनाडा, अफ्रीकी देशों और रूस से भारी मात्रा में दालों का आयात शुरू हुआ और देश में दाल की कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य के नीचे पहुंच गई। कीमत कम होने का असर दलहन की बुवाई पर भी पड़ा है। अब किसान और व्यापारियों ने केंद्र से दलहन के सस्ते आयात पर रोक लगाने का आग्रह किया है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों में स्थिरता बनी रहे और किसान दलहन फसलों की खेती का रकबा बढ़ाने के लिए प्रेरित हों। संघ का मानना है कि यह कदम अगले  2 से 3 सालों में देश को दलहन में आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगा।

सरकार ने 15 मई, 2021 से मुक्त श्रेणी के तहत तुअर और दिसंबर 2023 से पीली मटर के आयात की अनुमति दी थी, जिसके बाद समय-समय पर इस मुक्त व्यवस्था को बढ़ाया गया है। इस साल की शुरुआत में, सरकार ने तुअर और पीली मटर की शुल्क-मुक्त आयात नीति को अगले मार्च के अंत तक बढ़ा दिया था। घरेलू बाजार में तुअर और मटर की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने और संभावित मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया था।

शुल्क-मुक्त आयात का असर दालों की कीमतों पर पड़ा रहा है। चने की कीमतें पिछले अगस्त के 8,000 रुपये प्रति क्विंटल से गिरकर 6,200 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई हैं, जबकि तुअर की कीमतें 11,000 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर 6700 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई हैं। इसी अवधि में पीली मटर की कीमतें 4,100 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर 3,250 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई हैं।

कीमतों में गिरावट के कारण तुअर बुवाई के रकबा में गिरावट देखने को मिल रही है। सामान्य मानसून के बावजूद जुलाई के अंत तक तुअर की बुवाई का रकबा 8 प्रतिशत घटकर 34.90 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि पिछले साल 37.99 लाख हेक्टेयर में तुअर की बुवाई हुई थी। तुअर की बुवाई का सामान्य रकबा लगभग 45 लाख हेक्टेयर है।

कृषि किसान एवं व्यापार संघ के अध्यक्ष सुनील कुमार बलदेवा ने कहा कि वर्तमान में भारत में दालों की अत्यधिक आपूर्ति है, क्योंकि बंदरगाह रूस और कनाडा से आई पीली मटर की खेपों से भरे पड़े हैं। उन्होंने कहा कि हमने सरकार से अनुरोध किया है कि सस्ते आयात को रोका जाए, जिससे बुवाई के मौसम में कीमतें स्थिर रहें और किसान अधिक रकबे में दलहन फसलों की खेती करने के लिए प्रेरित हों, जिससे अगले 2-3 सालों में भारत आत्मनिर्भर बन सके।  उन्होंने आगे कहा कि जब पिछले साल चने की खेती में गिरावट आई थी, तो हमारे संघ ने सबसे पहले सरकार से पीली मटर और चने पर आयात शुल्क कम करने का अनुरोध किया था।

भारतीय बाजारों में दालों का आयात लगातार जारी है क्योंकि सरकार ने मार्च 2026 तक अरहर, पीली मटर और उड़द के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दे दी है। खासतौर से 400 अमेरिकी डॉलर प्रति टन से भी कम कीमत पर पीली मटर का आयात बाजार का खेल बिगाड़ रहा है और दूसरी दालों की कीमतों को भी नीचे खींच रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक होने के बावजूद, भारत बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है। आंकड़ों के अनुसार, बीते वित्त वर्ष में रिकॉर्ड 66.3 लाख टन दालों का आयात किया गया था। 2023 की तुलना में दालों का आयात इस दौरान लगभग दोगुना था। इसमें सबसे चौंकाने वाली हिस्सेदारी पीली मटर की थी। पीली मटर का कुल आयात में 45 प्रतिशत हिस्सा यानी 29 लाख टन था। गौर करने वाली बात है कि 2023 तक भारत पीली मटर का आयात बिल्कुल नहीं करता था।

First Published - August 1, 2025 | 5:59 PM IST

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