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मजदूरों के हित में नई राह पर चलने की जरूरत
मनीष सभरवाल और सोनल अरोड़ा /  February 19, 2017

श्रम संगठनों को मौजूदा दौर के हिसाब से खुद को ढालना होगा तभी उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी। दलील दे रहे हैं मनीष सभरवाल और सोनल अरोड़ा
भारत में मजदूर संगठनों की सदस्यता का अनुपात अमेरिका और ब्रिटेन जैसे समृद्ध देशों से भी अधिक है। अमेरिका में केवल 10 प्रतिशत मजदूर ही इन संगठनों का हिस्सा हैं जबकि ब्रिटेन में यह संख्या महज सात फीसदी है लेकिन भारत में कुल श्रमशक्ति का 15 फीसदी हिस्सा मजदूर संगठनों से जुड़ा है। हालांकि मजदूर संगठनों में हिस्सेदारी के पैमाने पर भारत अमेरिका और ब्रिटेन से पीछे नजर आता है। आखिर इसकी क्या वजह है? इनका हांफना या विश्वासघात या इसे गुजरे जमाने की बात लेना? मजदूर संगठनों का अवसान आसन्न है लेकिन अपरिहार्य नहीं है। हमें वैकल्पिक भविष्य के बारे में सोचना होगा क्योंकि मजदूर संगठन किसी भी नागरिक समाज का अहम हिस्सा हैं और उसका क्षय होना हत्या नहीं बल्कि आत्महत्या जैसा है। जैसे प्रभावी सरकारें कारोबार समर्थक न होकर बाजार समर्थक होती हैं, उसी तरह मजदूर संगठनों को भी नियोक्ताओं पर नहीं बल्कि कर्मचारियों पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए मजदूरों के बीच उभरने वाले आंशिक अभिजनवाद को भूलकर अधिकांश कर्मचारियों के वेतन में न्यायोचित बढ़ोतरी को मुद्दा बनाया जाना चाहिए। इसके लिए अधिकतम श्रम शक्ति को संगठित दायरे में लाने, शहरीकरण को बढ़ावा देने और उनकी कार्यकुशलता को बढ़ावा देने के तरीके अपनाए जा सकते हैं।
धनी देशों में श्रम संगठनों की गतिविधियों में आई गिरावट के लिए अक्सर वैश्वीकरण को जिम्मेदार बताया जाता है। शायद यह सही भी है। कम कुशल और ग्रामीण आबादी की मजदूरी पर व्यापार और आव्रजन के चलते होने वाले असर को ब्रेक्सिट और डॉनल्ड ट्रंप जैसे कारकों से समझा जा सकता है। धनी देशों के मजदूर संगठन गरीब देशों के मजदूर संगठनों के साथ साझा मुद्दे तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। एशियाई विकास बैंक की बैठक में इंटरनैशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस की एक नेता ने कहा कि उनके देश में 18 करोड़ मजदूरों की सदस्यता से उन्हें गरीब देशों के मजदूरों की लड़ाई लडऩे का भी साहस मिलता है। लेकिन जैसे ही उन्होंने आव्रजन में कमी, वैश्विक पूंजी प्रवाह में गिरावट, मुक्त व्यापार को निष्पक्ष बनाने और व्यापार वार्ताओं जैसे मसलों का जिक्र शुरू किया तो यही लगा कि धनी देशों के मजदूरों की आवश्यकता गरीब देशों के श्रमिकों से अलग है। इससे यह भी अहसास हुआ कि धनी देशों में मजदूर संगठनों का पराभव उनके अप्रसांगिक होने के चलते हुआ है।
लेकिन भारतीय श्रम संगठनों का पतन उनके विश्वासघात के चलते हुआ है। असंगठित क्षेत्र के युवा मजदूरों की बड़ी संख्या मूक रही है जबकि कम संख्या वाले बुजुर्ग और संगठित क्षेत्र के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर मुखर रहे हैं। इस वजह से असंगठित मजदूरों के बजाय संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के हितों को प्रमुखता मिलती रही है। इस स्थिति को तीन तरह से सुधारा जा सकता है:
संगठित श्रम: भारत में रोजगार की उतनी समस्या नहीं है जितनी वेतन अनुपात को लेकर है। कम उत्पादकता वाली इकाइयों के चलते यहां काम करने वाले मजदूरों का मेहनताना भी काफी कम है। भारत की छह करोड़ औद्योगिक इकाइयों में से केवल 12 लाख ही अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा का भुगतान करती हैं जबकि इनमें से केवल 18,000 इकाइयों की ही चुकता पूंजी 10 करोड़ रुपये से अधिक है। विनिर्माण में लगी कंपनियों की रैंकिंग करने पर हमें पता चलता है कि 90 फीसदी कंपनियों की उत्पादकता बाकी 10 फीसदी कंपनियों की तुलना में 24 गुना कम है।
भारतीय श्रम संगठनों को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और नोटबंदी जैसे कदमों का पुरजोर समर्थक होना चाहिए। कारोबारी सुगमता को बढ़ावा देने वाले कदमों के भी पक्ष में खड़ा होना चाहिए क्योंकि इससे भारत को उद्यमशीलता के लिहाज से कम प्रतिकूल बनाने में मदद मिलेगी। उन्हें विदेशी निवेश की राह के अवरोधों को दूर करने की मांग करनी चाहिए क्योंकि जब तक अधिक रोजगार अवसर सृजित हो रहे हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पडऩा चाहिए कि कंपनी भारतीय है या विदेशी?
