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सामयिक सवाल: चेन्नई में चक्रवाती तूफान ‘मिगजॉम’ से सबक

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दुबई में चल रहे कॉप28 शिखर सम्मेलन, उत्तराखंड में सुरंग हादसे और अब भीषण मिगजॉम चक्रवात ने ग्लोबल वॉर्मिंग के साथ-साथ शहरी नियोजन के महत्त्व पर दोबारा बहस छेड़ दी है।

Last Updated- December 07, 2023 | 10:50 PM IST

देश के व्यस्ततम शहरों में से एक चेन्नई में मिगजॉम चक्रवात के कारण लोग बिल्कुल अलग-थलग पड़ गए थे। अचानक बने हालात में जहां कई लोग अपनी यात्रा की योजना बदलने को मजबूर हुए, वहीं उन्हें कई घंटे बिना बिजली के भी रहना पड़ा।

इंटरनेट कनेक्टिविटी कमजोर हो जाने की वजह से ईमेल और व्हाट्सऐप मेसेज भेजने में खासी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। उस दौरान चेन्नई में यह लेखिका भी अचानक उपजे संकट से दो-चार हुई और करीब से यह देखा कि विकट हालात में लोग कैसे अपने आप को संभाल रहे थे।

जब 4 दिसंबर को चेन्नई में तूफान से हर तरफ पानी ही पानी भर गया था, तो ज्यादातर एयरलाइंस ने उड़ान रद्द होने के बारे में यात्रियों को बहुत देर से सूचना दी। हालांकि एयरपोर्ट पर संचालन रात 9 बजे तक बंद होने का ऐलान पहले ही किया जा चुका था, जिसे बाद में अगले दिन सुबह 11 बजे तक के लिए बढ़ा दिया गया था।

एयरलाइंस ने उड़ान रद्द होने की सूचना देने में भले ही देर की हो, लेकिन अगले दिन की उड़ान का किराया बढ़ाने की घोषणा करने में बिल्कुल समय नहीं गंवाया। इस संकट की घड़ी में वे किराया बढ़ाने से परहेज कर अपने ग्राहकों की सहानुभूति हासिल कर सकती थीं। एयरलांइस की ओर से एक रिकॉर्डेड कॉल आई, जिससे पानी में डूबे इस शहर में प्रत्येक यात्री को और अधिक परेशानी में डाल दिया।

यात्रियों के पास टिकट का पैसा वापस लेने का विकल्प था, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह पूरा नहीं मिल रहा था। दूसरे, वे अपनी उड़ान की योजना को पुन:निर्धारित भी कर सकते थे। दोनों ही हालात में यात्री चेन्नई से बाहर निकलने की कोशिशों में नाकाम रहे। बजट एयरलाइंस हो या पूर्ण सेवा प्रदाता, सबकी स्थिति एक जैसी ही थी।

इस मामले में होटल प्रबंधन अधिक मानवीय नजर आए। उड़ान रद्द होने पर कमरा तलाश रहा व्यक्ति चाहे वह नया हो या पहले से रुके हुए यात्री ने कमरे की बुकिंग आगे बढ़ाई हो, प्रबंधन ने किराया नहीं बढ़ाया। अहमदाबाद में हाल ही में हुए क्रिकेट विश्व कप के दौरान एक-एक रात का लाखों रुपये वसूलने वाले कई बड़े होटलों ने भी इस संकट की घड़ी में अपने यहां कमरों का किराया घटा दिया।

चूंकि सब कुछ जेनरेटरों से चल रहा था, ऐसे में यात्रियों को इससे ज्यादा मतलब नहीं था कि लॉबी, लाउंज या कॉरिडोर में लाइट जल रही है अथवा नहीं या रूम सर्विस गड़बड़ा गई है। यह भी नहीं पता था कि कितने समय तक बारिश होगी और एयरपोर्ट कब तक बंद रहेगा। ऐसे में होटल में टिके मेहमानों को होटल प्रबंधन के इस आश्वासन से ज्यादा कुछ मायने नहीं रखता था कि बिजली बैकअप अगले कई घंटों तक काम करता रहेगा।

