प्राथमिकी दर्ज नहीं किये जाने पर चिंता जताते हुए प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, जितनी प्राथमिकियां वास्तव में दर्ज की गई हैं उतनी ही संख्या प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने की है।
पीठ ने कहा, एनसीआरबी के आंकड़े दर्शाते हैं कि साल 2012 के दौरान भारत में तकरीबन 60 लाख संग्येय अपराध के मामले दर्ज किए गए। चुपके से अपराध को समाप्त करना भी प्रति वर्ष तकरीबन 60 लाख के बराबर हो सकता है। इसलिए, ऐसा देखा जाता है कि इतनी बड़ी संख्या में प्राथमिकियां हर साल नहीं दर्ज की जाती हैं। यह इतनी बड़ी संख्या में अपराधों के पीडि़तों के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।
शीर्ष अदालत ने कहा, अपराधों को चुपके से समाप्त करना अल्पावधि में विधि के शासन को मलिन करना है और इसका दीर्घावधि में भी विधि के शासन पर बेहद नकारात्मक असर पड़ता है क्योंकि लोग विधि के शासन का सम्मान करना बंद कर देंगे। इसलिए इतनी बड़ी संख्या में प्राथमिकी का दर्ज नहीं किया जाना निश्चित तौर पर समाज को अराजकता की ओर ले जाती है।
संविधान पीठ ने यह फैसला तब सुनाया जब तीन न्यायाधीशों की पीठ ने बड़ी पीठ को इस आधार पर मामला भेजा कि इस मुद्दे पर विरोधाभासी फैसले हैं।