मजदूर संगठनों को भविष्य निधि और कर्मचारी बीमा योजनाओं के पुनर्गठन की भी मांग करनी चाहिए क्योंकि इनका वर्चस्व होने से कर्मचारियों को उनके धन का अच्छा लाभ नहीं मिल पाता है। भविष्य निधि कोष दुनिया का सबसे खर्चीला सरकारी सिक्योरिटीज म्युचुअल फंड है जबकि दूसरों के मुकाबले भारत में स्वास्थ्य बीमा दावों के निस्तारण के मामले में सबसे खराब स्थिति है। मजदूरों को शिकायत निवारण के लिए पेपरलेस, प्रेजेंसलेस और कैशलेस (पीपीसी) पोर्टल की मांग करनी चाहिए। उन्हें श्रमिकों से संबंधित अलग-अलग 44 कानूनों की जगह एक श्रमिक संहिता बनाने की मांग करनी चाहिए। इन अच्छे मकसदों के लिए लडऩे के बजाय भारतीय मजदूर संगठन नौकरी बचाए रखने को ही रोजगार के रूप में पेश करने में लगे रहते हैं।
शहरीकरण: भारत के केवल 45 शहरों की आबादी 10 लाख से अधिक है जबकि कुल छह लाख में से दो लाख गांवों की औसत आबादी 200 से भी कम है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिकार्डो हॉसमान और एडवर्ड ग्लीसर का मत है कि आर्थिक संरचना और समूहीकरण के चलते शहर नौकरी पैदा करने के लिहाज से चुंबक की तरह हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में संगठित रोजगार की संभावना नगण्य है और वे अब भी पुरानी परंपराओं के जाल में उलझे हुए हैं। सवाल है कि मजदूर संगठनों ने कभी शहरी सुधारों की मांग क्यों नहीं उठाई या फिर वे किफायती आवासीय और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को लेकर प्रदर्शन क्यों नहीं करते हैं? दरअसल भारत रोजगार को लोगों के पास ले जाने की स्थिति में नहीं है। लिहाजा लोगों को ही रोजगार के पास ले जाना होगा। अगले 20 वर्षों में देश की कुल जनसंख्या वृद्धि में उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा का हिस्सा करीब 40 फीसदी रहने वाला है। ऐसे में श्रम संगठनों को ऐसी शहरी नीतियों के अमल पर जोर देना चाहिए जो सम्मानित और असरदार तरीके से स्वैच्छिक ग्रामीण प्रवास को सुगम बना सकें।
कौशल विकास: भविष्य में रोजगार की स्थिति के बारे में अभी से कोई अनुमान लगा पाना लगभग असंभव है। केवल यही कहा जा सकता है कि भविष्य में नवाचार, उच्च जीवन प्रत्याशा और तीव्र तकनीकी विकास के दौर में कौशल विकास ही इकलौता आसरा होगा। इसका अर्थ है कि 10+2+3+2 की मौजूदा शिक्षा प्रणाली को अधिक लचीला, प्रासंगिक और सुधारपरक बनाना होगा। कौशल विकास मंत्रालय के गठन, शिक्षा का अधिकार कानून बनाने और काम करते हुए सीखने की सुविधा देने वाली ऑनलाइन शिक्षा पर लगी पाबंदी हटाने के लिए मजदूर संगठनों ने कोई लड़ाई नहीं लड़ी है। मेहनताना मानवीय पूंजी पर ही निर्भर करता है लेकिन किसी भी राष्ट्रीय श्रम संगठन ने स्कूलों, आईटीआई और कॉलेजों में व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने वाले सुधार लागू करने की कोई योजना पेश नहीं की है। श्रम संगठनों को यह सोचना चाहिए कि सूचना पर आधारित श्रम बाजार कीमत आधारित शेयर बाजार से अलग होता है।देश को आजाद कराने में श्रम संगठनों ने भी अहम भूमिका निभाई थी लेकिन आज के श्रमिकों को एक नई तरह की आजादी की जरूरत है। अगर कर्मचारियों के सामने संगठित क्षेत्र में रोजगार के कई विकल्प होने के साथ ही उन्हें अधिक मेहनताना भी मिलता है तो उनके लिए यही आजादी होगी। निश्चित रूप से श्रम संगठनों के लिए यह नया पहलू खुद को बदलने में अधिक प्रेरणादायी साबित होगा।
(लेखकद्वय टीमलीज सर्विसेज से संबद्ध हैं)

Keyword: labour, trade unions, श्रम संगठन,
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