प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
किसी इलेक्ट्रिक ट्रक (ई-ट्रक) की कुल मालिकाना लागत (टीसीओ) तीन से पांच साल में डीजल ट्रक के बराबर हो जाती है। इसके बाद मालिक को ईंधन की कम लागत से ज्यादा फायदा होने लगता है क्योंकि बिजली डीजल की तुलना में सस्ती होती है। टाटा मोटर्स के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी गिरीश वाघ ने आज बिजनेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में यह जानकारी दी। टीसीओ का मतलब होता है किसी वाहन के पूरे जीवनकाल के दौरान उसे चलाने, रखरखाने और खरीदने की कुल लागत।
10,900 इलेक्ट्रिक बसों (ई-बस) की सरकार की निविदा हासिल न कर पाने के बारे में पूछे जाने पर वाघ ने कहा कि टाटा मोटर्स की बोली ई-बस परिचालन के सालों के अनुभव के आधार पर ‘तर्कसंगत’ लंबी अवधि के लागत मूल्यांकन पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि कंपनी 6,000 बसों के आने वाले ठेके में भी हिस्सा लेने के लिए उत्सुक है। टाटा मोटर्स ने मंगलवार को 17 ट्रकों का अगली पीढ़ी वाला पोर्टफोलियो पेश किया, जिसमें हल्के, मझोले और भारी-भरकम कामों के लिए 7 टन से 55 टन तक के ई-ट्रक शामिल हैं।
वाघ ने कहा कि टाटा मोटर्स ने स्थानीयकरण पर ध्यान दिया है। ई-ट्रकों में स्वदेशीकरण का स्तर सरकार की अनिवार्य 51 प्रतिशत की सीमा से अधिक है। इससे ये वाहन उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के फायदों के लिए पात्र हो जाते हैं। वाघ के अनुसार स्टील, सीमेंट और रसायन जैसे सेक्टर उत्सर्जन कम करने के अपने प्रयासों के तहत ई-ट्रकों का मूल्यांकन कर रहे हैं। इन क्षेत्रों को ‘कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिहाज से मुश्किल’ माना जाता है क्योंकि अधिक ऊर्जा और प्रक्रियागत जरूरतों के कारण ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना विशेष रूप से कठिन होता है।
वाहन बिक्री से इतर वाघ ने कहा कि टाटा मोटर्स पूरा पारिस्थितिकी तंत्र पेश कर रही है, जिसमें चार्जिंग का बुनियादी ढांचा, फाइनैंसिंग समाधान और आजीवन रखरखाव की सहायता शामिल है। चार्जिंग का बुनियादी ढांचा स्थापित करने की लागत वाहन की लागत से अलग होती है और खरीदारों के रूट तथा ट्रकों की तैनानी के स्वरूप के आधार पर योजना बनाई जाती है।
उन्होंने बताया कि टीसीओ का विश्लेषण खास इस्तेमाल मामलों का अध्ययन करके किया गया था, जैसे कि स्टील बनाने वाली कंपनियां कॉइल की छोटी दूरी और क्लोज्ड-लूप वाली ढुलाई के लिए ट्रैक्टर का उपयोग करती हैं। टाटा मोटर्स ने संभावित खरीदारों के साथ मिलकर आकलन किया कि प्रतिदिन कितने डीजल वाहनों की जरूरत होगी, कितने ई-ट्रक उनकी जगह लेंगे, चार्जिंग का जरूरी बुनियादी ढांचा क्या होगा और कुल टीसीओ की गणना से पहले परियोजना की कुल लागत कितनी होगी।
वाघ ने कहा कि ई-ट्रकों का मूल्यांकन करने वाले ग्राहकों के लिए मुख्य बात शुरुआती कीमत के बजाय पूरा आर्थिक पक्ष होता है। उन्होंने कहा, ‘ई-ट्रकों के लिए टीसीओ की तुलना महत्त्वपूर्ण होती है।’ उन्होंने कहा कि टाटा मोटर्स ग्राहकों के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि बेहतरीन दैनिक ड्यूटी साइकल को ध्यान में रखते हुए डीजल ट्रकों के टीसीओ से मेल खा सके। वाघ ने कहा, ‘ई-ट्रकों की जिस पूरी श्रृंखला को हम पेश कर रहे हैं, उनसे ग्राहक लगभग तीन से पांच साल के भीतर अपना पैसा निकाल सकते हैं। उसके बाद किसी ई-ट्रक को चलाने की लागत डीजल वाले ट्रक की तुलना में कम रहती है।’