उच्चतम न्यायालय ने आज प्रणव मुखर्जी पर वोट के लिये भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए दायर एक याचिका को खारिज करते हुए अधिवक्ता को चेतावनी दी कि अगर भविष्य में वह इस तरह के आग्रह को लेकर न्यायालय के समक्ष आया तो उसके खिलाफ कडी कार्रवाई की जायेगी। न्यायालय ने कहा कि यह हास्यास्पद नाटक का मंच नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति एच एल गोखले ने पहले याचिकाकर्ता अधिवक्ता मनोहर लाल पर 50 हजार रूपये का जुर्माना भी लगाया था लेकिन बाद में अधिवक्ता के दया की अपील करने पर उसे माफ कर दिया।
शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता को चेतावनी दी कि अगर भविष्य में वह इस तरह की याचिका लेकर आये तो उन पर कोई रहम नहीं किया जायेगा।
पीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आलम ने कहा, आप व्यवस्था को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बार हम आपको छोड़ रहे हैं, अगर आप ऐसी याचिकायें दायर करते रहे तो हमसे किसी तरह की दया की उम्मीद नहीं करें।
शर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि प्रणव मुखर्जी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा सात और धारा 13 :1::डी: के तहत मामला चलाया जाना चाहिये क्योंकि वह सांसदो और विधायकों से राष्ट्रपति पद पर अपने चुनाव के लिये वोट मांग रहे हैं जो कि अवैध है।
उन्होंने कहा कि मुखर्जी को लोकसेवक होने के नाते वोट नहीं मांगने चाहिये जबकि वह वित्त मंत्री के पद पर रहते हुए भी ऐसा कर रहे थे।
पीठ ने याचिका को निराधार करार देते हुए कहा कि अगर राष्ट्रपति चुनावों का उम्मीदवार वोट मांग रहा है तो इसमें क्या गलत है।
शर्मा की एक ऐसी ही याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय गत 29 जून को खारिज कर चुका है।