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OpenAI: बोर्ड में खामी या सीईओ की सितारा हैसियत!

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कुछ लोगों ने कहा है कि अत्यधिक छोटा बोर्ड भी समस्या का हिस्सा था। ओपनएआई में आरंभ में नौ बोर्ड सदस्य थे। बाद के वर्षों में तीन सदस्य अलग हो गए

Last Updated- December 11, 2023 | 11:58 PM IST
Sam Altman

ओपनएआई के सीईओ को निकाले जाने और उनकी बहाली यह दर्शाती है कि व्यापक सामाजिक चिंताओं को हल करने के मामले में निजी क्षेत्र के बोर्ड की अपनी सीमाएं हैं। बता रहे हैं टीटी राममोहन

कंपनी का बोर्ड एक मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) को निकाल देता है। प्रमुख निवेशक उसे बहाल करता है और फिर बोर्ड को निकाल देता है। ऐसे में कौन किसके प्रति जवाबदेह है? हाल ही में तकनीकी क्षेत्र की कंपनी ओपनएआई में घटनाक्रम बताता है कि कारोबारी संचालन में किस कदर गड़बड़ी देखने को मिल सकती है।

अधिकांश टीकाकार सोचते हैं कि समस्या ओपनएआई के खराब ढांचे में थी जहां मुनाफे और गैर मुनाफे वाली कंपनियों का मिश्रण है। ओपनएआई को एक गैर मुनाफे वाली कंपनी के लिए बनाया गया था ताकि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस यानी एआई में ऐसा शोध किया जा सके जो सुरक्षित और मानवता की रक्षा करने वाला हो।

ऐसे शोध में बहुत अधिक पूंजी लगती है जो आसानी से नहीं मिलती। इस स्थिति में ओपनएआई ने मुनाफे वाली अनुषंगी कंपनियां बनाईं जो पूंजी जुटा सकें और ऐसा अधिशेष जुटाएं जो निवेशकों की हिस्सेदारी चुकाने के बाद मूल कंपनी को जा सके।

कहा जा रहा है कि इससे ओपनएआई में ऐसा विवाद उत्पन्न हुआ जो हल होने का नाम नहीं ले रहा। एआई को वाणिज्यिक बनाने के लिए ऐसे उत्पाद विकसित करने की आवश्यकता है जो बाजार के मुफीद हों। इस लक्ष्य का विवादित होना तय था क्योंकि यह सुरक्षा और मानव हित के लक्ष्यों से टकराव वाला है।

क्या यह सच है? कारोबारी संस्थानों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें अंशधारकों की संपत्ति बढ़ाने पर ध्यान देना होता है। बहरहाल हाल के वर्षों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि उन्हें सामाजिक रूप से भी जवाबदेह होना चाहिए। भारत में कंपनियों को अपने मुनाफे का एक हिस्सा कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए रखा जाता है।

जलवायु परिवर्तन के संबंध में निरंतरता का भी ध्यान रखा जाता है। आज कॉर्पोरेट बोर्डों के कई लक्ष्य होते हैं जिन्हें संतुलित करने की जरूरत है। इसी तरह ओपनएआई का बोर्ड भी अपने मूल लक्ष्यों को संतुलित करने के तरीके तलाश सकता था।

कुछ लोगों ने कहा है कि अत्यधिक छोटा बोर्ड भी समस्या का हिस्सा था। ओपनएआई में आरंभ में नौ बोर्ड सदस्य थे। बाद के वर्षों में तीन सदस्य अलग हो गए और बोर्ड में छह सदस्य रह गए जिनमें चेयरमैन और सीईओ शामिल थे। सीईओ को निकालने का निर्णय केवल चार सदस्यों ने लिया था जिनमें से एक ओपनएआई के मुख्य वैज्ञानिक थे। उन्होंने बाद में अपने निर्णय पर अफसोस जताया।

समस्या बोर्ड आकार नहीं बल्कि उसका स्वरूप था। प्रमुख निवेशक माइक्रोसॉफ्ट का कोई प्रतिनिधि बोर्ड में नहीं था। ऐसा शायद यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था ताकि गैर लाभकारी संस्था वाणिज्यिक प्रभाव से बची रहे।
यह एक बड़ी गलती थी।

यह एक भ्रम है कि गैर लाभकारी संस्था को वाणिज्यिक रुझान की जरूरत नहीं। उसके लक्ष्य गैर लाभकारी हो सकते हैं लेकिन फंडिंग की अनदेखी नहीं की जा सकती। माइक्रोसॉफ्ट को बोर्ड में जगह मिलनी चाहिए थी ताकि उसकी बातें भी दर्ज की जा सकतीं।