लेकिन, अगला दिन निराशा एवं लचीलेपन की एक और बड़ी कहानी बयान करता है। चेन्नई की सबसे पुरानी सड़क अण्ण शालै (पूर्व में माउंट रोड) समेत कई प्रमुख सड़कों पर पुन: रौनक लौट आई थी और कहीं भी जलभराव नहीं दिख रहा था। जो एयरपोर्ट कुछ घंटे पहले अनिश्चितता के भंवर में फंसा था, अब वह भी विमानों के उड़ान भरने और उतरने के लिए पूरी तरह तैयार था। यहां यात्रियों के सामान का प्रबंधन करने और सुरक्षा में जुटे कर्मियों में भी वही पहले जैसी सक्रियता नजर आ रही थी। एक दिन पहले का तनाव उनके ऊपर हावी नहीं था।

रिटेल स्टोर पर जरूर सुस्ती छायी हुई थी, क्योंकि कई स्टोर मैनेजर पिछले 24 घंटे से वहीं रुके हुए थे। एयरपोर्ट परिसर में कई जगह अभी भी उड़ान रद्द या देर होने के बोर्ड टंगे नजर आ रहे थे। कई मामलों में तो ऐसा भी देखा गया कि हवाई जहाज उड़ने के लिए तैयार थे, लेकिन क्रू मेंबर गायब।

हालांकि होटल और एयरपोर्ट से अलग भी एक और चेन्नई था, जो चक्रवाती तूफान और बारिश से कहीं अधिक प्रभावित हुआ था। वहां एक दिन बाद भी जलभराव के कारण जनजीवन अस्त-व्यस्त था और हजारों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर थे। शहरी जनजीवन को पटरी पर लाने के लिए स्थानीय प्रशासन, पुलिस, सशस्त्र बल भारी बारिश में भी काम में जुटे थे, लेकिन शहरी नियोजन को सुधारने की सुध कौन ले?

दुबई में चल रहे कॉप28 शिखर सम्मेलन, उत्तराखंड में सुरंग हादसे और अब भीषण मिगजॉम चक्रवात ने ग्लोबल वॉर्मिंग के साथ-साथ शहरी नियोजन के महत्त्व पर दोबारा बहस छेड़ दी है। यहां बहसों में घूम-फिर कर एक ही सवाल उठ रहा है कि वर्ष 2015 में भीषण बाढ़ से जूझने के बाद पिछले आठ वर्षों में चेन्नई शहर को फ्लड प्रूफ बनाने के दावों पर क्या प्रगति हुई? छह महीने पहले ही, जून में तमिलनाडु सरकार ने चेन्नई की पहली जलवायु कार्ययोजना जारी की है।

इस कार्ययोजना में शहर को 2050 तक कार्बन मुक्त बनाने का रोडमैप है। (भारत ने जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य 2070 निर्धारित किया है।) इस कार्ययोजना का उद्देश्य छह प्रमुख क्षेत्रों में प्राथमिकता से सुधार करने पर जोर दिया गया है। इनमें शहरी बाढ़ की समस्या भी शामिल है।

यह कार्ययोजना 2015 में आई भीषण बाढ़ के आठ साल बाद आई है, जिसमें कई दिन तक शहर पानी में डूबा रहा और सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इस कार्ययोजना को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए, ताकि 2015 की बाढ़ या फिर अब मिगजॉम जैसे विकट हालात का दोबारा सामना न करना पड़े।

चेन्नई की सड़कों से हटकर भले नावें अब समुद्र में लौट गई हों और मगरमच्छ अपनी प्राकृतिक रिहायश में जा चुके हों, लेकिन शहरी नियोजन की कार्ययोजना बनाते समय हमें प्राकृतिक संकट से निपटने की तैयारी पर अवश्य पुनर्विचार करना होगा।

साथ ही ग्लोबल वॉर्मिंग अब केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में बहसों का विषय नहीं होना चाहिए। अपने नागरिकों के बेहतर भविष्य के लिए हम शहरी नियोजन में सुधार करने को विश्व के प्रमुख शहरों के तजुर्बे का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह कोई बुरा विचार नहीं है।

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First Published - December 7, 2023 | 10:50 PM IST

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