संस्था मुनाफा कमाने वाली हो या नहीं लेकिन मुख्य निवेशक को बोर्ड से बाहर रखना सही नहीं। खासतौर पर तब जबकि निवेशकों की तादाद पहले ही कम हो। मुख्य निवेशक की भूमिका अहम होती है और वह परिणामों के लिए गैर हिस्सेदार निदेशकों की तुलना में अधिक जवाबदेह होती है। यही वजह है कि भारत सरकार को सरकारी उपक्रमों के बोर्ड में अपने प्रतिनिधि रखने चाहिए। सरकारी उपक्रमों के बोर्ड को सरकार से इतर पेशेवरों से चलवाने का तरीका सही नहीं।

अगर माइक्रोसॉफ्ट बोर्ड में रहती तो बोर्ड सीईओ को निकालने या न निकालने के बारे में बेहतर निर्णय ले पाता। सैम ऑल्टमन को निकालने वाले चार बोर्ड सदस्यों ने ऐसा साहस दिखाया जो बोर्ड रूम में नजर नहीं आता। चूंकि इस निर्णय में ओपनएआई के शामिल होने की संभावना थी इसलिए उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट से मशविरा न करके बेहतर किया।

कंपनी के बंद होने की संभावना इसलिए थी क्योंकि 90 फीसदी कर्मचारियों ने ऑल्टमन को निकाले जाने के बाद संस्था छोड़ने की धमकी दी थी। अन्य अवसरों पर बोर्ड के सामने ये खतरे थे कि सीईओ के छोड़ने के बाद कहीं निवेशक साथ न छोड़ दें। इससे सवाल उठता है कि बोर्ड को ऐसे सीईओ के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए जिन्हें सितारा हैसियत हासिल हो? क्या सितारा हैसियत वाले सीईओ से निपटते वक्त बोर्ड ऊंचे सिद्धांतों के साथ काम कर सकता है?

प्रमाण तो ये भी हैं कि बोर्ड ऐसे सीईओ को चुनौती देने से बचते हैं। वे भला प्रदर्शन खराब करने और निवेशकों को नाराज करने का जोखिम क्यों लेंगे? सीईओ तब सितारे बन जाते हैं जब वे असाधारण प्रतिफल जुटाते हैं। अक्सर असामान्य प्रतिफल अत्यधिक जोखिम से आता है। रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड और लीमन ब्रदर्स के मामलों में ऐसा हुआ। कई बार यह धोखाधड़ी के कारण भी हो सकता है जैसा कि थेरानॉस के मामले में हुआ। या फिर जनरल इलेक्ट्रिक की तरह यह गलत धारणा पर आधारित हो सकता है।

जनरल इलेक्ट्रिक के जैक वेल्च की शख्सियत बहुत अजीम थी। ‘लेसंस इन लीडरशिप फ्रॉम वेल्च’ प्रबंधन के विद्यार्थियों के लिए एक जरूरी किताब बन गई थी। उनकी विरासत थी- निर्मम छंटनी, असंबद्ध क्षेत्रों में प्रवेश, मुनाफे को सबसे आगे रखना। इन बातों पर आगे चलकर प्रश्न उठे। यहां बोर्ड के लिए यह सबक हो सकता है कि उसे सितारा प्रभाव से बचना चाहिए।

इससे बचने का एक तरीका यह है कि उत्तराधिकार की योजना बनाई जाए और अगर सीईओ बोर्ड रूम में दबदबा कायम करने की कोशिश करे तो उसे रास्ता दिखा दिया जाए। परंतु ऐसा तभी हो सकता है जब उत्तराधिकारी तैयार हो। ओपनएआई का बोर्ड शायद इस पहलू पर नहीं सोच सका।

बोर्ड सितारा हैसियत वाले सीईओ को इतनी तवज्जो दे बैठते हैं कि वे उन्हें अपरिहार्य मान बैठते हैं। जो बोर्ड सक्रिय नहीं होते वे अक्सर खराब कारोबारी नतीजों को स्पष्ट करते हैं।

बहरहाल जहां बड़े सामाजिक मुद्दे शामिल होते हैं वहां निजी क्षेत्र के बोर्ड की अपनी सीमाएं होती हैं। जैसा कि कई लोगों ने कहा भी है कि आम आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इतना महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है कि उसे केवल कॉर्पोरेट बोर्ड के हवाले नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उसके लिए नियमन आवश्यक है।

इसके अलावा अर्थशास्त्री मारियाना मज्जुकाटो की यह बात भी गौरतलब है कि अक्सर बड़े नवाचार सरकारी धन से हुए हैं न कि निजी क्षेत्र के धन से। गूगल का सर्च अलगोरिद्म, ईलॉन मस्क की कंपनियां, आईफोन में इस्तेमाल की गई प्रौद्योगिकी आदि सभी सरकारी धन वाली रही हैं। ओपनएआई के कारण उठे मुद्दों का एक जवाब सरकारी वित्तीय सहायता भी हो सकती है।

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First Published - December 11, 2023 | 11:38 PM IST

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